साधना रहस्य पर चर्चा

राम राम मै शिवांशु
राजेश तोमर के कमेंट पर आपका उत्साह सराहनीय है. इस बारे में अभय श्रीवास्तव के कमेंट से बात को आगे बढ़ाते हैं. उनका कमेंट मूल रुप से नीचे दे रहा हूं.

Abhay Srivastava
शिवंशु जी आपके रहस्य से, राजेश जी के प्रश्न का सम्बन्ध नहीं लगता है अच्छा होगा कि आप रहस्य बताने के साथ ही राजेश जी के प्रश्न का उत्तर देने कि कृपा करें ….राम राम

मै अभय जी का सुझाव स्वीकार करते हुए बात को आगे बढ़ा रहा हूं. शिव साधक ग्रुप साधना के उच्च आयामों को पा लेने का प्रयास है. सो हम यहां सिर्फ साधना के पक्ष पर ही चर्चा करेंगे.
सबसे पहले मै आपको बताता चलूं कि निजी तौर पर गरीबी खत्म करने, बीमारी खत्म करने, उग्रता को समाप्त करने, सदाचार को जगाने की साधनायें हैं. जो भगवान शिव द्वारा रची गईं.
जीवन संचालन में साधना एक बड़ा शब्द है,
साधक एक उच्च क्षमता के व्यक्तित्व का प्रतीक है.
अपने व्यक्तित्व और क्षमताओं को सवांरना, निखारना हर व्यक्ति की पहली जिम्मेदारी है. इससे हम खुद को सम्भालने लायक बनते हैं, और दूसरों पर बोझ नहीं बनते. समाज का हर व्यक्ति खुद को सक्षम बना ले तो न गरीबी रहेगी न बीमारी, न आतंकवाद बचेगा न अनाचार.
चिंता की बात सिर्फ इतनी है कि कुछ लोग खुद की शक्तियों, क्षमताओं को जाग्रत करके अपने को सक्षम बनाने की बजाय दूसरों की तरफ निहारते रहते हैं. या दूसरों की समस्याओं के नाम पर मातम मनाते रहते हैं.
साधक का मतलब होता है समाज का एक एेसा चमकता हुआ रत्न जो खुद को ही नहीं दूसरों को भी समस्याओं के पार ले जाने में सक्षम हो. जो ब्रह्मांडीय शक्तियों पर अपना अधिकार मानता हो और उन्हें जानने, अपनाने की महत्वाकांक्षा रखता हो. जिसे पता हो कि कौन सी बात कहां कही जानी चाहिये और कहां नहीं. कौन सा कार्य कहां किया जाना चाहिये और कहां नहीं.
अदृष्य होना, पानी पर चलना, वायु गमन करना. ये सिद्धियां अर्जित करना सबके बस की बात नहीं. लेकिन जो लोग इन्हें करते हैं वे भी हमारी ही तरह शरीर लिये हुए हैं. उन्होंने प्रकृति के उच्च संयम और नियमों का पालन कर रखा है. एेसा संयम और सदाचार जिसके बारे में सामान्य व्यक्ति सोच भी नहीं सकता.
जिनमें संयम, नियम की कमी होती है वही गरीबी के शिकार होते हैं, वही फ्रस्टेशन व आतंकवाद की राह पकड़ते हैं, वही बीमारी का शिकार होते हैं, वही महिलाओं का सम्मान करना भूल जाते हैं. उन्हीं का सदाचार से रिश्ता टूटता है. उनके भीतर का शिव तत्व नहीं जागता और न ही उनको शिव दर्शन होते हैं.
एेसी उपलब्धियों पर टिप्पड़ी करने का अर्थ है फ्रस्टेशन निकालना. किसी भी साधक के लिए जरूरी है कि वह खुद को भड़ास निकालने वाले रवैये से बचाये.
हलांकि राजेश तोमर ने अपने अगले कमेंट में लिखा है कि कुछ ही दिनों पहले उनके शहर में दो सामुदायों के बीच दंगा हुआ था, जिसको लेकर वे उत्तेजना में थे और उसी के कारण एेसा कमेंट किया. फिर भी मै उनके पूर्व के कमेंट का समर्थन करने वालों को सीमित सोच से बाहर निकलने की सलाह देता हूं.
और उन सबसे एक सवाल पूछता हूं कि भारत सहित दुनिया के तमाम देश चंद्रयान, मंगलयान, सहित अंतरीक्ष की खोज में अरबों खरबों रुपए हर बरस खर्चते हैं. आप सभी जानते हैं कि इन खोजों से न तो गरीबी दूर होगी और न ही आतंकवाद मिटेगा. न तो इनसे बीमारियां दूर होने वाली हैं और न ही इनसे महिलाओं पर होने वाले अत्याचार रुकने वाले हैं. न ही इनसे समाज में सदाचार पनपने की गुंजाइश है.
तो क्या इन अभियानों को रोक दिया जाना चाहिये. या आपकी निगाह में ये अनुसंधान वैज्ञानिकों के गैरजरूरी कार्य हैं.
हमें बड़े मुद्दों पर बात करने से पहले ये जरूर विचार करना चाहिये कि क्या हम इसके लिए सक्षम हैं.
जो लोग साधना की मर्यादाओं का निर्वाहन करने लायक नहीं उनसे आग्रह है कि वे शिव साधक ग्रुप तत्काल छोड़ दें. हर व्यक्ति साधक नहीं हो सकता. वे तो बिल्कुल भी नहीं जिन्हें विषयों की गम्भीरता का भान न हो.
साधना रहस्य जारी रहेगा…….

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