जब मैने गुरुदेव से प्रेत देखने की इच्छा जताई…..5

प्रणाम मै शिवांशु

मैने कहा मुझे प्रेत देखना है. तो गुरुदेव मुझे एेसे घूर कर देखने लगे जैसे मै ही प्रेत हूं.  

मै खामोशी से ड्राइव करता रहा.

कुछ देर बाद वे बोले तुम्हें नही लगता कि तुम कुछ ज्यादा ही दुस्साहसी हुए जा रहे हो.

जब आप के साथ होता हूं तो मुझे किसी से डर नही लगता. मैने कहा.

मुझसे भी नही.

नही

क्यों.

क्योंकि मुझे पता है जरूरत हुई तो आप मुझे अपने गुस्से से भी बचा लेंगे.

हूं, टिकट लेकर चुनाव लड़ जाओ, पालिटीशियन की तरह बतियाना सीख रहे हो.

मैने एेसे रिएक्ट किया, जैसे मेरी तारीफ की गई हो, जिससे मै शरमा गया हूं.

अब ये क्या है. गुरुदेव ने कहा, लड़कियों की तरह शरमा भी रहे हो. तुम्हारे दिमाग में इतनी खुराफात आती कहां से है.

मै चुप रहा.

वैसे तुम्हें एेसा क्यों लगता है कि जो तुम कहोगे, वो पूरा हो गी जाएगा.

जी आपकी वजह से. मैने धीरे से जवाब दिया.

गाड़ी वापस ले लो. गुरुदेव ने कहा. वे जानते थे कि एक बार मैने कुछ करने की इच्छा जता दी, तो जब तक पूरी न होगी तब तक घुमा फिराकर मै उनके पीछे लगा ही रहुंगा.

मै समझ गया कि प्रेत से मेरा आमना सामना कराने के लिये गुरुवर ने बनारस जाने का इरादा बदल दिया है. मैने कार वापस मोड़ दी. उन दिनों गुरुदेव चाय बहुत पीते थे. एेसे समझें कि दिन भर में 100 से भी ज्यादा. सो गाड़ी मोड़ते ही मैने पूछा चाय पी ली जाये.

हूं. गुरुदेव ने छोटा सा जवाब दिया.

मैने गाड़ी चाय की एक दुकान पर रोक दी. मेरा इरादा था कि चाय पीने के दौरान  गुरुदेव से पूछ लूंगा कि अब हम कहां जाना है.

पूछा तो बोले लखनऊ वापस चलो.

चाय पीकर हम चल पड़े.

लखनऊ पहुंचे तो घर जाने की बजाय गुरुदेव ने  कहा नैमिषारण्य चलो. मैने कार सीतापुर रोड की तरफ मोड़ दी.

अब हम नैमिषारण्य जा रहे थे.

नैमिषारण्य लखनऊ से तकरीबन 78 किलोमीटर दूर स्थित बड़ा ही दिव्य तीर्थ स्थल है. दानवों का संहार क्षेत्र होने के कारण इसे नैमिषारण्य कहा गया.

यहां चक्र तीर्थ और त्रिपुरसुंदरी पीठ स्थापित हैं. शास्त्रों में इस जगह को बहुत महत्व दिया गया है.

कहा जाता है कि यहां समय समय पर 88000 से भी ज्यादा ऋषियों ने साधनाएं और अनुसंधान किये. ये गोमती नदी के किनारे स्थित है.

पुरातन काल में एक बार दानवों का आतंक बहुत बढ़ा. वे सारे तीर्थों को नष्ट कर रहे थे. सारे तीर्थ रक्षा के लिये ब्रह्मा जी के पास गये. उन्होंने विष्णु से कहा. भगवान विष्णु ने अपना चक्र चलाया और निर्देश दिया कि चक्र की परिधि में जितना क्षेत्र आएगा. वहां दानवों का बल नष्ट हो जाएगा.

बाद में इसी कारण इस क्षेत्र में हमला करने आने वाले दानव मारे गये.

चक्र नैमिषारण्य में गिरा. उसकी उर्जाएं वहां से 84 कोस के क्षेत्र फल में फैल गईं. जिसे नैमिषारण्य क्षेत्र कहा गया. ये दानवों के लिये निषिध्ध क्षेत्र बना.

सभी तीर्थ असुरों द्वारा नष्ट किये जाने से बचने के लिये नैमिषारण्य क्षेत्र में आ गये. ब्रह्मा जी ने दुनिया के सभी तीर्थों की इसी क्षेत्र में स्थापना करा दी. आज भी सभी तीर्थों का यहां प्रभाव है। उनकी उर्जायें यहां स्थापित मिलती हैं. इसी कारण नैमिषारण्य क्षेत्र की परिक्रमा करने वालों को सभी तीर्थों का फल मिल गया मान लिया जाता है. उसके बाद लोगों को दूसरे तीर्थों में जाने की जरूरत नही बचती.

जहां चक्र गिरा था उसे चक्रतीर्थ कहते हैं.

कथा है कि चक्र धरती को फाड़ता हुआ पाताल की तरफ चला जा रहा था. जिससे पाताल से जल धारा निकल पड़ी. इसे नियंत्रित किया जाना जरूरी था. अन्यथा पाताली जल स्रोत धरती पर जल प्रलय ला देता.

चक्र की गति इतनी तेज थी कि उसे कोई रोक ही नही पा रहा था. तब भगवान शिव से सहायता मांगी गई. उन्होंने चक्र को रोकने के लिये खुद को प्रस्तुत कर दिया. जिससे उनके सिर पर भारी आघात हुआ. आज भी चक्रतीर्थ की परिधि में एक शिवलिंग स्थापित है, जो ऊपर से चक्र के प्रहार के कारण खंड़ित है. कहा जाता है कि ये दुनिया का अकेला शिवलिंग है जिसे खंडित होने के बावजूद पूजा जाता है.

भगवान शिव को आघात पहुंचाकर विनाशकारी गति से बढ़ रहा चक्र उनके त्रिसूल से उलझकर रुक गया.

उस जगह 120 फुट के दायरे में आज भी पानी का कुंड बना है. जिसकी गहराई नापी न जा सकी.  वहा पानी अपने आप पाताल से निकलता रहता है. इसे ही चक्रतीर्थ कहा जाता है. लोग यहां स्नान करके नकारात्मक उर्जाों से मुक्त हो जाते हैं.

हम नैमिषारण्य की तरफ बढ़ रहे थे.

मन में सवाल था. नैमिषारण्य में गुरुदेव मुझे कौन सा प्रेत दिखाएंगे.

इसका जवाब मै आपको आगे दूंगा.

तब तक की राम राम.

सत्यम् शिवम् सुंदरम्

शिव गुरु को प्रणाम

गुरुवर को नमन.

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