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मृत्यु की दो दुनिया

अदृश्य उर्जाओं से नये शरीर का निर्माण

मृत्यु की दो दुनिया हैं। एक इस पार, एक उस पार। मृत्यु के उस पार की दुनिया में इन दिनें मै अपनी दिवंगत पत्नी प्रीति के नये शरीर का निर्माण कर रहा हूं। 29 मई 2026 को उनकी मृत्यु हुई। वे आध्यात्मिक महिला थीं। भगवान शिव उनके गुरू हैं। मृत्युंजय योग संस्थान से जुड़े हजारों साधक उन्हें गुरू मां के रूप में मानते हैं। उनकी मृत्यु से साधक व्यथित हुए। इसलिये हमने उनकी सूक्ष्म चेतना से सम्पर्क का निर्णय लिया। सार्थक सम्पर्क के लिये नये शरीर के निर्माण की जरूरत सामने आयी। शास्त्रों में इसका विधान ढ़ूंढ़ा। उसे अपनाया। निर्माण प्रक्रिया चल रही है। कई अंग निर्मित हो चुके हैं। तेहरवीं तक सम्पूर्ण स्वरूप प्राप्त हो जाएगा।
परिणाम सबके साथ शेयर करता चलुंगा।

– एनर्जी गुरू राकेश आचार्या


[ Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस बृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें। भावुक श्रद्धालु बातों को अपने दिल दिमाग में हावी न होने दें। यह सब परमात्मा की दुनिया की सामान्य व्यवस्था है, ऐसा सोचें।]


मृत्यु। मतलब एक अंत, एक आरम्भ।
अंत दिखने वाले शरीर का। आरम्भ मृत्यु के उस पार की दुनिया का। जहां दोबारा नये शरीर का निर्माण होता है।
मृत्यु हुई। इस दुनिया का शरीर यहीं खत्म कर दिया गया। जला कर, दफनाकर, प्रवाहित कर या किसी अन्य विधि से। यहां से कोई शरीर मृत्यु के उस पार की दुनिया में नही जाता।
तो आगे की यात्रा कैसे हो।
सिर्फ सूक्ष्म चेतना ब्रह्मांड के काम नही कर सकती। एक दुनिया से दूसरी दुनिया में भी नही जा सकती। इस सबके लिये उसे सक्षम आकार चाहिये। जो शरीर के रूप में ही सरल और सटीक होता है।
शास्त्रों में मौजूद ऋषि विज्ञान और देव विज्ञान इसके लिये युगों से उपयोगी तकनीक है। जिसके द्वारा मृत्यु के बाद नये शरीर का निर्माण होता है। यह सरल और अचूक है। आधुनिक विज्ञान चाहे तो इस पर वैज्ञानिक रिसर्च करके अदृश्य दुनियाओं के रहस्य खोल सकती है। वैज्ञानिक सोच और सक्षमता बहुत प्रभावशाली होती है। यदि उन्हें किसी रहस्य का सही क्लू/सूत्र मिल जाये तो वे उसकी तह तक पहुंच जाएंगे।  
अध्यात्म को विज्ञान की तरह उपयोग करने वाले हमारे जैसे लोग आधुनविक साइंस की कारगर मदद कर सकते हैं। हम वैज्ञानिकों को अदृश्य दुनिया की सटीक जानकारी दे सकते हैं। उनके तमाम आयामों का आभास करा सकते हैं। उन्हें प्रमाणित करा सकते हैं। अदृश्य दुनिया की उर्जाओं को बुलाना, उनसे सम्पर्क करना सिखा सकते हैं। इन सबको वैज्ञानिक रूप देने के लिये कुछ यंत्रों/डिवाइस के निर्णाम के सुझाव दे सकते हैं। जिनके द्वारा वैज्ञानिक मनचाहे परिणामों की तरफ बढ़ सकते हैं।

यह कलियुग यानी मशीनों यानी विज्ञान का युग है। एक दिन ऐसा आयेगा जब विज्ञान और अध्य़ात्म एक साथ काम करेंगे। ब्रह्मांड के अनसुलझे रहस्यों को सटीकता से डिकोड कर डालेंगे। उन्हें लोगों के उपयोग के लिये मशीनों के जरिये  सरल बना दें। जैसे पहले कभी दिव्य दृष्टि की सिद्धि होती थी। जिसके द्वारा सिद्ध हुआ साधक दूर बैठकर कहीं की भी घटनायें देख लेता था। महाभारत में संजय ने दिव्य दृष्टि के द्वारा ही महल में बैठकर युद्ध क्षेत्र की सारी घटनायें देखीं और उन्हें धृतराष्ट्र को बताया।
अब इसके लिये किसी को दिव्य दृष्टि की सिद्धी की जरूरत नही। टी.वी., मोबाइल पर लोग दुनिया भर में हो रही घटनाओं को घर बैठे देख लेते हैं।
इसी तरह पहले साधक दूर स्रवण की सिद्धि करते थे। वे दूर से ही लोगों तक अपनी बात कह, सुन लेते थे। अब इसके लिये भी सिद्धि की जरूरत नही। लोग मोबाइल से दुनिया के किसी भी भाग में बैठे लोगों से अपनी बात कह, सुन लेते हैं।
यह कलियुग में ही सम्भव है। कुछ समय बाद अध्यात्म के विद्वान और वैज्ञानिक एक साथ रिसर्च करेंगे। वे युनिवर्स की तमाम दुनियाओं के रहस्य, वहां के जीवन, वहां के साधनों को जान लेंगे। उनसे सम्पर्क कर लेंगे। उनसे साधों की अदला बदली भी कर लेंगे। वहां आ जा भी सकेंगे।
इसी तरह एक आएगा जब विज्ञान मृत्यु के उस पार की दुनिया पर भी काम करेगा। जहां पहुंचते ही सूक्ष्म चेतना के लिये नये शरीर का निर्णाम किया जाता है। गरुण पुराण में इसकी विस्तृत जानकारी है। अन्त्यकर्म श्राद्धप्रकाश में इसकी तकनीक और विधान का विवरण है। ऐसे ही कई अन्य शास्त्रों में भी सूक्ष्म दुनिया में सूक्ष्म शरीर के निर्माण का विधान दिया है। जो वास्तव में वस्तुओं को उर्जा में और फिर उर्जा को शरीर में बदलने का विज्ञान है।
आधुनिक विज्ञान मानता है कि बिग बैंग विस्फोट के बाद उर्जा बिंदु से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ। यानी उर्जा से ग्रह, नक्षत्र, पानी, सोना, चांदी, सभी धातुओं, पेड़, पौधों, मनुष्यों सहित सभी जीवों का निर्माण हुआ और होता जा रहा है।
विज्ञान के मुताबिक उर्जायें वस्तुओं में बदलती हैं और वस्तुवें उर्जाओं में बदलती हैं। यह सिलसिला निरंतर चलता है। यही सृष्टि निर्माण का तरीका है।
इसी तरीके से मृत्यु के उस पार की दुनिया में जीवात्मा के नये शरीर को बनाया जाता है।
आगे हम चर्चा करेंगे कि जीवात्म को नये शरीर की जरूरत क्यों पड़ती है। यह शरीर उनके किस किस काम आता है। क्या इसके द्वारा ही उन्हें दूसरा जन्म मिलता है। क्या वे इसके द्वारा अपने किसी नजदीकी से सम्पर्क कर सकते हैं। क्या मृत्यु के उस पार मिले नये शरीर से वे किसी की मदद कर सकते हैं या किसी से मदद ले सकते हैं। क्या उनका नया शरीर इस दुनिया यानी मृत्यु लोक में उन्हें लेकर आ सकता है। ऐसे ही अन्य सवालों के जवाब और उनके वैज्ञानिक पहलुओं पर अगले अंकों में चर्चा करेंगें।
साथ ही नये शरीर के निर्माण की शास्त्रीय व औरिक तकनीक बताएंगे।
क्रमशः।


लेखक- एनर्जी गुरू राकेश आचार्या