यक्षिणी सिद्धी…4 !

संत जो आशीर्वाद में सोने की चेन बांट रहे थे00
[स्वर्णेस्वरी यक्षिणी वर्ग की देवी हैं. वे सिद्ध होने पर साधक के जीवन में चौतरफा सोना भर देती हैं. इसीलिये कुछ विद्वान इन्हें धनदा यक्षिणी भी कहते हैं. गुरुजी के निकट शिष्य शिवांशु जी ने स्वर्णेश्वरी सिद्धी की करके गुरु जी के निर्देश पर उन्हें अपना अध्यात्मिक मित्र बना लिया. यक्षिणी सिद्धी के अपने अनुभवों को उन्होंने प्रस्तावित ई बुक में लिखा है. हम यहां उनके अनुभव के कुछ अंश उन्हीं के शब्दों में शेयर कर रहे हैं. ताकि साधक लाभ उठा सकें. धनदा सिद्धी कर सकें…. अरुण]
साधना वृतांत शिवांशु जी के शब्दों में….
मै गुरुवर के साथ साधना के लिये हिमालय की घाटियों में जा रहा था. मुझे नही पता था कि साधना के लिये कौन सी जगह चुनी गई है. इतना जरूर मालुम था कि वो जगह देव प्रयाग के आस पास होगी. क्योंकि गुरुदेव ने अपने अध्यात्मिक मित्र सईद भाई को वहीं मिलने के लिये कहा था. सईद भाई को बरेली से लेकर हम देहरादून छोड़ आये थे.
देहरादून से हम ऋषिकेश की तरफ बढ़े. ऋषिकेश पहुंचकर गुरुवर ने अपने कुछ अध्यात्मिक मित्रों से मिलवाया. उनमें से एक का नाम जोगी महराज था. वे जोगी ही थे. यानी सन्यासी. बढ़ी दाढ़ी, लम्बे बाल, गुलाबी वस्त्र, सम्मोहक मुस्कान. अपने व्यक्तित्व में सम्पूर्ण जोगी को रचे थे.
लेकिन एक बात सन्यासियों के भेष से बिल्कुल अलग थी.
उन्होंने सोने के ढ़ेर सारे आभूषण पहन रखे थे. कई उंगलियों में सोने की अंगूठियां, दोनो कलाईयों पर सोने के मोटे मोटे ब्रेसलेट, गले में अंडरवर्ड के भाईयों की तरह सोने की कई मोटी चेन, सोने के डायल वाली घड़ी उनकी कमर में लटकी थी.
अगर वे गुरुवर के मित्र न होते तो मेरे मन में उनकी छवि गोल्ड के लालची सन्यासी की बनती. या मै उन्हें सीधे पाखंडी ही मानता.
उनका गोल्ड प्रेम देखकर मै दंग था.
तब मै और अधिक दंग रह गया जब पहली मुलाकात में ही उन्होंने अपने गले से एक मोटी चेन निकालकर मेरे गले में डाल थी. थोड़ी देर के लिये मुझे भ्रम हुआ कि वे नकली सोना पहने हैं. या कुछ समय बाद मुझसे चेन वापस ले ली जाएगी. वर्ना कोई प्रसाद की तरह किसी को सोना नही बांटता. मेरे गले में पड़ी चेन का वजन कम से कम 100 ग्राम महसूस हो रहा था.
गुरुवर से परिचय पाकर मैने उनके पैर छुवे. उन्होंने आशीर्वाद में मेरी पीठ पर जोर की थपकी मारी और गले से निकालकर एक चेन मेरे गले में डाल दी.
जाली एयरपोर्ट देहरादून और ऋषिकेश के बीच में है.
वे हमें जाली एयरपोर्ट के पास मिले. ये इत्तिफाक था या पूर्व योजना. मुझे नही बताया गया. कुछ ही देर पहले वे अपने कुछ शिष्यों के साथ मुम्बई की फ्लाईट से एयरपोर्ट पर उतरे थे. लंदन से लौट रहे थे. देहरादून से आते वक्त गुरुवर ने सड़क किनारे चाय की एक छोटी दुकान पर रुकने को कहा था. हम चाय पी रहे थे, तभी जोगी महराज का काफिला वहां आकर रुका.
दो महान अध्यात्मिक मित्रों की शानदार मुलाकात हुई. जोगी महराज के सभी शिष्य सोने से लदे थे. मगर उनकी विनम्रता और आस्था में कोई कमी न थी. सबने गुरूवर को जिस तरह दंडवत होकर नमन किया, उससे लगा कि वे गुरुदेव के बारे में भलीभांति जानते थे. एक मै ही था जो जोगी महराज के बारे में पहले से कुछ नही जानता था. सामने आने पर गुरुदेव से गले मिलते देखा तो समझ पाया कि उनके करीबी हैं. गुरूवर की ये अदा मुझे बहुत बार उलझन में डालकर रखती है. वे बिना जरूरत कभी कोई जानकारी नही देते. पता ही नही चलने देते कि अगले पल कुछ महत्वपूर्ण घटने वाला है. 
जोगी महाराज के साथ शिष्यों की मंहगी गाड़ियों का लम्बा काफिला आया था. मगर वे आकर हमारी गाड़ी में बैठ गये. मै उनसे पहली बार मिला था. पर एेसा लग रहा था मानो हम जन्मों से एक दूसरे को जानते हैं.
एक अनजाना अहसास. अजनवी सी पहचान. अनकहा अपनापन.
मुझसे रहा न गया. मैने गुरुदेव से कह ही दिया. एेसा फील हो रहा है कि महाराज जी से मै बहुत बार मिल चुका हूं. एेसा क्यों.
फील तुम्हें हो रहा है, सवाल मुझसे पूछ रहे हो. गुरुवर ने चुटकी ली. फिर जोगी महराज की तरफ देखकर मुस्कराने लगे. जोगी महराज उनकी तरफ देखकर मुस्करा रहे थे. दोनो जनों की मुस्कान में रहस्य सा छिपा था. मगर मुझे जवाब नही दिया गया.
मै चुपचाप गाड़ी चलाता रहा.
ऋषिकेश पहुंचने पर पता चला कि जोगी महराज देवप्रयाग और रुद्रप्रयाग के बीच कई आश्रम बनवा रहे हैं. जो मुख्य सड़क मार्ग से हटकर पहाड़ी चोटियों पर हैं. वे ऋषिकेश के एक होटल में जाकर रुके. हम भी उनके साथ थे. वहीं उनसे मिलने आये लोगों में से कुछ की बातों से उनके आश्रमों के निर्माण की बात पता चली.
शाम को हम लोग पहाड़ों की तरफ घूमने निकल गये. उसी बीच गुरुदेव के कुछ और अध्यात्मिक मित्रों से भेट हुई. उस दिन पहली बार मुझे मालुम हुआ कि हिमालय क्षेत्र में गुरुवर के कई सिद्ध अध्यात्मिक मित्र रहते हैं.
उनमें से एक बहुत गरीब से थे. वे पहाड़ों में रहकर साधनायें करते थे.
मगर धन उनसे रूठा सा था.
इस बारे में अवसर मिलते ही मैने गुरुवर उनकी इस दशा का कारण पूछा.
गुरुदेव ने बताया कि प्रारब्ध के कारण उनकी एेसी हालत है.
उनका नाम गिरधर था. मैने उनकी उर्जायें कई बार रीड कीं. वे सच्चे संत थे. उनमें साधनाओं की बड़ी क्षमता थी. वे इस हाल में जी रहे थे. बातों बातों में पता चला कि वे जहां रहते हैं. उस जगह पर कोई विवाद चल रहा है. उस पहाड़ का मालिक कोई स्थानीय व्यक्ति है. उसने गिरधर जी को उस जगह की कीमत न देने पर उनकी कुटिया तोड़ देने की वार्निंग दे रखी थी.
ये बात गिरधर जी ने नही बताई. बल्कि उनके साथ रहने वाले दो अन्य सन्यासियों में से एक ने अलग से मुझए बता दी. जिसे सुनकर मेरा मन बड़ा बेचैन हो गया. जिसके दो कारण थे. एक तो ये कि इतने सच्चे साधक होकर उन्हें साधनाओं का फल क्यों नही मिल रहा. दूसरा ये कि गुरुदेव या जोगी महराज ने उनकी कुछ मदद क्यों नही की. वे तो उनके सच्चे मित्रों में से थे.
इस बात ने मुझे उदास कर दिया.
मन में छटपटाहट सी थी.
शाम को जब हम होटल में लौटे तो एक समय एेसा अकेलापन मिला, जब कमरे में मै, गुरुदेव, जोगी महराज और गिरधर महराज ही थे. उसी समय गिरधर महराज ने एक हाथ की बंद मुट्ठी गुरुवर की तरफ बढ़ाई. गुरुदेव समझ गये वे कुछ देना चाहते हैं. गिरधर महराज ने मुट्ठी खोली तो उसमें से सोने की चेन गुरुदेव की हथेली में आ गिरी.
गिरधर महराज मुस्कराते हुए गुरुदेव से बोले उर्जा नायक आपका शिष्य बड़ा दयालू है.
गुरुदेव ने मेरी तरफ देखा.
उनके हाथ में वही चेन थी, जो मैने थोड़ी देर पहले गिरधर महराज के साथी सन्यासी बुलेडराम को दी थी. जब बुलेड़राम जी ने मुझे धनाभाव के कारण गिरधर महाराज के आश्रम के टूटने की आशंका जताई. तो मैने उन्हें गले में पड़ी चेन उतारकर दे दी थी. ये वही चेन थी जो जोगी महराज ने मुझे पहनाया था. मैने उनसे कहा था कि चेन बेचकर आश्रम का कर्ज चुका लें. साथ ही झोपड़ियों की जगह पक्का आश्रम बनावा लें. बुलेड़राम ने मुझे बताया था कि बरसात होने पर पानी झोपड़ियों में भर जाता है. जिससे साधनायें तो दूर रहने तक की जगह नही बचती.
मैने बुलेड़राम जी से आग्रह किया था कि चेन वाली बात वे किसी को न बतायें. चुपचाप आश्रम के लिये उपयोग कर लें. लेकिन वे ठहरे संत. धन की बातें कैसे छिपा लेते. वह भी अपने मित्र सन्यासी से. उन्होंने गिरधर महराज को सब बता दिया.
मेरी पोल खुल गयी.
झिझक के मारे मैने गर्दन झुका ली.
मेरी दशा देखकर जोगी महराज ने कहा तुमने शर्मिंदगी वाला कोई काम नही किया है बच्चे.
फिर वे गुरुदेव से बोले उर्जा नायक आपका ये बच्चा मुझे पसंद आ गया. अगर आप इजाजत दें तो मै इसे स्वर्णेस्वरी साधना कराना चाहुंगा. स्वर्ण सिद्धी के बाद से मुझे पहला पात्र मिला है. जिसकी दिलचस्पी सोने से ज्यादा दूसरों के दुखों में है.
गुरुदेव सिर्फ मुस्कराकर रह गये.
कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने मुझसे कहा तुम्हें क्या लगता है. हम गिरधर जी का सहयोग नही करना चाहते. हम तो खुद ही उनकी दशा से दुखी हैं. मगर ये किसी का सहयोग नही लेना चाहते. कहते हैं अपने प्रारब्ध खुद ही काटेंगे.
एेसे क्या प्रारब्ध हैं. जिनके कारण महराज जी को एेसी स्थिति से गुजरना पड़ रहा है. मैने पूछा.
जवाब गुरुदेव की बजाय जोगी महराज ने दिया. वे बोले मै बताता हूं. मेरे पास आओ.
मै उनके पास जाकर बैठ गया.
खुद ध्यान में बैठते हुए उन्होंने मुझसे कहा समाधि लगाकर बैठ जाओ.
उसी बीच गुरुदेव और गिरधर महराज उस कमरे से उठकर दूसरे कमरे में चले गये.
मै ध्यान में बैठ गया.
लगभग 15 मिनट बाद मेरे मस्तिष्क मेरे मूवी सी चलने लगी. मै कुछ पुराने दृष्य देख रहा था. जिनमें गिरधर महराज भी थे.
दरअसल जोगी महराज मुझे ध्यान में ले जाकर गिरधर महराज का पूर्व जन्म दिखा रहे थे. इससे पहले मैंने अपने पूर्व जन्मों को खुद देखना तो सीखा था। मगर दूसरों का पूर्व जन्म भी देखा जा सकता है। वह भी इतनी क्लीयरिटी से। ये सिद्धि पहली बार देख रहा था।
मैने सब कुछ देखा.
गिरधर महराज ने पूर्व जन्म में क्या किया, जिसके कारण इस जन्म में उन्हें इतनी सख्त सजा मिल रही थी. और वे अपने सक्षम मित्रों की मदद क्यों नही ले पा रहे थे।
ये मै आपको आगे बताउंगा.
क्रमश…
शिव गुरु को प्रणाम
गुरुवर को नमन.
( साधारण से असाधारण बनने के लिये, सक्षम साधनाओं की दुनिया में प्रवेश करें. इस विषय पर सहयोग के लिये हम सदैव आपके साथ हैं. हमारा सम्पर्क- 9999945010… टीम मृत्युंजय योग)
आपका जीवन सुखी हो, यही हमारी कामना है.

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