साधना रहस्य- 3

राम राम मै शिवांशु
गुरुदेव का आप सब के लिए एक कड़ा निर्देश है कि आप लोग उन्हें भगवान से बिल्कुल कम्पेयर न करें.
आपके लिए उनका संदेश है कि आप सब भगवान शिव में ही अपनी पूरी निष्ठा बनाये रखें. उनकी सत्ता को ही सर्वोपरि मानें. उन्हें ही अपना गुरु मानें. उनकी इच्छा से हम आपकी सेवा में लगे हैं और आगे भी लगे रहेंगे.
मेरा भी आप सबसे एक विनम्र निवेदन है कि आप लोग ग्रुप में मुझे प्रणाम न लिखें. इस ग्रुप से गुरुवर सीधे जुड़ें हैं. गुरुवर के समक्ष कोई मुझे प्रणाम करे तो लज्जा सी आती है. सो प्लीज मुझे लज्जित होने से बचायें. आप सबका आभारी रहुंगा.

कुछ लोगों को इस बात पर अचरज है कि कलियुग में एेसी साधना कैसे हो सकती हैं. मै आपको बताता चलूं कि उच्च साधक सभी युगों में होते हैं. जो हर तरह की साधनाएं करने में सक्षम होते हैं. धरा कभी वीरों और सिद्धों से खाली नहीं होती.

आगे का वृतांत…
गिरिजा शरण जी के साथ मैने भी वो रात शमशान में ही बिताने का निर्णय लिया. हम दोनों मंदिर से हटकर गंगा किनारे जाकर बैठे. वहां धूनी जला ली थी.
गिरिजा शरण जी ने खाने में पालक क कच्चेे पत्ते, मूली और कच्चे चने ही स्वीकार किये. स्वादिस्ट भोजन से बचने के लिए उन्होंने नमक, गुड़, चीनी, शहद, दूध व उससे बने सभी पदार्थ, तली-भुनी व उबली हुई सभी चीजों का त्याग करने का निर्णय ले रखा है.

बातचीत के दौरान उन्होंने मुझसे एक अलग सा सवाल पूछा. उनका सवाल था कि अदृश्य होने की सिद्धी को आज के जमाने के लोग किस रूप में देखते होंगे? क्या विज्ञान इस दिशा में कोई काम करने को तैयार हो सकताहै? उर्जा विज्ञान के मुताबिक आप इसे क्या मानते हैं?
कमाल है यही सारे सवाल मैने गुरुदेव से पूछे थे.
उन्होंने बताया था कि आज के समय के लोग इसे स्वीकार ही नहीं करना चाहेंगे. क्योंकि विज्ञान की ऊंचाइयों ने इंशानी मस्तिष्क को हर क्षण यथार्थवादी बना दिया है. और ये उचित भी है. क्योंकि पांखंड ने लोगों को बहुत छला है. सो सभी को इतना सतर्क तो होना ही चाहिये. इन सिद्धियों को सिर्फ साधक मन ही स्वीकार करेंगा. क्योंकि मन निर्मल होने के कारण उनकी ग्रहणशीलता अधिक होती है.
रही बात विज्ञान की तो कभी न कभी विज्ञान भी इसे कर ही दिखायेगा. लेकिन वे बायोकेमिकल अवयेव को परिवर्तित करके इसे करेंगे. जो एक खतरनाक सी प्रकिया होगी.
यंत्र और मंत्रों के जरिये अपेक्षाकृत ये प्रक्रिया सुरक्षित है. गुरुदेव ने मुझे बताया था कि एनर्जी विज्ञान में इसकी सबसे सटीक व्याख्या की जा सकती है.

हमारे शरीर का 96 प्रतिशत हिस्सा आभामंडल के रूप में पहले ही से अदृष्य है. जो प्लाज्मा की अवस्था में होने के कारण साधारण आंखों से नहीं दिखता.
जो शरीर दिखता है वो सिर्फ 4 प्रतिशत ही है. ये करोड़ों सेल्स ( कोशिकाओं) से बना है. ये कोशिकाएं ही घनीभूत होकर टिशु और आर्गन बनकर स्थूल शरीर के रूप में दिखती हैं.
अगर इन कोशिकाओं की क्रियाशीलता को डेढ़ लाख गुना बढ़ा दिया जाये तो उनका फार्मेट अर्थात दशा बदलकर गैसीय हो जायेगी. एेसे में आभामंडल की तरह ही दिखने वाला शरीर भी प्लाज्मा की अवस्था में पहुंच जाएगा और दिखना बंद कर देगा. या यूं कहें कि शरीर की कोशिकाएं इतनी अधिक मैग्नीफाइड हो जाएंगी कि साधारण आंखों से दिखनी बंद हो जाएंगी.
इसके लिये जरूरी है कि जो इस क्रिया को कर रहा है उसकी उर्जा नाड़ियों की गति में कोई अवरोध न हो. उनकी धड़कन की एकरुपता भी अनिवार्य है. उसके सभी उर्जा चक्र सक्षम तरीके से काम कर रहे हों, यह भी जरूरी है.
तभी डेढ़ लाख गुना बढ़ाई गई कोशिकीय सक्रियता समान रूप से स्थुल शरीर पर काम करेगी और उसे प्लाज्मा की अवस्था में पहुंचा सकेगी.
निर्धारित यंत्र का उपयोग करके मंत्रों के जरिये एेसा कर लेने की साधना सिद्धी करोड़ों साल से चली आ रही है. इसे क्षमतावान साधक हर युग में करते आये हैं.
मुझे याद आया कि गुरुवर ने स्वामी जी के आश्रम में रहने के दौरान मुझसे गिरिजाशरण जी की उर्जा नाड़ियों को ठीक कराया था. उनमें मामूली सा उलझाव था. जिसके कारण वे सिद्धी प्राप्त नहीं कर पा रहे थे.
गिरिजाशरण जी ने मुझे वो यंत्र दिखाया जो गुरुवर ने उन्हें इस साधना की सफलता के लिए 3 साल पहले बनाकर दिया था. प्रक्रिया के दौरान उन्हें यंत्र को मुंह में रख लेना होता है.
जब मैने उन्हें गुरुदेव द्वारा दी गई जानकारी बताई तो उन्होंने कहा अच्छा इसीलिए जब मै ये क्रिया करता हूं तो एेसा लगता है कि मेरे शरीर के भीतर की हलचल लाखों गुना बढ़ गयी है. प्रतीत होता है कि रक्त प्रवाह अनियंत्रित होकर फूट पड़ा है और हर तरफ बिखरा जा रहा है. उस वक्त शरीर की गति मन मस्तिष्क से भी तेज हो गई प्रतीत होती है. शुरू शुरू में तो इस विचित्र अहसास के कारण मै रो पड़ता था.
फिर मैने उनसे पूछा कि अदृष्य स्थिति के दौरान क्या वे हवा में उड़कर कहीं आ जा भी सकते हैं.
आगे बताउंगा कि उन्होंने इसका क्या जवाब दिया मुझे. और रात भर हम शमशान में रहकर क्या करते रहे.
क्रमशः
सत्यम् शिवम् सुंदरम्
शिव गुरु को प्रणाम.
गुरुवर को नमन.

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