54 साल पुरानी साधना की सिद्धी मिल गई

गुरु जी की हिमालय साधना…5

गुरु जी इन दिनों अपनी गहन साधना के लिये हिमालय की शिवप्रिय केदारघाटी में हैं। साधना का पहला चरण मणिकूट पर्वत पर कदलीवन में पूरा किया। प्रथम चरण पूरा होने पर पिछले दिनों ऊँची पर्वत चोटिओं से उतरकर हरिद्वार आये। तब फोन पर विस्तार से बात हो सकी। मैंने उनसे अपनी साधना को विस्तार से बताने का अनुरोध किया। जिससे मृत्युंजय योग से जुड़े साधक प्रेरणा ले सकें। साधकों के हित को ध्यान में रखकर गुरु जी ने साधना वृतांत विस्तार से बताना स्वीकार कर लिया। मै यहां उन्हीं के शब्दों में उनका साधना वृतांत लिख रही हूँ। 
|| गुरु जी ने आगे बताया…||

उस दिन पार्वती मन्दिर में साधना पूरी करके मै कुटिया में लौट आया। कुछ देर विश्राम के बाद पहाड़ों पर घूमने निकल गया।

कल भी पहाड़ों पर घूमने गया था। तब मै रास्ता भटक गया। घने जंगलों में चलता चला गया। 

हलांकि वहां टिहरी के पुलिस कप्तान की चेतावनी वाला बोर्ड लगा था। जिसमें उस रास्ते से पैदल पगडण्डी पर जाना मना किया गया था। चेतावनी में बताया गया था कि वहां शेर,चीता,तेंदुआ,भालू, जंगली हाथियों और दूसरे ख़तरनाक जानवरों का खतरा है। 

फिर भी मै उधर ही चला गया। दरअसल जाते समय मै बोर्ड देख ही न सका। वापस लौटते में बोर्ड पर नजर पड़ी।

पगडंडियों पर चलता हुआ ऊंची पहाड़ी के घने जंगलों में पहुँच गया। इस बीच लगभग 1 घण्टे चलता रहा था। 

मेरे कदम तब रुके जब सामने एक पेड़ के पीछे तेंदुवे को गुर्राते देखा। एकाएक तेंदुवे को सामने पाकर मै असहज हो गया। सही कहें तो भयभीत सा हो गया।  इतना कि कुछ देर तक पैरों में कपकपाहट होती महसूस हुई। समझ नही आ रहा था क्या करूँ। 

मै खड़ा रहा। कपड़ों के भीतर पसीने का रिसाव महसूस होने लगा। 

तभी मुझे वीरेंद्र की बात याद आ गयी। मेरी कुटी के पास वीरेंद्र की चाय की दुकान थी। कल ही बातों बातों में उसने कहा था कि यहां जंगली जानवर बेवजह इन्शान पर हमला नहीं करते। उसकी बात से मेरा भय कम हुआ।

मै तेंदुवे को देखता रहा और वो मुझे। उसी बीच मैंने तय किया कि मै तेंदुवे के मस्तिष्क की प्रोग्रामिंग करके उसे रास्ता छोड़ने का निर्देश दूँ। 

कुछ पल यूँ ही बीते।

एकाएक सरसराहट की तेज आवाज हुई और वह छलांग लगाकर पेड़ पर चढ़ गया। 

उस पर एक विशालकाय अजगर ने पीछे से झपट्टा मारा था। मगर तेंदुवे की तेजी ने अजगर को नाकाम कर दिया। अजगर उसके पीछे पेड़ पर सरकने लगा। समझ नही आ रहा था कि पेड़ की मोटाई ज्यादा है या अजगर की। तेंदुआ और ऊंचा चढ़ता गया। फिर पलटकर अजगर की तरफ आक्रामक हो गया।

यह भी नही समझ आ रहा था कि मुझे तेंदुवे ने बचाया या अजगर ने। दरअसल अजगर जिस जगह से आया था वो वही राह थी जहां से मुझे आगे जाना था। अगर तेंदुवे ने मेरी राह न रोकी होती तो घात लगाये अजगर का मै आसान शिकार होता। 

तब मेरे पास बचने के चांस न के बराबर होते। दूसरी तरफ अगर पीछे से अजगर ने हमला करके तेंदुवे को छेड़ा न होता तो शायद वह मुझ पर हमला करता।

मै फैसला न कर पाया किसको धन्यवाद दूँ। मैंने दोनों को धन्यवाद दिया। 

शिव गुरु को साक्षी बनाकर दोबारा अपना औरिक सुरक्षा कवच बनाया। क्योंकि हड़बड़ाहट के कारण पहले से बनाया सुरक्षा कवच टूट चुका था।

मै पीछे लौट पड़ा। आगे 3 पगडंडियां थीं। किस पर जाऊं? ये फैसला नही ले पा रहा था। गलत पगडंडी जंगल में भटका सकती देती। कुछ ही देर में सूरज ढ़लने को थे। अँधेरे में जंगल में चला नही जा सकता। रात में वहां सिर्फ जानवरों की ही सत्ता होती है। 

साथ बने रहने के लिये शिव गुरु को धन्यवाद देकर कहा ‘मुझे सुरक्षित वापस लौटना है। राह दिखाना।’

तभी किसी ने मुझे आवाज दी। आवाज दायीं तरफ से आयी थी। मैंने उधर देखा। वहां एक सज्जन खड़े मुझे बुला रहे थे। 

सामान्य कद काठी। सामान्य पहनावा। बिना जटाओं के लम्बे दाढ़ी बाल। वे दिखने में साधारण थे। मगर मुझे बहुत खास नजर आये। क्योंकि आगे की राह वही दिखाने वाले थे। 

मै अपनी पगडंडी से निकलकर उनकी तरफ आ गया। 

यहां क्या करने आ गए। उन्होंने पूछा तो मैंने बताया टहलने चला आया। 

यहां कोई टहलने नही आता। अँधेरा होने वाला है। कुछ देर में जानवर निकलने लगेंगे। खा जायेंगे। किसी को पता भी नही चलेगा।

मै चुप रहा। 

वे बोले मेरे पीछे आओ। 

मै पीछे चल पड़ा। 

कुछ देर बाद उन्होंने पूछा बाहर से आये लगते हो, क्या करते हो?

मैंने बताया कि संजीवनी उपचार करता हूँ। लोगों के आभामण्डल और ऊर्जा चक्रों को ठीक करके उन्हें समस्याओं से छुटकारा पाने में सहयोग करता हूँ। 

वे रुक गए। पलटकर मुझे ऊपर से नीचे तक गौर से देखा। पूछा आभामण्डल को विस्तारित करना भी जानते हो क्या? 

मै समझ गया कि उन्हें ऊर्जा विज्ञान की जानकारी है। इस बात से मै थोड़ा हैरान भी हुआ। 

जवाब में हाँ कह दिया।

उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोले तो तुमको मेरे लिये भेजा गया है। 

मै चुप रहा।

तुम मुझे आभामण्डल विस्तारित करना सिखाओगे। उन्होंने सीधा सवाल किया।

क्यू। मैंने सवाल के जवाब में सवाल पूछ दिया।

पहले मुझे मेरा आभामण्डल बड़ा करके दिखाओ। वे मेरा परीक्षण करना चाहते थे।

मैंने उनकी इच्छा पर उनका आभामण्डल 20 मीटर बढ़ा दिया। 

उसके बाद मै अचंभित रह गया। आभामण्डल विस्तारित होते ही उन्होंने कुछ मन्त्र पढ़े और मुझसे बोले 32 कदम  की दूरी पर पीले फूलों वाला एक पेड़ है। उसकी जड़ में एक काला पत्थर दबा पड़ा है। उस पर 3 सफ़ेद लाइनें हैं। चलो चल कर देखते हैं। 

मै उनके साथ आगे बढ़ा। उनकी बताई जगह पर वही पत्थर मिला। मैंने पूछा आपने ये कैसे जाना।

उन्होंने बताया कि आज उनकी 54 साल से चली आ रही साधना सिद्ध हो गयी।

उन्होंने 54 साथ पहले दूर दृष्टि यानि दूर की चीजें देख लेने की साधना शुरू की थी। साधना पूरी होने से पहले ही उनके गुरु ने शरीर छोड़ दिया।

इस कारण वे साधना का अंतिम चरण सिद्ध न कर सके। जिसमें आभामण्डल को फैलाना होता है। 

जितनी दूर तक साधक का आभामण्डल होता है वह मन्त्रों की ऊर्जा का उपयोग करके वहां तक की सारी चीजों का पता लगा लेता है। एक तरह से आभामण्डल उसके लिये रडार जैसा काम करता हैं। ऐसा सिद्ध साधक अपने आभामण्डल के दायरे में जमीन के नीचे और आसमान में ऊपर तक की चीजों का पता लगा लेता है। 

मुझे तो ये साधना बड़ी विलक्षण लगी।

मैंने उन्हें आभामण्डल विस्तारित करना सिखाया। उन्होंने मुझे दूर दृष्टि साधना करना सिखाया। आश्चर्यजनक तरीके से कुछ ही देर में उन्होंने आभामण्डल का विस्तार करना सीख लिया। फिर मेरे सामने अपने सिद्ध मन्त्रों के कई परीक्षण किये। हर बार नतीजे सही निकले। 

वे बहुत खुश थे।

मै उन्हें खुश देखकर खुश था।

अंत में मैंने पूछा आप 54 साल से साधनारत हैं। इतनी उम्र तो दिखती नही आपकी। 

जवाब में उन्होंने थोड़ी दूर आगे चलकर एक पौधे की जड़ खोदी। उसमें से लहसुन की तरह छोटे छोटे कन्द निकले। उनकी मिट्टी साफ करके मुझे खाने को दिया। 

मैंने खाया। स्वाद पानी सा था। 

उसे खाते ही। पूरा शरीर एनर्जी से भर गया। पहाड़ चढ़ने से आयी सारी थकान मिट गयी। खुद को बहुत एनर्जाइज फील करने लगा। 

उन्होंने बताया कि वे रोज इसे खाते हैं। जिसके कारण उनकी उम्र का पता नही चलता। साथ ही इस कन्द को खाने से कई कई दिन तक भोजन पानी की जरूरत नही पड़ती। 

फिर उन्होंने मुझे उस पहाड़ी पौधे की पहचान कराई। उनके सामने ही मैंने कई पौधों की जड़ खोदकर कंद निकाले। 

हम दोनों ने खाये। 

बाद में जब तक मै नीलकण्ठ क्षेत्र में रहा तब तक खाता रहा। 

क्रमशः …।

… अब मै शिवप्रिया। 

आपके लिये गुरु जी द्वारा बताया आगे का वृतांत जल्दी ही लिखुंगी।

तब तक की राम राम।

शिव गुरु जी को प्रणाम।

गुरु जी को प्रणाम।

2 responses

  1. shiv priya gi ramram…u hav convey the very amazing intimations for us…really..i am heartly thankful to u…ramram..

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  2. uma shanker yadav | Reply

    jankari achchhi lagi.

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