वशिष्ठ गुफा: सफल साधनाओं का रहस्य

गुरु जी की हिमालय साधना…8

गुफा में साधना के लिये बैठते ही मै हाई डाइमेंशन से कनेक्ट हो गयी

15 अगस्त 2016, जय हिन्द!

राम राम, मै शिवप्रिया

गुरु जी पिछले दिनों अपनी गहन साधना के लिये देव भूमि हिमालय की शिव स्थली केदार घाटी में रहे। 12 अगस्त को साधना पूरी करके हरिद्वार लौटे। लंबे समय बाद हरिद्वार में हम उनसे मिले। 13 को दिल्ली से उच्च साधकों का एक दल हिमालयन साधना के लिये हरिद्वार गया। मै भी उनमें थी। वहीं गुरु जी से मिलना हुआ। मृत्युंजय योग से जुड़े साधक प्रेरणा ले सकें। इसके लिये मैंने गुरु जी से उनका साधना वृतांत बताने का अनुरोध किया। यहां मै उन्हीं के शब्दों में उनका साधना वृतांत लिख रही हूँ। 

|| गुरु जी ने बताया…||

नीलकंठ के सिद्ध क्षेत्र की साधनायें पूरी करके मै शिव क्षेत्र केदार घाटी पहुँच गया। उससे पहले हरिद्वार के कुछ सिद्ध स्थानों पर साधना के 4 चरण पूरे किये। उनमें एक जगह वशिष्ठ गुफा भी थी। ये गुफा सफल साधनाओं के कई रहस्य समेटे है। हजारों साल से साधक यहां सिद्धियां पाते आये हैं। यहां साधना का अवसर मिलना सौभाग्य की बात है।

वशिष्ठ गुफा जहां ऋषी वशिष्ठ ने सिद्धि अर्जित की थी। ये जगह ऋषिकेश से लगभग 17 किलोमीटर दूर केदार घाटी की राह पर है। गंगा जी के किनारे। ऊँची पहाड़ियों से नीचे उतर कर गंगा किनारे जाएँ तो वहां पहाड़ी गुफा है। प्राकृतिक गुफा। कई हजार साल पुरानी। गुफा के भीतर मौसम की मार का असर नही। बाहर कितनी ही गर्मी हो। गुफा का तापमान सामान्य ही रहता है। बरसात का असर वहां नहीं। सर्दी से भी ऐसे बचा जा सकता है जैसे किसी कमरे में।

साधना के लिये इस प्राकृतिक गुफा की बनावट शानदार है। गंगा जी के किनारे होने के कारण ये अत्यंत ऊर्जावान स्थान है। पानी की पूरी उपलब्धता है। कई सौ फुट ऊँची सीधी पहाड़ी की जड़ में होने के कारण गुफा मजबूत भी है और सुरक्षित भी। गुफा के भीतर रहने की जगह अलग और साधना करने की जगह अलग। साधना के लिये ऐसी उपयुक्त गुफाएं मैंने कम ही देखी हैं।

ऐसे लगता है जैसे सोची समझी योजना के तहत उसका निर्माण किया गया। लेकिन पहाड़ों में ऐसे निर्माण इन्शान नही कर सकता। नेचर ही कर सकता है। इन्शान तो ऐसी जगहों को सिर्फ तलास ही सकता है। 

ऋषि वशिष्ठ ने इसे तलासा। कई हजार साल पहले। क्षेत्र में शेर, चीता, भालू व् दूसरे खतरनाक जानवरों का भय तब भी रहा होगा। आज भी उनसे बचने के लिये सावधान रहना होता है। रात में यहां गतिविधियाँ बंद कर देनी होती हैं।

गुफाओं में रहने वाले लोग पहले गुफा के मुहाने पर आग जलाकर जंगली जानवरों से बचते थे। आग लगातार जलती रहती थी। उसी से प्रकाश करते थे। उसी आग पर वे खाना भी पकाते थे। और आध्यात्मिक हुए तो उसी में यज्ञ भी करते थे। 

साधू संत आज भी इस बहु उपयोगी पद्धति को अपनाते हैं। अब वे इसे धूनी का नाम देते हैं। धूनी जितनी पुरानी हो उतनी ही सिद्ध व् पवित्र मानी जाती है। वे इसी पर यज्ञ करते रहते हैं। इसी में खाना बना लेते हैं। इसी से सर्दी से बचते हैं। कई तरह की बीमारियों से बचाव के लिये इसकी भस्म शरीर पर मलते हैं। इसी की भस्म प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं को देते हैं। 

मान्यता है कि इस गुफा के मुहाने पर स्थित धूनी हजारों साल पहले वशिष्ठ ऋषि द्वारा जलाई गयी थी। उसी के सहारे वशिष्ठ जी ने लंबी साधनाएं कीं। विभिन्न तरह की सिद्धियां अर्जित कीं। उन्होंने यहीं कई लोकहितकारी अनुसन्धान किये। 

उन्हीं के नाम पर गुफा का नाम वशिष्ठ गुफा पड़ा। कालांतर में विभिन्न संतों ने गुफा के बाहर धूनी प्रज्ज्वलित रखी। स्वामी पुरुषोत्तमानंद जी ने 53 साल इस धूनी पर साधनाएं कीं। वे सिद्ध पुरुष थे। उनके शिष्यों ने गुफा के मुहाने पर उनकी मूर्ति स्थापित की है।

वशिष्ठ गुफा न सिर्फ पवित्र है बल्कि आज भी साधनाओं के लिये सिद्ध स्थान है। 

इस गुफा को देखने और इसकी उच्च ऊर्जाओं का लाभ लेने देश विदेश से बड़ी संख्या में लोग आते हैं। 

आज भी गुफा का संचालन संत परंपरा के तहत होता है। वहां की गतिविधियाँ संत चैतन्यानंद जी द्वारा संचालित की जाती हैं। वे स्वामी पुरुषोत्तमानंद जी के शिष्य हैं।

मैंने गुफा के केंद्र में स्थापित सिद्ध शिवलिंग के समक्ष साधना पूरी की। उसके बाद वहां के संत स्वामी चैतन्यानंद जी से मिला। उन्होंने मुझे बताया कि वे 85 साल से अधिक के हैं। उम्र के हिसाब से उन्हें कुछ बीमारियां हैं। आँखों की रोशनी लगातार कम हो रही है। बिलकुल पास आया व्यक्ति ही पहचान में आता है। 

मैंने उनसे उनका संजीवनी उपचार करने की इजाजत मांगी। ताकि शरीर में रोगों की आक्रामकता रुके और शेष जीवन शारीरिक तकलीफों से बचा रहे।

उन्होंने मना कर दिया। बोले ये मेरे प्रारब्ध हैं। इन्हें भोग लेंने दो। मै इन्हें लेकर अगले जन्म में नही जाना चाहता। प्रारब्ध को उपचारित करने की बजाय उन्हें भोग लेना ही उचित होगा है। यही न्यायसंगत है।

मै सोच में पड़ गया। नीलकंठ क्षेत्र में मिले संत ने मुझे लोगों के प्रारब्ध उपचारित करने की सलाह दी थी। ये संत प्रारब्ध उपचारित न किये जाने की तरफदारी कर रहे थे। मुझे पता था कि स्वामी चैतन्यानंद जी लगातार शारीरिक कष्टों की तरफ बढ़ रहे हैं। वे जानते थे कि मै इसमें राहत दे सकता हूँ। फिर भी उन्होंने मुझे अपना संजीवनी उपचार करने की सहमति नही दी। प्रबलता के साथ कहा अब चली चला कि बेला है। जो थोड़े बहुत प्रारब्ध बचे हैं उन्हें निबटा लेने दो। वर्ना अगले जन्म में भोगने पड़ेंगे।

हम काफी देर एकांत वार्ता करते रहे। उन्होंने अपने जीवन के कई अनमोल अनुभव बताये। कई अछूते आध्यात्मिक पक्षों पर चर्चा की। कई महत्वपूर्ण ब्रह्मांडीय रहस्यों की जानकारी दी। संतों और बुजुर्गों के साथ बैठना। उनकी बातें सुनना मुझे बचपन से अच्छा लगता आया है। सही कहें तो ये मेरी पहली पसंद है। 

फिर भी आज मै थोडा असहज सा हुआ। इसके पीछे का विषय था ‘प्रारब्ध’। मुद्दा था इसे उपचारित किया जाये या न किया जाये। 

जवाब के लिये मै केदार घाटी जाने की तैयारी करने लगा।

क्रमशः…।

… अब मै शिवप्रिया। गुरु जी के मार्गदर्शन में 14 अगस्त को उच्च साधकों के साथ मै भी वशिष्ठ गुफा में साधना के लिये गयी। दिव्य गुफा के दर्शन मात्र से सिद्धियों की राह खुलती नजर आयी। गुफा के केंद्र में साधना करने बैठते ही मै हाई डाइमेंशन से जुड़ गयी। पके लिये गुरु जी द्वारा बताया आगे का वृतांत जल्दी ही लिखुंगी।

तब तक की राम राम।

शिव गुरु जी को प्रणाम।

गुरु जी को प्रणाम।

3 responses

  1. Very encouraging and inspiring.

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  2. Ramram shiv guru gi..guru gi guru maa gi shiv priya gi..ramram..guru gi ka anusandhan adbhut hai..kaise guruvar ne hme shiv charcha se joda…samjh me nhi aaya…nhi to pehle face book ka hm miss use hi krte the…or ab sav shiv or ram mayi ho gya hai..ramram

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  3. दिनेश चौहान | Reply

    बहुत बहुत धन्यवाद दीदी जी,
    गुरुजी की साधना का वृत्तांत विवरण हमसे साझा करके हम सभी को धन्य कर दिया आपने ….
    कोटि कोटि प्रणाम।।

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