प्राकृतिक रूप से घुटने झुकने के लिये ही बने हैं.
राम राम, मैं सोमेश
घुटनो के दर्द से आज बहुत लोग परेशान है. कुछ लोगो के तो घुटने बदलने तक की नोबत आ जाती है, ऐसे लोग चलने के लिए भी तरसते है. आज गुरूजी ने घुटने खराब होने का कारण बताया। जिनके घुटने खराब है, वे अपना परिक्षण कर ले.
न झुकने की प्रवृत्ति घुटनों को खराब करती है.
प्राकृतिक रूप से घुटने झुकने के लिये ही बने हैं.
घुटने नही पहचानते हैं कि क्या बुरा है, क्या भला. बस उन्हें मतलब है घुकने की क्रिया है. जब कोई अपनी बातों पर अड़ा रहता है तो घुटनों की इंद्रियां भ्रमित हो जाती हैं. वे अकड़े हुए स्वभाव से अकड़न की कमांड ले लेती हैं. जिससे रुखापन पैदा होता है.
रुखापन घुटनों के लुब्रीकेंट को सुखाने लगता है.
तरलता की कमी घुटनों के लेगामेंट में रुखापन और खिचाव पैदा करता है. जिससे वे कमजोर हो जाते हैं. लेगामेंट के कमजोर होने से घुटनों की हड्डियां आपस में घिसने लगती हैं. जिससे असहनीय पीड़ा होती है.
हडि्डयां घिसते घिसते इतनी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं कि घुटने लगभग काम करना बंद कर देते हैं. तब घुटने बदलने पड़ते हैं.
विशेष रूप से जो लोग शिक्षक होते हैं या विचारक विद्वान होते हैं. उनमें इस बीमारी की आशंका अधिक होती है. क्योंकि जाने अनजाने उन्हें लगता है कि वे जो कह रहे हैं वही सही है. वे अक्सर अपनी बात पर अड़ जाते हैं. हो सकता है वे सही हों.
मगर घुटनों को अड़ जाना रास नही आता.
एेसा व्यक्ति यदि किसी स्तर का प्रभावशाली हुआ तो प्रायः उसके हिस्से के काम दूसरे लोग कर दिया करते हैं. एेसे में कई बार लोग अपना काम दूसरों से कराने भी लगते हैं. जैसे कई शिक्षक अपने हिस्से की परीक्षा की कापियां दूसरों से जंचवाने लगते हैं.
घुटनों में बोझ उठाने की भी प्रकृतिक प्रवृत्ति होती है. वे जीवन भर शरीर का बोझ उठाने को तत्पर रहते हैं. एेसे में अपने काम का बोझ दूसरों पर डालने से घुटनों को अन्यथा संदेश मिलता है. वे शरीर का बोझ उठाने की क्षमता को शिथिल करने लगते हैं. अनायास कमांड ले लेते हैं कि अपना बोझ उठाने की जरूरत नही, उसे तो दूसरे लोग ही उठा लेंगे.
*जिस व्यक्ति के आचरण में उक्त दोनो बातें उतर गईं, उनके घुटने खराब होने से कोई नही रोक सकता*.
सो कोई भी इसके लिये भगवान को बददुआएं न दे. सिर्फ खुद का परीक्षण करें.
आपका जीवन सुखी हो यही हमारी कामना है.