पाखंड से बचने के लिये चमत्कार का मोह छोड़ें

मुझसे मिलने के इच्छुक लोग नीलकंठ पहुंचेGuru purnima 4
प्रणाम मै शिवांशु
चमत्कार। एक बार मैने गुरुवर से पूछा था उर्जा विज्ञान तो दिखने वाली चमत्कारिक गतिविधियों से भरा पड़ा है. फिर आप लोगों के सामने उनका प्रदर्शन क्यों नही करते. जबकि कई लोग कर रहे हैं.
दिखने वाला चमत्कार निहायत यूजलेस क्रिया है. एेसा गुरुदेव का कहना था. एक व्यक्ति हाथ लहराकर हवा से रसगुल्ला ले आता है. बरफी ले आता है. ताबीज ले आता है. भभूत ले आता है. देखने वाले खुश. नतमस्तक. जमीन में बिछे पड़े हैं.
जरा पूछिये उसके रसगुल्ले से उनका क्या फायदा हुआ. क्या ये चमत्कार देखकर उनके बिगड़े काम बन गये. क्या इसे देखकर उनके रोग मिट गये. क्या इसे देखकर उनका कैरियर सेट हो गया. क्या इसे देखकर कर्ज समाप्त हो गया. क्या इसे देखकर घर की कलह खत्म हो गई.
इससे कोई फर्क नही पड़ता कि जिस चमत्कार को आंखों से देखा गया उसका आधार अध्यात्मिक सिद्धी थी या हाथ की सफाई या उर्जा विज्ञान की तकनीक. सच्चाई ये है कि चमत्कार दर्शन से किसी समस्या का हल नही निकलता. समस्याग्रस्त व्यक्ति के पक्ष में कोई नतीजा नही निकलता. अगर निकलते हैं तो सिर्फ दो गैर जरूरी नतीजे. एक चमत्कारकर्ता लोगों के लिये महत्वपूर्ण बन जाता है. दूसरा चमत्कार के मायाजाल में फंसे लोग आसानी से पाखंड के शिकार बन जाते हैं.
पीड़ितों सेवा करना, उनको राहत देना ही असली चमत्कार है. गुरुदेव एेसा मानते हैं. उनका कहना है कि पाखंड का शिकार होने से बचने के लिये लोगों को चमत्कार देखने की लालसा से मोह भंग करना होगा.
कल रात मैने गुरुवर से एक सवाल किया. क्यों लोग दिखने वाले चमत्कार के पीछे भागना चाहते हैं.
जिज्ञासा। कुछ नया जानने, देखने, पाने की जिज्ञासा. यही व्यक्ति को सर्कस तक ले जाती है. यही व्यक्ति को मूवी थिएटर तक ले जाती है. यही चमत्कार दिखाने वालों तक ले जाती है. जिस तरह से दूर के ढोल सुहाने लगते हैं, उसी तरह से चमत्कार भी तब तक ही आकर्षित करता है. जब तक उसके पीछे की तकनीक सामने नही आती. कोई व्यक्ति किसी एेसी जगह जाये. जहां के लोग मोबाइल का उपयोग नही जानते. वो कान में लगे ब्लू टूथ के जरिये दूर बैठे किसी साथी से वहां की खबरें लेकर लोगों को सुनाये. तो उन्हें चमत्कार लगेगा. अगर लोगों को पता चल जाये कि उन्हें मोबाइल के जरिये खबरें लेकर सुनाई जा रही हैं. तो वे इसे चमत्कार की जगह सामान्य क्रिया मानेंगे.
हाभारत के समय संजय ने दिव्य दृष्टि के द्वारा दूर बैठकर युद्ध का सीधा हाल धृतराष्ट को सुनाया. तब ये चमत्कार था. आज लोग अपने घर में बैठकर टी.वी पर सैकड़ों किलोमीटर दूर घट रही घटनाओं को लाइव देखते हैं. मगर अब इसे चमत्कार नही माना जाता. रही बात उपयोगिता की तो लाइव प्रसारण की तकनीक के चलते एेसी दिव्य दृष्टि की अब जरूरत ही नही बची.
अब मिठाई की दुकानें जगह जगह हैं. इसलिये हवा से रसगुल्ला निकाल लेने जैसे चमत्कार की कोई जरूरत नही. क्योंकि एेसा करने वाले पूरे समाज को खिलाने भर के रसगुल्ले शून्य सिद्धी से पैदा कर लें, ये नही हो सकता. वे तो गिने चुने लोगों को ही हवा से निकली चीजें दे सकते हैं. मैने आजतक किसी भी सिद्ध को हवा से निकाली मिठाई का भंडारा करते नही सुना.गौरतलब है कि हवा से मनचाही वस्तुवें प्राप्त करने की सिद्धी को शून्य सिद्धी कहा जाता है. दूसरी तरफ आजकल एेसा चमत्कार दिखाने वाले अधिकांश लोग शून्य सिद्धी की बजाय हाथ की सफाई का इश्तेमाल करते हैं.
ये कलियुग है. यानी टेक्नोलाजी का युग है. पहले जो उपलब्धियां सिद्धियों से मिलती थीं. अब उनमें से तमाम तकनीक या मशीनों के रूप में दुकानों पर मिल जाती हैं. चमत्कार जैसी दिखने वाली हाथ की सफाई भी एक तरह की तकनीक है. इसी युग में एक समय एेसा भी आएगा जब लोग हाथ में पकड़ी डिवाइस का बटन दबाकर भगवान से सम्पर्क स्थापित कर लेंगे. भगवान को तकनीक के बूते अपने सामने प्रकट कर लेंगे. उनसे अपने सवालों के जवाब ले लेंगे. तभी तो भगवान विष्णु ने नारद मुनि से कहा अध्यात्म के क्षेत्र में अराधना, योग, साधना, समाधि और ध्यान से भी श्रेष्ठ विज्ञान है.
आजकल लोग तुम्हें भी चमत्कारी मान रहे हैं. कल गुरुदेव ने ये बात कही तो मै चौंक गया.
मैने एेसा क्या कर डाला. बहुत झिझकते हुए मैने पूछा.
तुम अपनी साधनाओं को सोसल मीडिया में लिखते हो. उन्हें पढ़कर लोग तुम्हें सिद्ध और चमत्कारी व्यक्ति मानने लगे हैं. अब तुम्हें अपने चाहने वालों के सामने आ जाना चाहिये.
मै निरुत्तर हुआ.
कुछ क्षणों बाद गुरुदेव से सवाल पूछा एेसा क्यों होता है. लोग इतनी जल्दी भ्रमित क्यों हो जाते हैं. तमाम लोग भगवान के बारे में बताने वाले को भगवान से भी बड़ा मान बैठते हैं. उसी के पीछे लग चलते हैं. कुछ की जिज्ञाशा तो इससे भी ज्यादा भटकाऊ होती है. वे तो भगवान से भी संतुष्ट नही होते. एक को छोड़ दूसरे भगवान की तरफ भागते हैं. यहां तक कि कुछ लोग भगवान को भी छोटे बड़े की श्रेणी में चिंह्नित कर लेते हैं. एेसा क्यों. क्या ये कोई पूर्व जन्म का दोष होता है.
नही एेसा नही है. गुरुदेव ने कहा. लोग परेशान हैं. तनाव में हैं. कलियुग तनाव का युग है. यहां लोगों के मुकाबले मशीनें हैं. सो लोगों को मशीनी गति अपनानी पड़ती है. सब जल्दबाजी में होते हैं. यही एक युग है जब लोग गुरुओं के पास ज्ञान लेने की बजाय समस्यायें लेकर जाते हैं. जीवन की रफ्तार तेज होने के कारण समस्याओं को हल कराने के लिये वे प्रकृति के नियमों को नही मानना चाहते. सब अपने टाइमटेबुल से समाधान चाहते हैं. एेसे में वे समाधान देने वाले को अपने ही टाइमटेबुल के मुताबिक चलते देखना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि मंहगे उपायों से समाधान की अवधि घटाई जा सकती है. सो वे ज्यादा धन खर्च करके जल्दी समाधान की कोशिश करते हैं. जबकि समाधान कर्ता को पता है कि किस समस्या में कितना समय लगेगा. जो गुरु या मार्गदर्शक समस्या को जड़ से खत्म करने में विश्वास रखते हैं, वे पीड़ित व्यक्ति के टाइमटेबुल को स्वीकार नही करते. क्योंकि इसमें नाकामी की आशंका होती है.
एेसे में पीड़ित व्यक्ति को लगता है कि यहां से उसका काम नही होने वाला. तो वह समाधान अधूरा छोड़कर दूसरी तरफ भागने लगता है. यही व्यवहार वे भगवान के साथ भी करते हैं. एक मंदिर से दूसरे मंदिर. मंदिर से मजार, गिरजाघर गये. प्रार्थनायें की. मगर उनके टाइमटेबुल के मुताबिक समाधान नही निकला. तो भगवान छोड़कर ज्योतिषी. उसे छोड़कर तांत्रित, उसे छोड़कर गुरु, उसे छोड़कर चेला, एेसे ही चक्कर काटते रहते हैं.
जबकि सच्चाई ये है कि भगवान से प्राप्त उर्जायें सभी समस्याओं को खत्म करने में सक्षम होती हैं. उनसे बड़ा कोई नही. उन उर्जाओं को मेच्योर होकर काम करने का वांछित समय दिया जाये. तो किसी को समस्यायें लेकर मेरे जैसे किसी व्यक्ति के पास जाने की कभी जरूरत नही पड़ेगी.
बस इतना ही कारण है लोगों के भटकाव का.
दूसरे युगों में एेसा नही होता. वहां लोग गुरुओं के पास समस्यायें लेकर बिल्कुल नही जाते. उनके पास ज्ञान और साधनाओं के लिये जाते हैं. वहां लोग समस्या समाधान के लिये पूजा-पाठ, जाप, साधनायें नही करते. तब ये सब सिर्फ भगवत प्राप्ति के लिये ही किया जाता है.
वहां समस्या समाधान के लिये लोग ज्योतिषियों के पास जाते हैं. मगर उन्हें गुरु नही मानते. देव गुरु ब्रहस्पति को ज्योतिष की महारत तो है. मगर उन्हें ज्योतिष के कारण गुरु नही माना गया. दूसरे युगों में ज्योतिषी ग्रह जाप, अनुष्ठान आदि खुद कराते हैं. पीड़ित को ये करने के लिये नही कहते. क्योंकि पूजा-पाठ, साधना, जाप, अनुष्ठान की सफलता के लिये शुद्ध उर्जाओं की जरूरत होती है. पीड़ित की उर्जायें पहले ही खराब व दूषित होती हैं. एेसे में उसके द्वारा की जाने वाली पूजा-पाठ, साधनायें, हवन, जाप आदि प्रायः गड़बड़ ही होते हैं. इसी कारण कई बार एेसे उपाय करने पर लोगों की समस्यायें घटने की बजाय बढ़ जाती हैं.
तो एेसे में लोगों को क्या करना चाहिये. मैने पूछा.
किये गए उपायों के फलित होने का इंतजार करना ही श्रेयस्कर होता है. जिस तरह दवा रोग को हटाने में समय लेती है. उसी तरह उपाय भी समाधान के लिये समय चाहते हैं. गुरुदेव ने कहा. मगर अभी मुद्दा ये है कि तुम उन लोगों से कब मिल रहे हो जो तुम्हे सिद्ध और चमत्कारी मानते हैं.
ये सुनकर मै बहुत लज्जित हूं. क्योंकि जिन लोगों ने गुरुदेव के कारण मुझे पहचाना. उनके बीच अपनी पहचान लेकर जाना गुरु शिष्य परम्परा के प्रतिकूल है. मैने तो सिर्फ जानकारी दी है. अच्छा लिखने का मतलब गुरुवर की बराबरी नही. मैने लिखना भी उनसे ही सीखा था. फिर भी गुरुवर ने ये मुद्दा छेड़ा है. तो एक तरह से उनका ये आदेश है. यकीन मानिये गुरुवर के सामने अपनी पहचान प्रदर्शित करना मेरे वश की बात नही. मेरे लिये ये जीवन की सबसे दुखद घटना होगी. ये तप पद्धति के अनुकूल नही है. वहां तो अपनी पहचान छिपाये रखने वालों को सम्मान मिलता है. गुरुवर तो लोगों की समस्याओं को हल कराने के लिये खुद को सामने लाये. वर्ना आपमें से कोई भी उन तक पहुंच नही सकता था. मै तो समाधानकर्ता हूं ही नही. इसीलिये समस्या के लिये इकट्टठा होने वाले मंच पर खुद को नही लाना चाहता था.
गुरुवर को मै बहुत अच्छे से जानता हूं. उन्होंने कह दिया तो मिलना ही पड़ेगा. आप में से जो लोग मुझसे मिलना चाहते हैं. वे हरिद्वार ऋषीकेष होते हुए नीलकंठ पहुंचे. अज्ञातवास साधना के लिये अगले हफ्ते मै गुरुदेव के एक अन्य अध्यात्मिक शिष्य के साथ वहीं से आगे की यात्रा पर निकलुंगा. वहां से आगे पहाड़ी रास्तों में मेरी पैदल यात्रा होगी. उसकी तैयारी के लिये मै कुछ देर नीलकंठ में रुकुंगा. वहां आप मुझसे मिल सकते हैं.

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