गुरुदेव की एकांत साधना: वृतांत…8

राम राम मै अरुण
गुरुदेव की एकांत साधना
शिवांशु जी की बुक से साभार…

गुरुवर की साधना के 16 दिन पूरे हुए।
वे जिस सिद्धी का लक्ष्य लेकर चले थे वह 14 वें दिन ही पूरा हो गया. आमतौर से साधक इस साधना का अनुमानित समय 30 दिन लेकर चलते हैं. कई लोगों को सिद्धी 12 से 25 दिन के भीतर मिल जाती है.
कुछ को 1 माह या कई माह लग जाते हैं. कुछ को कई साल और कुछ को इसे पाने में कई जीवन लगते हैं.
साधना सिद्धी में सफलता ने गुरुवर की आभा कई गुना बढ़ा दी है. उनकी आँखों में गजब का तेज है. उनकी सरलता जादुई सी हो गई है.

उस दिन गुरुदेव ने अपनी साधना में ब्रेक लिया.
ताकि शिव साधक व् शिव साधिका ग्रुप के लोगों को अज्ञात जानने की साधना शुरू करा सकें. अगले दिन WhatsApp के ग्रुप से जुड़े साधकों को अज्ञात जानने की साधना शुरू कराकर गुरुवर पुनः अपनी ध्यान साधना में व्यस्त हो गए.
तीन दिन और बीत गए.

साधना का 20 वां दिन.
वे पिछले 3 दिन से गहन साधना में थे. यह उनकी तीसरी बार शुरू हुई गहन साधना का तीसरा दिन था.
सुबह जल्दी ही मैंने साधना स्थल की सफाई कर दी थी.

लेकिन दोपहर से थोडा पहले मै गुरुदेव के साधना स्थल में दोबारा चला गया.
दरअसल साधना स्थल से बड़ी सम्मोहक सुगन्ध आ रही थी. जिसका कारण जानने की उत्सुकता में मै साधना स्थल पर खिंचा चला गया.
गुरुदेव ने इस बार अपने आसन के पास एक खाली आसन भी लगवाया था. तब मै जिज्ञासा से भरा था. खाली आसन क्यों?

अब मेरे पास इसका जवाब था. एक सपना सा जवाब. अब वह आसन खाली नही था. किसी देवी की प्रतिछाया उस पर विराजमान थी. सुगन्ध उनसे ही आ रही थी. उनकी आभा अत्यंत सम्मोहक थी. मै उनकी पीठ की तरफ था. बाल खुले थे. पहनावा दैवीय था. पीछे से ही उनके अकथनीय रूप रंग की छवि का आभास हो रहा था.
इतना सम्मोहन किसी में कभी नही देखा मैंने.
उनकी झलक मात्र से मै जड़ सा हो गया.
दिमाग काम नही कर रहा था.
क्योंकि ऐसी किसी स्थिति के बारे में गुरुदेव ने पहले कभी कुछ नही बताया था.
मुझे ऐसे दृश्य की कल्पना भी न थी.
मै आगे बढ़ने की हिम्मत नही जुटा पा रहा था. उनके ओज से मेरी आँखे बोझिल होने लगीं.
कितनी देर यूँ ही खड़ा रहा, नही पता.
मै वहां कब बैठ गया, पता नहीं.
आँखे बन्द हो गयीं, दिमाग भी. विचारों का बवंडर कही गुम था.
शायद मै होश खो चुका था. कितनी देर नही पता.
मेरी जगह कोई भी होता तो उसका भी यही हाल होता.
जब आँख खुली तो सामने गुरुदेव खड़े थे. तब तक घण्टों समय गुजर चूका था, मै यूँ ही बैठा रहा था.
अब मेरे चेहरे पर गीलापन था. यानि गुरुवर ने मेरे चेहरे पर पानी डाला था. जिससे मेरी चेतना वापस लौटी.
मैंने दूसरे आसन की तरफ देखा. अब वहां कोई नही था. आसन देखते ही प्रतीत हो रहा था कि उसका उपयोग हुआ है.
मै सवालो से भरा था.
मगर कुछ पूछने से पहले ही गुरुदेव का जवाब आ गया * जो देख लिया वही काफी है तुम्हारे लिये, तुम्हें दोबारा यहां नही आना था.*
मै समझ गया, अब उनसे किसी सवाल का जवाब नही मिलेगा.
तब से गुमशुम सा हूँ, किसी काम में मन नही टिक रहा. जो देखा दिमाग उसे स्वीकार नही कर पा रहा. मगर जानता हूँ ये साधना की डगर है, यहां कुछ भी असम्भव नही.
जिज्ञासा ने मन में आंदोलन छेड़ रखा है.
और…..
गुरुदेव आराम कर रहे हैं.
सत्यम शिवम् सुंदरम
शिव गुरु को प्रणाम
गुरुवर को नमन.

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