महायुद्ध की उर्जावाणी-2

 

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चिंतित हिमालयन तपस्वी महाउपाय की तैयारी में जुटे

सभी अपनों को राम राम
महायुद्ध की आहट से वे भी चिंतित हैं जो सामान्य दुनिया से अलग रहते हैं.
वे हैं हिमालय के सिद्ध क्षेत्र में साधनारत तपस्वी. वे महायुद्ध के विनाश से मानवता को बचाने के महा उपाय खोज रहे हैं.
बात को आगे बढ़ाने से पहले बताता चलूं कि ये पोस्ट संकुचित मानसिकता वाले तथाकथित तर्कशास्त्रियों के लिये नही है. जो दुनिया को अध्यात्म और विज्ञान के खुले नजरिये से देखते हैं, वही इन बातों को समझने में सक्षम होंगे.
वैसे तो पूरा हिमालय ही साधना भूमि है. किंतु हिमालय में तपस्वियों का एक एेसा साधना क्षेत्र है जो दुनियावी लोगों को नजर नही आता. क्योंकि उस क्षेत्र का आयाम अलग है. धरती के सामान्य लोग 3 डाइमेंशन तक की चीजें ही देख सकते हैं. हिमालय का ये क्षेत्र उच्च डाइमेंशन में है. उच्च डाइमेंशन धरती पर कई जगह हैं. जहां निरंतर गतिविधियां हैं. मगर सामान्य आंखें उन्हें देख नही पातीं.
दुनिया भर के वैज्ञानिकों को चुनौती देने वाला बरबूडा ट्रैंगिल एेसे ही अलग आयाम में स्थित क्षेत्रों में से एक है. उत्तर पश्चिम अटलांटिक महासागर में स्थित बरमूडा त्रिकोण को शैतान के त्रिकोण के रूप में भी जाना जाता है, जिसमे कुछ विमान और सतही जहाज (surface vessels) गायब हो जाते हैं। अवधारणा है कि वहां एेसा जीवन मौजूद है जिस पर धरती के नियम लागू नही होते. वहां भूमि से परे की जीवित वस्तुओं (extraterrestrial beings) की गतिविधियां हैं.
उच्च डाइमेंशन में फिजिक्स के नियम लागू नही होते. टाइम के नियम लागू नही होते. वहां लोग सैकड़ों नही बल्कि हजारों साल जिंदा रह सकते हैं. उच्च डाइमेंशन की गतिविधियों को बाहर से देखा नही जा सकता, मगर वहां से लाखों किलोमीटर दूर स्थित ग्रहों की गतिविधियों को साफ देखा जा सकता है. जैसे वे दृश्य टी.वी. पर लाइव हों.
हिमालय में स्थित उच्च आयाम क्षेत्र तपस्वियों में सिद्ध क्षेत्र के नाम से संबोधित है. वहां हजारों साल से साधनायें और अध्यात्म विज्ञान पर रिसर्च का काम चल रहा है.
सिद्ध क्षेत्र में सिर्फ तपस्वी ही रहते हैं. उन्हें मोक्ष और उसे प्राप्त करने का सरल व सटीक रहस्य पता है. मगर वे इसके लिये कभी लालायित नही रहते. उनके जीवन का उद्देश्य मानवता की भलाई है. उसके लिये सदैव कार्यरत रहते हैं. वे हमारी दुनिया को मानव लोक कहकर सम्बोधित करते हैं. कभी वे भी मानव लोक में पैदा हुए. यहीं रहकर खुद को इस लायक बनाया कि देवलोक तक विचरण कर सकें.
मानव लोक को वे अपने वंशजों का घर मानते हैं. इसकी भलाई के लिये वे यहां के लोगों से समय समय पर सम्पर्क करते रहते हैं. उनके सम्पर्क का तरीका क्या है और किनसे सम्पर्क करते हैं इस पर हम फिर कभी चर्चा करेंगे.
अभी हम महायुद्ध के बारे में उनसे मिल रहे संदेशों की बात करेंगे. जिस तरह श्रीकृष्ण महाभारत का युद्ध नही टाल सके थे. उसी तरह कलयुग का तीसरा महायुद्ध भी टलता नजर नही आ रहा. ये बात वे जानते हैं. इसीलिये हिमालय के सिद्ध क्षेत्र के सिद्धों ने महायुद्ध के विनाश को कम करने की दिशा में काम शुरू किया है.
हम उसे महा उपाय कहेंगे. जिसमें वे अपनी अध्यात्मक शक्तियों का अधिकतम उपयोग कर रहे हैं.
कुछ सवालों के जवाब पर चर्चा करते हुए आगे बढ़ते हैं.
1. सिद्ध क्षेत्र के तपस्वी मानव कल्याण के लिये खुलकर सामने क्यों नही आते.
जवाब- खुद को दुनियावी नकारात्मकता से दूर रखने के लिये वे सार्वजनिक नही होते. बल्कि अपनी योजना में सार्वजनिक लोगों में से कुछ के साथ लेकर काम करते हैं.
2. जब वे इतने शक्ति सम्पन्न हैं तो क्या लोगों के मन बदलकर महायुद्ध रोक नही सकते.
जवाब- असम्भव कुछ भी नहीं होता. परंतु ब्रह्मांड की बिगड़ी उर्जायें कई बार लोगों के मन इतना बिगाड़ देती हैं कि उन्हें बदला जाना नामुमकिन सा हो जाता है. रावण, कंस, दुर्योधन के मन बदले नही जा सके थे.
3. तीसरा महायुद्ध कब तक शुरू होगा.
जवाब- ब्रह्मांड में इसकी उर्जायें जनवरी 2017 से घनीभूत होनी शुरू हुईं. अगस्त 17 से ब्रह्मांड की अच्छी उर्जाओं का क्षरण शुरूहो रहा है. ये सर्वाधिक खतरनाक पहलू है.
अच्छी उर्जाओं के क्षरण का मतलब है सकारात्मक भावनाओं में कमी. या भावना शून्यता की स्थिति. एेसे में लोग दिल की बजाय दिमाग से अधिक काम लेते हैं. दिल की अनदेखी करके दिमाग से लिये गये फैसले हमेशा सख्त और सबक सिखाने वाले होते हैं. सबक सिखाने की यही प्रवृत्ति विश्व युद्ध तक पहुंचेगी. ये स्थिति डेढ़ साल तक बनी रहेगी.
इसी बीच सितम्बर 2017 से ब्रह्मांड की सुनहरी उर्जा में प्रतिरोधी मिलावट आरम्भ होगी. सुनहरी उर्जा लोगों में प्रेम, अपनापन, क्षमा, दया, मानवता और उन्नति की भावना उत्पन्न करती है. प्रतिरोधी मिलावट से उसका असर घटने लगेगा. ये स्थिति लगभग साल भर रहेगी.
कुछ ही अंतराल अक्टूबर 17 से ब्रह्मांड के सुनहरी उर्जा के क्षेत्र में धुंवे सी काली उर्जायें प्रवेश करेंगी. सुनहरी उर्जाओं में काली उर्जाओं की मिलावट खतरनाक फैसलों का कारण बनती हैं. एेसे फैसले जो लम्बे समय तक तनाव और दुख का कारण बनें. ये प्रभाव अगले दो साल तक बना रहेगा.
इसी बीच सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करने वाली नीली उर्जा का क्षरण शुरू होगा. एेसी स्थिति अक्सर देश, समाज, समुदाय, परिवार के राजा या मुखिया सहित उन लोगों को प्रभावित करती है जो प्रभावशाली पदों पर होते हैं. इसका प्रभाव दो साल तक रहेगा.
इसी दौरान ब्रह्मांड की लाल उर्जा में कई बार नकारात्मक मिलावट होगी. जो प्रभावशाली लोगों में छिपी हुई असुरक्षा उत्पन्न करती है. जिसके तहत वे अपने प्रभाव को बनाये रखने के लिये सख्त फैसले लेते देखे जाते हैं.
अक्टूबर से नवम्बर 17 के बीच राज पदों पर बैठे लोग विशेष रूप से असुरक्षा की भावना से गुजरेंगे. क्योंकि इस दौरान साहस और समझदारी बढ़ाने वाली पीली उर्जा अपने न्यूनतम प्रभाव में होगी. पीली उर्जा में मिलावट या क्षरण से राज पदों पर बैठे लोग अक्सर गलत फैसले लेते देखे गये हैं. एेसे फैसले कई बार राज्यों की तबाही का कारण बने हैं.
उपरोक्त स्थितयों के योग जिस बिन्दू पर घनीभूत हो जाएंगे, वहीं से तीसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका तय हो जाएगी.
विश्व युद्ध का आरम्भ किन्ही देशों के बीच सामान्य युद्ध से होगा.
इसकी वैचारिक नीव अगस्त 17 से अक्टूबर 17 के बीच पड़ जाएगी. मानवता की पोषक सुनहरी उर्जाओं में अक्टूबर 17 से दो साल तक काली उर्जाओं की घुसपैठ बनी रहेगी. इसी दौरान महायुद्ध का खतरा है.
4. क्या महायुद्ध से कलियुग का अंत होगा
जवाब- नही. अभी ये कलियुग का प्रथम चरण है. कलियुग को खत्म होने के लिये एेसे ही तीन चरण और बिताने होंगे. तब कलि अवतार का जन्म होगा.
हिमालय में तपस्यारत मानवता के अदृश्य रक्षक विनाश रोकने के महाउपाय में लगे हैं. महाउपाय की जानकारी मै आगे दूंगा. जिसमें आपकी भूमिका भी होगी.
इस बीच विनाश का संंकट कम करने के लिये सभी शिव साधक
*ऊं. ह्रौं जूं सः सर्वजनम् पालय पालय सः जूं ह्रौं ऊं.*
मंत्र का कम से कम 10 मिनट रोज जाप करें.
महासाधना के साधक दिसम्बर तक इसी मंत्र का जाप करें.
सबका जीवन सुरक्षित हो यही हमारी कामना है.
हर हर महादेव.

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