प्रेतों की दुर्दशा

क्या तुम भी वहां प्रेत थी?
यह सवाल मै पिछले महीने पहले शरीर छोड़ गई अपनी पत्नी प्रीति की सूक्ष्म चेतना से पूछ रहा था। जिन्हें मृत्युंजय योग संस्थान से जुड़े साधक गुरू मां के सम्मान से पुकारते हैं।
हां। उनका सूक्ष्म जवाब मिला। वे अपनी सूक्ष्म चेतना के द्वारा जवाब दे रही थीं। उनकी मृत्यु 29 मई 2026 को हुई। उनके जवाब समझने के लिए 28 जून 2026 तक लगातार ऋषि विधान, सूक्ष्म सम्पर्क और उर्जा अभ्यास करना पड़ा।
अब वे बता रही थीं। शरीर से निकलने के कुछ देर बाद ही हम एक अदृश्य दरवाजे के भीतर खींच लिये गये। वहां बहुत जानें (सूक्ष्म चेतनायें) थीं। सब व्याकुल से इधर उधर हवा में उड़ रहे थे। क्या करें, क्या न करें? कुछ समझ नही आ रहा था। कोई ऐसा नही था जिसकी बाड़ी (स्थुल शरीर) हो।
वे सब प्रेत थे। मै भी उन्हीं में थी।
क्या वहां डर लग रहा था? मैने पूछा।
नही डर तो नही लग रहा था। मगर बेचैनी बहुत थी। सभी एक दूसरे से अनजान थे। सब बिना कारण इधर उधर उड़े जा रहे थे। किसी के पास रुकने, बैठने की जगह नही थी। सब स्पेस (अंतरीक्ष) में थे। कोई किसी की तरफ अट्रेक्ट नही हो रहा था। लग रहा था अपना घर भूल आये। भीड़ में खो गये हैं। घर की वापसी नही सूझ रही। उस भीड में कोई अपना नही दिख रहा था। इसी बात की उलझन थी। अपनों की तलाश में सब उड़े जा रहे थे।
क्या घर के लोगों, संस्था के साधकों, बच्चों की याद आ रही थी? मैने पूछा।
नही। उस टाइम कोई भी मेमोरी (यादों) में नही था। उनका सूक्ष्म जवाब मिला। फिर भी बार बार लग रहा था कुछ छूट गया है। कुछ ऐसा जो बहुत जरूरी था। मगर क्या ? यह याद नही आ रहा था। इस कारण भी बेचैनी थी। उस वक्त वहां की दुनिया में इस दुनिया का कुछ भी याद नही था।
वह प्रेतों की दुनिया थी। उन्होंने बताया।
प्रेत मतलब क्या? मैने पूछा। क्या डराने वाले प्राणी? जिनकी आकृति, आकार भयानक हो। एक दूसरे पर हमला करते हों। निर्दोषों को सताते हों।
नहीं। उन्होंने जवाब दिया। वहां प्रेत मतलब बेबी (बच्चा) सूक्ष्म शरीर। जो चोट खाया है। या पूरी तरह क्षत विक्षत है। या अधूरा है। या उसमें बहुत सारी निगेटिविटी है। जिस कारण वह आगे की दुनिया में जाने लायक नही है।
प्रेत मतलब बेबी सूक्ष्म शरीर। इसका सरल मतलब बताइये। मैने उनसे पूछा।
जैसे धरती की दुनिया में तुरंत पैदा हुआ बच्चा नवजात शिशु (न्यू बॉर्न बेबी) कहा जाता है। उसी तरह तुरंत शरीर छोड़ कर उस दुनिया में गई सूक्ष्म चेतना को प्रेत कहा जाता है। उन्हें उस दुनिया के नवजात शिशु समझिये। उन्होंने सरल भाषा में बताया।
यहां की दुनिया में नवजात शिशु को एक मां मिलती है। परिवार के लोग मिलते हैं। मगर वहां काफी देर तक कोई हाल लेने वाला नही होता। इस कारण बेचैन होकर सूक्ष्म चेतनायें इधर उधर भटकती हैं। इसे ऐसे समझें जैसे तुरंत पैदा हुआ बच्चा बिना किसी देखभाल के यूं ही कहीं पड़ा हो। तो भूख और बेचैनी में रो रोकर बुरा हाल कर लेगा।
यानी कि उस दुनिया में प्रेत प्राणी की एक स्थिति है न की डराने वाली प्रजाति। मैने पूछा। तब फिर उन प्रेतों का क्या होता है? कब तक उन्हें यूं ही भटकना पड़ता है?
हां। उनकी दुनिया से जवाब आया। वे डराते नही बल्कि खुद ही डरे से रहते हैं। उनका बुरा हाल रहता है। जिसे प्रेतों की दुर्दशा कह सकते हैं। खुद वे कुछ कर नही सकते। उनकी मदद के लिये कोई सामने आता नही। सूक्ष्म शरीर या तो टूटा फूटा है। या इमोशन लेबिल पर वे बुरी हालत में हैं। उनके सूक्ष्म शरीर में मस्तिष्क नही है। तो उससे जुड़ी कांसियस माइंड की यादें भी नही हैं। मगर उनकी इथरिक बाड़ी में उर्जा चक्रों, अवचेतन शक्ति आदि है। इस कारण इमोशन भी हैं। दुख, बेचैनी है। भटकाव है। यूं तो अवचेतन शक्ति में करोड़ों यादें हैं। किये हुए कर्मों की लिस्ट है। मगर जब तक वह प्रेत (बेबी सूक्ष्म चेतना) है तब तक सब निस्क्रिय।
ऐसा कब तक रहता है। मैने पूछा।
अक्सर 10 दिन तक। उन्होंने अपनी सूक्ष्म चेतना के द्वारा जवाब दिया। इस बीच धरती पर मरने वाले के संबंधी शास्त्रीय विधि से पितृ कल्याण अनुष्ठान करते हैं। जिसमें तर्पण, पिंडदान, श्राद्ध, मंत्र जप, हवन, दान, स्मरण कथा, मर्गदर्शक कथा, प्रार्थनाएं आदि करते हैं। जिनकी उर्जायें प्रेत सूक्ष्म शरीर तक जाती हैं। सूक्ष्म शरीर उर्जाओं से बना होता है। इसलिये यहां से गई पितृ पूजा आदि की उर्जायें प्रेत शरीर का इलाज करने में सक्षम होती हैं। उनसे प्रेत के सूक्ष्म शरीर का पुनर्जनन होता है। हर दिन सूक्ष्म शरीर के अलग अळग अंग बनते हैं। दसवें दिन वह सक्षम और सुंदर उर्जा शरीर को प्राप्त कर लेता है। तब उन्हें आगे की दुनिया में जाने की परमीशन मिलती है।
धरती पर जिनके सम्बंधी मरे लोगों के लिये पितृ अनुष्ठान तर्पण, श्राद्ध आदि नही करते उन प्रेतों का क्या होता है? प्रेत को कब पता चलता है कि उनके सम्बंधी उनके लिये पितृ पूजा, दसवां, तेहरवीं आदि कर रहे हैं। जिन धर्म, पद्धतियों में ये सब नही होता उनका क्या होता है? आगे हम इनके जवाब जानेंगे।
क्रमश:।
Disclaimer: विज्ञान वाले जो लोग अध्यात्म को नही मानते और अध्यात्म वाले जो लोग सुपर पावर के फेर में विज्ञान को छोटा मानते हैं। वे तर्क-वितर्क की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक कहानी मान लें। मन करे तो मात्र मनोरंजन के लिये पढ़ें।
लेखकः एनर्जी गुरू राकेश आचार्या