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मेरी देवी महासाधना: चौथा दिन

2प्रणाम मै शिवांशु,
देवी शक्ति से अपनापन बढ़ता जा रहा था. जहां कहीं उनकी मूर्ति या तस्वीर दिख जाती, मन अपने आप खुश हो जाता. मानो किसी सगे वाले को देख लिया हो. मन में तरंग और दिमाग में स्टोरी चल रही थी. तरंग इस बात की कि देवी मां मेरी अपनी हैं. स्टोरी एेसी कि देवी शक्तियां अब मेरे लिये हर काम करेंगी. मै जब चाहूं उनका उपयोग करा लूंगा. भरोसा इतना जो खुद पर भी न हो. देवी शक्ति से अपनेपन के मुद्दे पर दिल दिमाग एक हो गए थे.
गुरुदेव कहते हैं कि किसी मुद्दे पर दिल दिमाग एक हो जायें तो वो होकर रहता है.
हर पल देवी मां ही मन मस्तिष्क में छा गई थीं. मै खुद को दूसरों से बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण मानने लगा था. तकरीबन यही पोजीशन सभी साथी साधकों की थी. चौथे दिन की साधना शुरू होने तक कुछ साधक तो सुध बुध भूल चुके थे. उनमें से नित्यानंद जी तो देवी विचारों में इतने खोये कि जो भी सामने दिख जाता उसी के पैर छूने लगते. उन्हें होश ही न था. वे रोज गाय के पैर छूते थे. उस दिन गाय के पास खड़े कुत्ते के भी पैर छूने लग गये. उन्हें भगवती दास ने रोका. जो पास ही खड़े थे.
सबके साथ एेसा ही हो रहा था. किसी के साथ कुछ कम, किसी के साथ कुछ ज्यादा. हम सब थे तो साथ मगर खोये हुए से.
सब अपनी मस्ती में थे.
एेसे में मनो चिकित्सकों का दल साधक दल का परीक्षण करता तो सभी मनोरोगी ठहरा दिये जाते. सभी को ओ.सी.डी. डिक्लियर होती. डाक्टर जबरन हमें लेकर पागल खाने की तरफ चल देते.
मगर हम पागल नही थे. दीवाने भी न थे. बुद्धू तो बिल्कुल न थे.
बस ये नशा था देवी शक्ति का, जो मदहोश किये जा रहा था. जिसे दुनिया का कोई डा. नही समझ सकता. क्योंकि अभी उनकी साइंस इस साइंस से बहुत पीछे है.
महराज जी को शायद इस दशा का अंदेशा था. इसीलिये उन्होंने तीसरे दिन की साधना शुरू होने से पहले ही आदेश जारी कर दिया था कि अब कोई साधक 9 दिन की साधना पूरी होने तक कम्पाउंड से बाहर नही जाएगा. कम्पाउंड हमारी साधना की उड़ान के सामने बहुत छोटा पड़ गया था. हम फिजिकली तो वहीं थे. मगर मन की दुनिया कही और थी. जिसका हमें पता भी न था. मगर उस पर हम अपना अधिकार मान बैठे थे.
महराज जी ने चौथे दिन की साधना शुरू होने से पहले सख्त हिदायत दी कि कोई देवी शक्ति से आशक्ति नही करेगा. इसका मतलब एेसा कुछ होने वाला था. महराज जी के शिष्य उनसे कभी कोई सवाल नही करते थे. वे महराज जी के कहे हुए को पत्थर की लकीर मानते थे. और जैसा का तैसा पूरा करते थे.
मगर मै मन में आये सवाल को पूछे बिना नही रह सकता था. मैने पूछ दिया. महराज जी हम तो देवी को अपनी मां मानते हैं. फिर आशक्ति की बात कहां पैदा होती है.
महराज जी मुस्कराये. बोले इस सवाल का जवाब खुद से पूछो. कल से देवी के प्रति जो खिचाव, लगाव, अधिकार जी रहे हो. क्या वो किसी मां बेटे के बीच हो सकता है.
मै गम्भीर हो गया. महराज जी की बातों में सच्चाई तो थी. बचपन से देवी को मां कहते आ रहे हैं. सो उन्हें मां मान रहे थे. मगर मनोदशा कुछ और ही इशारा कर रही थी. निश्चित रूप से ये देवी पर मां की तरह निर्भरता न थी. बल्कि आशक्ति से भरा अधिकार था.
हमें सतर्क होने की जरूरत थी. देवी शक्ति को जीवन में मातृ शक्ति के रूप में ही उतारना था.
तय समय पर चौथे दिन की साधना शुरू हुई.
आज गले में पड़े यंत्र ने शुरूआती घंटे में ही अपनी उपस्थिति का अहसास कराना शुरू कर दिया. ( यहां ध्यान ऱखें आप में से जो लोग गले में  कुंडली जागरण रुद्राक्ष धारण करके देवी महासाधना कर रहे हैं. उनके साथ भी कुछ एेसा ही हो सकता है. ये रुद्राक्ष आपकी साधना में यंत्र की तरह ही काम करेगा. बस आपको इसकी पवित्रता बनाये रखनी होगी.)
यंत्र ने दूसरे घंटे का मंत्र जाप पूरा होने तक मुझे ब्रह्मांड के दूसरे आयाम की उर्जाओं से जोड़ दिया. जिसके कारण मुझे अंजान आवाजें सुनाई देने लगीं. उन आवाजों को मै न तो जान पा रहा था और न ही पहचान पा रहा था. उनसे न तो डर लग रहा था और न ही खुशी हो रही थी. एेसे समझो जैसे चाइनीज भाषा न जानने वाला कोई व्यक्ति आंखें बंद करके चाइना की किसी बाजार से गुजर रहा हो. वहां के दुकानदार, खरीददार आपस में तेज आवाज में बातें कर रहे हों. जैसा आंखे बंद किये व्यक्ति को लगेगा, कुछ एेसा ही मानें.
उस दिन की पूरी साधना में आवाजें सुनाई देती रहीं. ये मेरा भ्रम बिल्कुल न था. न ही मै किसी कल्पना का शिकार था. मैने कई बार उन्हें ध्यान से सुनकर समझने की कोशिश की. मगर समझ न सका. एक भी शब्द पल्ले नही पड़ा. मंत्र जाप पूरा होने तक अनजानी आवाजों से भी जुड़ाव हो गया. समझ में न आने के बावजूद उनमें भी अपनापन लगने लगा.
चौथे दिन की साधना पूरी होने तक देवी शक्ति के प्रति अपनापन कई गुना बढ़ चुका था. मन देवी के प्रति गहरे भावों से भरा था. मगर आश्चर्य जनक रूप से देवी के दर्शन करने या उनसे मिलने के भाव मन से लगभग समाप्त हो गये थे. लग रहा था देवी तो अपनी हैं. जब चाहेंगे मिल लेंगे.
इसे एेसे समझो कि आप किसी को चाहते हो और उससे मिलने के लिए छटपटा रहे हो. फिर आपको जानकारी मिले कि जिससे मिलना चाहते थे उसे हमेशा के लिये आपके घर में रख दिया गया है. तो मन से छटपटाहट खुद खत्म हो जाएगी. मिलने की हड़बड़ी भी खत्म हो जाएगी. क्योंकि इंशान के मन की संरचना कुछ एेसी ही है. जब तक कोई चीज उसे नही मिलती तब तक वो उस चीज के लिये मचलता रहता है. जब  मिल जाती है तो न्यूटल हो जाता है.
इसका मतलब ये बिल्कुल नही है कि हमारे दिमाग से देवी साधना का क्रेज खत्म हो गया था. बस देवी मां के प्रति संतुष्टी के भाव बढ़ गये थे.
हम पांचवे दिन की साधना की तैयारी में जुट गये. ये बड़ा ही खास दिन साबित होने वाला था. क्योंकि इस दिन की साधना में हमें ब्रह्मांड के अनजाने आयामों को भेदना सीखना था.
क्रमशः.
सत्यम् शिवम् सुन्दरम्
शिव गुरु को प्रणाम
गुरुवर को नमन.
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