शिवप्रिया की शिवसिद्धि…13

शिवप्रिया की शिवसिद्धि…13
मस्तिष्क की दुनिया: यादों का विध्वंस
जवाब मिला यह तुम्हारे मस्तिष्क की दुनिया है। हम ब्रेन के भीतर चल रहे हैं। यहां जब भी तुम विचलित होगी, दुविधा में होगी, भय में होगी या चिन्ता में होगी। तब तुमसे संपर्क कर पाना मेरे लिये कठिन होगा। ऐसे में हमारा साथ छूट जाएगा। मै चाह कर भी तुम तक नही पहुंच पाऊंगा। तुम्हें हर तरफ अंधेरे का सामना करना पड़ेगा।
सभी अपनों को राम राम
शिवप्रिया की साधना का आठवां दिन।
शुरुआती 4 घण्टे का मन्त्र जप शून्यकाल में बीता। उसके बाद उनकी चेतना ने उच्च आयाम में प्रवेश किया। आज भी सूक्ष्म यात्रा के लिये शरीर के भीतर की दुनिया का चयन हुआ था।
काफी देर तक दुविधा और अंधेरे की स्थिति बनी रही। कभी कभी विद्युत प्रवाह सी रोशनी दिख जाती। जैसे आकाशीय बिजली चमककर किसी लम्बी सुरंग में करेंट की तरफ फैलती चली गयी हो। वे उर्जा नाड़ियों के भीतर के रास्ते थे। शिवप्रिया की चेतना उर्जा नाड़ियों में सफर कर रही थी।
वे इस रहस्य से अनजान थीं। सूक्ष्म जगत के मार्गदर्शक अभी तक नही दिखे थे। इसलिये शिवप्रिया खुद को असहज महसूस कर रही थीं। आगे बढ़ने पर मार्गदर्शक की उपस्थिति का अहसास हुआ। अंधेरा छटा। वे दिख गए। शिवप्रिया ने ब्याकुलता में पूछा अब तक कहां थे आप? यहां इतनी उलझन क्यों महसूस हो रही है।
जवाब मिला यह तुम्हारे मस्तिष्क की दुनिया है। हम मस्तिष्क (ब्रेन) के भीतर चल रहे हैं। यहां जब भी तुम विचलित होगी, दुविधा में होगी, भय में होगी, चिन्ता में होगी तब तुमसे संपर्क कर पाना मेरे लिये कठिन होगा। ऐसे में हमारा साथ छूट जाएगा। तुम्हें हर तरफ अंधेरे का सामना करना पड़ेगा।
अब शिवप्रिया वहां हो रही असुविधा का कारण जान चुकी थीं। मार्गदर्शक के प्रति खुद को सहज और दृढ़ किया। उसके बाद मस्तिष्क के भीतर की यात्रा अलौकिक लगने लगी। वहां वे विभिन्न आयामों को पार करते हुए आगे बढ़ते रहे। ऐसा लग रहा था जैसे किसी चमकदार ब्रह्मांड की यात्रा कर रहे हों।
सफर लम्बा था। मंजिल आ गयी। एक जगह कंटेनर के आकार वाले कई उर्जा प्रकोष्ठ दिखे। उनमें पानी सा कोई द्रव्य भरा था। वे पारदर्शी थे। उनके पास जाने पर शिवप्रिया को बड़ा अपनापन सा महसूस हुआ। पूछने पर साधना के मार्गदर्शक ने बताया ये सब तुम्हारी यादें हैं। जो कई जन्मों से इकठ्ठी होती आई हैं। इनमें तमाम यादें ऐसी हैं जो तुम्हें दुख देती हैं। विचलित करती हैं। डराती हैं। चिंता व तनाव का कारण बनती हैं। आगे की साधना के लिये उनका विध्वंस जरूरी है।
उसके बाद मार्गदर्शक द्वारा उर्जा का एक प्रकोष्ठ अलग से तैयार किया गया। उन्होंने शिवप्रिया को निर्देश दिया कि वे अपनी सभी गैरजरूरी यादें उसमें भर दें। शिवप्रिया ने ऐसा ही किया। लगभग 3 घण्टे लगे।
इस बीच उन्हें लगा जैसे अलग अलग जन्मों की घटनाएं इकठ्ठी कर रही हों। सब यादें ताज़ी हो गईं। कई जन्म याद आ गए।
पुरानी यादों को इकठ्ठा करने के दौरान मार्गदर्शक विलुप्त हो गए थे। काम पूरा होते ही सामने आ गए। उन्होंने अपने हाथ में ऊर्जा का एक अस्त्र उत्पन्न किया। उससे उस उर्जा प्रकोष्ठ को नष्ट करने वाले थे, जिसमें शिवप्रिया ने अनगिनत गैरजरूरी यादें एकत्र की थीं। उनमें से कुछ यादों से शिवप्रिया को अभी भी भारी जुड़ाव था। मोह वश वे बीच में आ गईं। मार्गदर्शक ने उन्हें समझाया इस मोह को त्यागना ही होगा।
शिवप्रिया ने अनमनी सी सहमति दी।
मार्गदर्शक ने उर्जा अस्त्र चलाया। गैर जरूरी यादों वाला उर्जा प्रकोष्ठ नष्ट हो गया। उसके साथ ही उनमें भरी यादों का विध्वंस हुआ। शिवप्रिया जिनके खत्म होने के ख्याल से बेचैन थीं, उन यादों के नष्ट होते ही उन्हें दैवीय स्वतंत्रता का अहसास हुआ। लगा जैसे तमाम बंधन खुल गए।
उसके बाद आगे का रास्ता नजर आने लगा। वे उस पर बढ़े। प्रकाश से बने एक कमल पुष्प तक पहुंचे। उसके बीच का हिस्सा सुनहरा था। वहां हर तरफ दिव्यता और प्रशन्नता फैली थी। कमल पुष्प से निकलकर ऊर्जाएं चारो तरफ प्रवाहित हो रही थीं।
मार्गदर्शक ने शिवप्रिया को बताया यह मन की शक्ति है। इसकी ऊर्जाओं में दैवीय शक्तियां होती हैं। जो उर्जा नाड़ियों में प्रवाहित होकर जीवन चलाती हैं। सफलताएं देती हैं। आनंद देती हैं। सुख देती हैं। सिद्धियां देती हैं। मोक्ष देती हैं।
मार्गदर्शक कमल पुष्प रूपी मन की एक पंखुड़ी पर बैठ गए। शिवप्रिया को भी एक पंखुड़ी पर बैठने का इशारा किया। वे बैठीं, किंतु फिसल गईं। ऐसा कई बार हुआ। मार्गदर्शक ने कहा अगले कुछ दिनों तक मन की पंखुड़ियों पर खुद को स्थापित करने का अभ्यास करना है। उन्होंने शिवप्रिया को मन के भीतर आना जाना सिखाया। अपने और दूसरों के लिये मन की शक्तियों का उपयोग करना सिखाया। जिसे जान कर शिवप्रिया को देवी देवताओं की शक्तियों का रहस्य मालूम हुआ।
अगले दिन उनकी चेतना ने अवचेतन मन की दुनिया में प्रवेश किया। वहां की अलौकिक चर्चा हम आगे करेंगे।
शिव शरणं!