साधना की दुनिया में पहला कदम- 2

प्रणाम मै शिवांशु,

मै गुरुदेव के साथ साधनायें करना चाहता था। उन्होंने अपनी एक साधना केदारनाथ के पवित्र क्षेत्र में जाकर पूरी करने की योजना बनाई। एक दिन बिना योजना अचानक ही मुझे लेकर केदारनाथ के लिये निकल पड़े। हम कार से जा रहे थे।

अब आगे……

गुरुदेव की कम बात करने की आदत है,  और मेरी ज्यादा।

जब गुरुवर साथ होते हैं तो मै छोटा बच्चा बन जाता हूं। हर क्षण उनसे कुछ न कुछ पूछने को मन मचलता रहता है।  

गुरुदेव गैर जरूरी सवालों के जवाब बिल्कुल ही नही देते। उन सवालों पर एेसे रिएक्ट करते हैं जैसे सुना ही न हो। इसी कारण बिना योजना अचानक लम्बे सफर पर निकल पड़ने सम्बंधी मेरे कई सवाल अनुत्तरित रह गये। एेसे में मनः स्थिति क्या हो रही होगी ये आप आसानी से समझ सकते हैं।

अनुत्तरित सवालों के जवाब मै खुद ही अपने आप से पूछ रहा था।

वे आंखें मूंदे आराम से बैठे थे।

सीतापुर में नदी के टोल टैक्स नाका पर उन्होंने अपना मौन तोड़ा। वह भी मुझे डपटने के लिये।

दरअसल मैने वहां टोल टैक्स देने की बजाय टोल कर्मचारी अपना पत्रकार वाला कार्ड दिखा दिया। जिसे देखकर उसने टोल टैक्स अदा किये बिना ही पुल पार कर जाने की अनुमति दे दी।

मै सोच रहा था कि गुरुदेव सो रहे हैं। मगर वे जाग रहे थे। पुल पर पहुंचने से पहले ही गाड़ी रोकने को कहा। बोले जाओ टोल टैक्स देकर आओ।

मैने उसी कर्मचारी के पास जाकर साॆरी बोला और टोल टैक्स चुकाया।

गाड़ी में आकर बैठा तो गुरुदेव बोले जरूरी नही है कि हर जगह अपना रुतवा दिखाया जाये। अपने पूर्वजों से कुछ तो सीखना ही चाहिये। भगवान राम ने राजा होने के बाद भी नदी पार करने के लिये केवट को उतराई दी थी।

जी गलती हो गई मै आगे से ध्यान रखुंगा। मैने कहा और गाड़ी का गीयर बदल दिया।

काफी बोर कर रहे हो तुम। गुरुवर बोले तो मै हिचकिचा गया। सच्चाई ये थी कि वे अपने मौन को एंज्वाय कर रहे थे। बात न कर पाने के कारण बोर तो मै हो रहा था।

वे बोले गाना वाना बजा दो। मै समझ गया वे अभी कुछ समय तक और बात करने के मूड में नही हैं। एेसी दशा में मुझे बोर होने से बचाने के लिये गाने प्ले करने की इजाजत दे रहे थे। मैने पुराने गाने प्ले कर दिये। गुरुदेव को पुराने गाने पसंद हैं।

दो घंटे से हम लगातार चल रहे थे। शाम हो गई थी। दो बार चाय पीने के अलावा मैने सुबह से कुछ न खाया था। गुरुदेव खुद तो खाते नही। मुझे भी अभी तक खाने के लिये नही कहा था। सो भूख परेशान कर रही थी। मन ही मन सोच रहा था कहीं गुरुदेव भूल तो नही गये कि मुझे भूख लगी होगी।

लखीमपुर के बाद उन्होंने अचानक एक जगह रुकने को कहा। मैने कार सड़क किनारे रोक दी। आस पास न कोई गांव था न कस्बा न शहर। सड़क से थोड़ी दूर हटकर एक खेत में झोपड़ी दिख रही थी। झोपड़ी के बाहर दो बच्चे खेल रहे थे।

गुरुवर गाड़ी से बाहर निकलकर खड़े हो गये। मुझसे बोले तुम्हें भूख लगी होगी।

हां, मैने जल्दी जल्दी कहा बहुत जोर की लगी है।

तो तुम्हारे खाने की व्यवस्था की जानी चाहिये।

यहां जंगल में। मै अचम्भित होने लगा। भूख की चर्चा करने पर अब मेरी भूख बर्दास्त से बाहर जाने वाली थी।  

अगर तपस्वी बनना चाहते हो तो तुम्हें खाने पीने का तरीका सीखना होगा। गुरुदेव ने कहा।  

जी आप जैसे बताएंगे वैसे ही खाउंगा। मैने कहा पहले हम किसी होटल तक तो पहुंचे।

तपस्वी का होटल से क्या लेना देना बच्चे। उन्होंने बड़े ही अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कराते हुए कहा। तपस्वी जहां रुक गये भोजन वही पैदा हो जाना चाहिये।

इतना कहकर वे खेत वाली झोपड़ी के बाहर खेल रहे बच्चों की तरफ देखने लगे।  

और मै गुरुदेव की तरफ देखने लगा।

समझ नही आ रहा था कि वे क्या करने वाले हैं।

…. क्रमशः

सत्यम् शिवम् सुंदरम्

शिव गुरु को प्रणाम

गुरुवर को नमन.

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