यज्ञ अग्नि में तपकर रत्न बनते हैं पीढ़यों की दरिद्रता हटाने वाली लक्ष्मी गुटिका

घर में स्थापित करें1412

दरिद्रता श्राप बहुत गम्भीर समस्या होती 
है. पीढ़ियों तक इसका तनाव परेशान करता है. 
गुरू जी बताते हैं कि अक्सर लोगों को दरिद्रता के श्राप से निकलने का तरीका नही मालुम होता. इस दोष के कारण परिवार के लोगों के आभामंडल की 49 में से 18, 19, 20 और 21 वीं पर्तें बेडौल होती हैं. जिसके दुष्प्रभाव से मूलाधार, नाभि, मणिपुर, अनाहत और आज्ञा चक्र प्रायः असंतुलित रहते हैं. उर्जा उपचार करके इन्हें ठीक किया जाये तो भी कुछ समय में पुनः खराब हो जाते हैं. एेसेी स्थिति में पहले तो लोगों के पास धन आने के रास्ते ही नही बन पाते. अगर धन आने भी लगे तो पूरा नही पड़ता. खर्चों के लिये बार बार दूसरों से आस लगानी पड़ती है. कर्ज का तनाव पीछा नही छोड़ता.
हिमालय साधना के दौरान गुरू जी को पहाड़ों में मिले एक सिद्ध संत ने इस श्राप से निपटने का प्रभावशाली उपाय बताया. जिसके अनुरूप हमने नवरात पर लक्ष्मी गुटिका सिद्ध की. रत्न मंहगे होते हैं, ये सभी को पता है. एेसे में उन रत्नों को खोजना जो मां लक्ष्मी की समद्धि देने वाली उर्जाओं से जुड़ने में सक्षम हों. ये समय और धन दोनो ही स्तर पर अत्यधिक खर्चीला साबित होता है. सामान्यतः 100 में 18 से 22 रत्न ही एेसे होते हैं, जो समृद्धि स्थापित करने वाली उर्जाओं का माध्यम बन सकें.
गुरू जी के मार्गदर्शन में एेसे 600 रत्न संकलित किये गये.
नवरात के पहले दिन से श्रीसूक्त की वैदिक ऋचाओं से यज्ञ प्रारम्भ हुए. रत्न को यज्ञ अग्नि में तपाकर लक्ष्मी गुटिका तैयार होती है. विधान के मुताबिक पहले श्रीसूक्त की 5100-5100 यज्ञ आहुतियों से भस्म तैयार की गई. फिर विजय दशमी को पहले से तैयार यज्ञ भस्म के साथ संकलित रत्नों को यज्ञ कुण्ड में रखा गया. उस पर यज्ञ अग्नि प्रज्वलित की गई. दोबारा श्रीसूक्त की ऋचाओं से आहुतियां दी गईं. 
इसी तरह श्रीसूक्त यज्ञ की अग्नि में रत्नों को तपाकर लक्ष्मी गुटिका बनाने का विधान है. सिद्ध हुई लक्ष्मी गुटिका को श्रीयंत्र के नीचे दबाकर रखना होता है.
इस विधान से तैयार लक्ष्मी गुटिका को घर में स्थापित करने से पीढ़ियों से दरिद्रता उत्पन्न कर रही नकारात्मक उर्जायें नष्ट हो जाती है. साथ ही सुख शांति और समृद्धि उत्पन्न करने वाली उर्जायें स्थापित होती हैं. घर में लक्ष्मी गुटिका स्थापित करने वाले लोग आलोचना न करें तो उनके कुल में पीढ़ियों तक समृद्धि का वास रहता है. दीपावली पर इसकी स्थापना को विशेष महत्व दिया गया है. अन्य शुभ अवसरों पर भी इसे स्थापित करने से दरिद्रता नष्ट होती है.
इसके साथ ही मोती शंख को सिद्ध करके स्थापित करने से घर में स्थाई समृद्धि उत्पन्न करने वाली उर्जाओं का वास होता है. साधकों के लिये गुरू जी मोती शंख सिद्ध कर रहे हैं. मोती शंख प्राकृतिक रूप से श्रीयंत्र की आकृति वाला होता है. इसमें लक्ष्मी मां की उर्जाओं को आकर्षित करने की विशेष क्षमता होती है.
सिद्ध मोती शंख को लक्ष्मी गुटिका के ऊपर स्थापित करने से उसके परिणाम कई गुना बढ़ जाते हैं.
जो साधक लक्ष्मी महासाधना में नही आ पा रहे हैं. वे लक्ष्मी गुटिका को मोती शंख के साथ ही स्थापित करेंगे. गुरू जी विशेष रूप से उनके लिये ही मोती शंख सिद्ध कर रहे हैं.
लक्ष्मी गुटिका स्थापित करने की विधि…
1. मूहूर्त- दीपावली की रात गणेश लक्ष्मी पूजन के पश्चात
2. जप- कम से कम एक बार श्रीसूक्त जी का पाठ
3. स्थान- दीपावली के अगले दिन पूजास्थल से उठाकर घर के लाँकर में रखें.
4. विधि- पहले लक्ष्मी गुटिका रखें. उसके ऊपर श्रीयंत्र के आकार वाला मोती शंख स्थापित करें.
5. परहेज- किसी की आलोचना न करें.

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