एक गैर जरूरी साधना-1

गैर जरूरी साधना करने वाले साधु को बैताल ने सजा दी

राम राम, मै शिवप्रिया
क्या गैरजरूरी साधनायें की जानी चाहिये. ये एक विचित्र मगर जरूरी सवाल है. इसका जवाब मुझे गुरु जी के निकट शिष्य शिवांशु जी के एक लेख में मिला. उनके लेख को मै यहां उन्हीं के शब्दों में शेयर कर रही हूं.
शिवांशु जी का लेख…
बात उन दिनों की है जब गुरुदेव ने पत्रकारिता को अलविदा कह दिया. 17 साल के सीनियर रिपोर्टर के कैरियर को उन्होंने एक झटके में छोड़ दिया. मीडिया का ग्लैमर, नाम, सोहरत, पद, प्रतिष्ठा सब एेसे छोड़ा जैसे कभी नाता ही न रहा हो. सब हैरान थे, मै भी. मै फ्री लांस कर रहा था. अध्यात्म के आकर्षण ने गुरुवर को मोह लिया था. कुछ ही दिनों में वे साधनाओं में एेसे रमे कि मित्र अधिकारियों,नेताओं यहां तक कि बेहद निकट पत्रकार मित्रों से भी सम्पर्क तोड़ दिया.
अकेला मै ही था जिसको उन्होंने जोड़े रखा. अरुण जी उनके साथ ही रह रहे थे. पत्रकारिता जगत के दो ही लोगों को उन्होंने अपने सम्पर्क में रखा था.
उनके साथ बिताये दिन बहुत याद आने लगे. पत्रकारों,अधिकारियों,राजनेताओं के साथ होने वाली उनकी चौपालें. इन्वेस्टीगेटिव रिपोर्टिंग के उनके तीखे तौर तरीके, प्रेस कांप्रेंस में उनके सवालों के तेवर, जनसमस्याओं के मुद्दे पर शहर के कोने कोने से जानकारी इकट्ठा करने का उनका तरीका सब कुछ गुजरती यादों का हिस्सा बनने वाला था. कई बार ये सब सोचकर मन बेचैन हो जाता. जैसे बहुत कुछ छूटा जा रहा हो.
बेचैनी की ही दशा में मै एक दिन उनसे मिलने लखनऊ पहुंच गया. तब वे लखनऊ में रह रहे थे.
जब मै पहुंचा उस वक्त गुरुवर कही जाने को तैयार थे.
मैने सोचा था अनानक मुझे देखकर चौक पड़ेंगे.
मगर मुझे देखकर वे मुस्कराने लगे. फिल्मी स्टाइल में बोले बहुत याराना लगता है.
बात बात में मजाक करके माहौल को खुशनुमा बनाये रखना उनकी आदत थी.
मगर आज की मजाक पर मै हंस न सका. आंखों में पानी भर आया.
वे समझ गये. मै उनके बिना उदास था.
तुरंत बोले अरे मेरा शेर रोता भी है. चलो तुमको नई दुनिया दिखाता हूं.
एेसा कहकर वे मेरी गाड़ी की तरफ बढ़ चले. मै उनके पीछे था. मुझसे ड्राइविंग सीट पर बैठने का इशारा करके खुद बगल वाली सीट पर बैठ गये. मैने गााड़ी स्टार्ट करके उनकी तरफ देखा. पूछना चाह रहा था कि कहां चलना है.
उन्होंने एक तरफ इशारा किया और मैने गाड़ी बढ़ा दी.
हम संडीला की तरफ जा रहे थे.
संडीला लखनऊ और हरदोई के बीच में है. वहां के लड्डू बहुत मशहूर हैं. वहां पहुंचकर मैने लड्डू खरीदे. पानी की कुछ बोतलें लेकर गाड़ी में रख लीं. फिर लड्डू खाते हुए आगे बढ़े. मै अभी दो लड्डू ही खा पाया था कि गुरुवर ने गाड़ी रुकवा दी. वहां सड़क किनारे कुछ बच्चे खेल रहे थे. लड्डू के सारे डिब्बे उनमें बांट दिये. मै बचपन से ही संडीला के लड्डूओं की तारीफ सुनता आया था. आज खाने का मौका भी मिला था. सोचा था दिन भर खाउंगा. इसीलिये 6 डिब्बे यानी 3 किलो खरीदे थे. मगर दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम. डिब्बे लेकर गये बच्चे मिलबांटकर खुशी से लड्डू खा रहे थे. मै उन्हें टुकुर टुकुर देख रहा था.
गुरुदेव मेरी मनोदशा भापकर मुस्कराये. बोले कुछ नही आगे बढ़ने का इशारा किया.
वहां से हम परियर की तरफ जा रहे थे.
परियर वो जगह है जहां सीता माता धरती में समा गई थीं. यहीं लवकुश ने युद्ध में भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण सहित राम जी की सेना को पराजित किया था. ऋषि बाल्मीकि के आश्रम में यहीं सीता माता रही थीं. यहीं उनके पुत्रों लव कुश ने राम जी का अश्वमेघ यज्ञ का घोड़ा पकड़ा था. जिसे छुड़ाने आयी राम सेना को हराया. हनुमान जी को भी बंधक बना लिया. भाईयों सहित अपनी सेना के सभी महारथियों की हार की सूचना पाकर अयोध्या नरेश लड़ने के लिये वहां आये. तभी सीता माता सामने आ गईे. राम जी को पता चला कि लव कुश उनके ही पुत्र हैं. उन्होंने सीता माता से पुत्रों सहित अयोध्या वापस चलने को कहा.
मगर तिरस्कार के अपमान से दुखी सीता माता वापस नही गईं. मर्यादा में उन्होंने पति को इंकार नही किया. मगर धरती मां से अपनी गोद में समा लेने का आग्रह किया. धरती फटी और उसकी गोद में समा गई. जहां वे धरती में समाई थीं उस जगह पाताल तक गहरी खाईं बनी. अब उस जगह को सीता कुंड के नाम से जाना जाता है.
परियर पहुंचकर हम सीता कुंड नही गए. जबकि गंगा किनारे की तरफ गये.
किसी युग में यहां डाकू बाल्मीकि का आतंक था. जो उधर से गुजरा वो लूटकर मार दिया गया. बाल्मीकि गिरोह परियर से बिठूर के बीच गंगा की तलहटी वाले इलाकों में काबिज था. बाद में बाल्मीकि को सुधारने के लिये भगवान खुद वहां आये. बाल्मीकि सुधर गये. भगवत लीला में एेसे रमे कि ऋषि पद को प्राप्त किया.
जब हम वहां गये उन दिनों भी रात के समय क्षेत्र में आना सुरक्षित नही था. दूर दराज के इलाके होने के कारण पुलिस वहां नही होती.
गुरुदेव का गांव यहां से कुछ किलोमीटर दूर है. मगर हम वहां नही जा रहे थे. गाड़ी परियर में छोड़कर हम गंगा की धारा की तरफ चलने लगे. एक घंटे चले. वो क्षेत्र गंगा तलहटी के जंगलों का था. लुटेरों का खतरा तब भी था वहां.
गंगा किनारे एक जगह कुछ साधु दिखे. हम वहीं रुके. उनमें जो प्रमुख थे वे गुरुवर को जानते थे. गुरुवर ने उन्हें प्रणाम किया तो मैने भी कर लिया. मुझे दूसरे साधुओं के पास जाने का इशारा करके गुरुदेव मुख्य साधु के पास बैठ गये.
मै जहां बैठा था वहां 4 साधू बैठे थे. वे मुख्य साधु के शिष्य थे. कुछ देर बाद उनमें से एक अपने आप जोर जोर से चिल्लाने लगा. फिर उछलने लगा. उठ उठकर जमीन पर गिर रहा था. कई बार तो एेसा लग रहा था जैसे कोई उसे उठाकर पटक दे रहा हो.
उसकी हालत देखकर मुख्य साधु और गुरुदेव वहां आ गये.
मुख्य साधु अघोरी संत थे. उन्हें लोग अघोरी बाबा के नाम से ही जानते थे.
गुरुदेव ने अघोरी बाबा से पूछा इन्हें क्या हुआ.
इसने गैर जरूरी साधना कर ली है, अघोरी बाबा ने बताया. इसीलिये इस पर बैताल सवार हो गया है. वो इसे सजा दे रहा है.
मै चकित हुआ. साधना भी गैर जरूरी होती है क्या.
गैर जरूरी साधना में बैताल सजा देता है क्या.
सवाल तमाम थे. जरूरी और गैरजरूरी साधनाओं के बारे में मै जानना चाहता था.
सच कहूं तो मुझे लगा कि वो साधु पाखंड कर रहा है या मानसिक रोगी है.
जवाब के लिये मुझे स्थितियां सामान्य होने का इंतजार करना था.
…. क्रमशः

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