शरीर छोड़ चुके संत का गुरु जी से सम्पर्क
राम राम, मै शिवप्रिया
गुरू जी इस साल की अपनी हिमालय साधना का पहला चरण पूरा करके वापस आ गये हैं. दूसरे चरण की उनकी हिमालय साधना अक्टूबर में सम्भावित है. हम बात कर रहे हैं सिद्ध शिव साधक, सिद्धों के उर्जा नायक और विश्व विख्यात एनर्जी गुरू राकेश आचार्या जी की दिव्य हिमालय साधना की. साधना से वापस आने पर मैने उनसे साधना वृतांत बताने का आग्रह किया. कई दिनों की व्यस्तता के बाद उन्होंने मुझे वृतांत सुनाना शुरू किया. यहां मै उनका वृतांत उन्हीं के शब्दों में शेयर करुंगी. ताकि उच्च साधकों का मंथन बढ़ें. नये साधकों को प्रेरणा मिले. अध्यात्म के अछूते वैज्ञानिक पहलुओं का रहस्योद्घाटन हो.
वृतांत शुरू करने से पहले मै कहना चाहुंगी कि जो साधक हैं, जो अध्यात्म के जानकार हैं और उसकी गहराईयों से परिचित हैं. उन्हें सच समझते देर न लगेगी. मगर सब कुछ समझ पाना सबके वश की बात नही. इसलिये जिन्हें लगे कि वृतांत उन्हें कल्पना की दुनिया में ले जा रहा है, वे इसे कहानी के रूप में ही देखें. क्योंकि साधना और सिद्धियों के बीच की सच्चाई वे नही समझ सकते जो उस दुनिया के नजदीक से नही गुजरे.
गतांक से आगे…
वैसे तो गुरू जी को पिछली बार की तरह जुलाई में ही हिमालय साधना के लिये जाना था. मगर अपने कुछ अदृश्य अध्यात्मिक मित्रों की सलाह पर उन्होंने एक माह पहले हिमालय साधना शुरू की.
गुरु जी इन दिनों उर्जा पुराण रचने के लिये अनुसंधान कर रहे हैं. जिसमें उनके कई अध्यात्मिक मित्रों का समूह सहयोग कर रहा है. समूह में कुछ अदृश्य मित्र भी हैं. उनमें शरीर छोड़ चुके गुरु जी के छोटे भाई महाराज जी भी शामिल हैं.
वे सिद्ध संत थे.
नाम था सीताशरण दास.
छोटी उम्र में ही सन्यास ग्रहण कर लिया था. बात 1989 की है. उन दिनों गुरू जी प्रिंट मीडिया में जाने माने रिपोर्टर थे. सन्यास ग्रहण करने वाले उनके भाई ठाकुर राजेश सिंह को संत समाज के गुरू से सीताशरण दास नाम मिला. छोटी उम्र में ही उन्हें महंत के पद पर आसीन किया गया. कालातंर में वे हनुमान जी के सिद्ध साधक बने. उन्होंने उच्च सिद्धियां अर्जित कीं.
उनके भक्त उन्हें हनुमान जी का अवतार कहते थे.
उनके अनुयाई उन्हें महराज जी कहकर पुकारते थे. अनुयाइओं की संख्या बहुत बड़ी थी.
महराज जी के नाम पर आज भी उनके भक्त मनौती मानकर उसका फल प्राप्त कर लेते हैं.
महराज जी ने मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ के पास गुरुकुल आश्रम की स्थापना की.
वहां क्षेत्र के गरीब बच्चों की पढ़ाई के साथ ही सन्यास धारण करने वाले संतों के साधना प्रशिक्षण की भी व्यवस्था थी. उनके गुरुकुल में रहकर दर्जनों संत साधनायें किया करते थे.
उन दिनों मध्य प्रदेश का ये क्षेत्र डाकू प्रभावित था. वहां कई ईमानी डाकू गिरोह थे. लूटपाट के दौरान डाकू दहशत फैलाने के लिये लोगों को पीटकर उनकी जान भी ले लेते थे.
एक रात डाकू गिरोह ने आश्रम में हमला किया. उस समय सीताशरण दास जी पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बनी अंडरग्राउंड गुफा में साधना कर रहे थे.
डकैतों ने साधु संतों के साथ मारपीट शुरू कर दी.
संतों की चीख पुकार सुनकर महराज जी गुफा से बाहर निकल आये. उन्हें पता था कि ये जानलेवा हो सकता है. वे ये भी जानते थे कि भूमिगत गुफा में वे सुरक्षित हैं.
मगर उन्हें आशंका थी कि डाकू साधुओं को पीट पीटकर मार डालेंगे.
उन्हें बचाने के लिये ललकारते हुए गुफा से बाहर आ गये.
उनकी ललकार सुनकर डाकू गिरोह उनकी तरफ मुड़ गया.
गुफा के मुहाने पर ही डाकुओं से उनका मुकाबला हो गया.
मुकाबले के दौरान उनका पैर फिसल गया. वे गुफा की सीढ़ियों पर गिर गये.
सिर में गहरी चोट लगी. वे अचेत हो गये.
अंदरूनी चोट ने प्राण हर लिये.
उनके बलिदान ने संतों और शिष्यों को बचा लिया.
डाकू आश्रम छोड़कर भाग गये.
कालांतर में सीताशरण दास जी की अदृश्य चेतना ने गुरू जी से सम्पर्क किया. उनसे अपने कई अधूरे कार्यों को पूरा करने के लिये कहा. उसी प्रेरणा के तहत गुरुजी ने पत्रकारिता के ग्लैमर को छोड़कर अध्यात्म की दुनिया को अपनाया.
अब महराज जी हिमालय की शंगरी ला घाटी की रहस्यभरी अदृश्य दुनिया से जुड़े हैं.
वे अदृश्य अध्यात्मिक रिश्ते के रूप में आज भी गुरू जी का साथ देते हैं. ब्रह्मांड के रहस्यों की जानकारी देते हैं. उर्जा विज्ञान के अनुसंधान में उनकी मदद करते हैं. लोगों के लिये समस्या समाधान में गुरु जी का सहयोग करते हैं. जरूरत पड़ने पर शरीर छोड़ चुके सिद्धों से उनका सम्पर्क कराते हैं.
इसके साथ ही महराज जी के साथ साधनायें करने वाले दर्जनों संत भी उनकी प्रेरणा से गुरू जी के सम्पर्क में हैं. उन संतों ने उच्च सिद्धियां अर्जित की हैं. वे देश के विभिन्न क्षेत्रों में रहकर जनकल्याण कर रहे हैं. जनकल्याण के उद्देश्य में वे गुरु जी के सम्पर्क में रहते हैं.
वे सब सिद्ध संत गुरु जी को उर्जा नायक कहकर सम्बोधित करते हैं.
इस बार महराजजी के सुझाव पर ही गुरु जी ने हिमालय साधना की तिथि बदली. इस बार वे हिमालय साधना के लिये जुलाई की बजाय 15 जून को निकले.
शिवगुरू को प्रणाम
गुरु जी को नमन
आपको राम राम