44 में से 18 सन्यासी रिजेक्ट हो गये

18 मई 2016, मेरी कुण्डली आरोहण साधना- 4
प्रणाम मै शिवांशु
बनारस में गुरुदेव के अध्यात्मिक मित्र तुल्सीयायन महाराज कैम्प कर रहे थे. वे सामूहिक रूप से अपने 44 श्रेष्ठ शिष्यों की कुंडली जाग्रत करके उसे ऊपर के चक्रों में मूव कराना चाहते थे। तुल्सीयायन महाराज उच्च कोटि के योगी थे. ध्यान साधना में भी वे सिद्ध थे. मगर ध्यान योग से एक साथ 44 शिष्यों की कुंडली आरोहण में वे सफल नही हो पा रहे थे. क्योंकि उसमें समय अधिक लग रहा था. उन्होंने गुरुवर से उर्जा विज्ञान का सहयोग मांगा. गुरुदेव ने उन्हें सहयोग का आश्वासन दिया. और मुझे उनके सभी शिष्यों की उर्जा जांच करने को कहा.
अब आगे…
मै सभी सन्यासियों की उर्जा को जांचने लगा. सबके आभामंडल और उर्जा चक्रों को स्कैन करके उनके मूलाधार, स्वाधिष्ठान, सहस्रार, और कुंडली चक्र की स्थिति दर्ज करनी थी. लगभग 3 घंटे लगे.
इस बीच गुरुदेव तुल्सीयायन महाराज के साथ कहीं जा चुके थे. हमारा अनुमान था कि शायद वे काशी के महाराज बाबा विश्वनाथ के दर्शन को गए हों. वे पांच घंटे बाद लौटे. इस बीच मै भी कैम्प आश्रम के सन्यासियों के साथ अन्य कार्यों में लगा रहा. गुरुवर कहते हैं संत आश्रम में गया व्यक्ति अगर वहां के काम काज में हाथ न बटायें, या वहां का प्रसाद ग्रहण न करे तो उसे संत कृपा मिलनी लगभग नामुमकिन होती है.
मैने सन्यासियों से कहा मुझे भी आश्रम का कोई काम करने को दें. हलांकि मुझे घाड़ु लगाना, बर्तन धोना, खाना पकाना, कपड़े धोना और एेसे अन्य काम करने नही आते थे. मैने सोचा था मै यहां एक दिन का मेहमान हूं सो ये लोग कोई हल्का फुल्का काम दे देंगे.
मगर वे लोग तो इस मामले में कुछ ज्यादा ही ईमानदार निकले. उन्होंने सीधे मुझे लकड़ियां काटने के काम में लगा दिया. भंडारे में जलाने के लिये कहीं से लकड़ी के लट्ठे लाये गए थे. उन्हें चीरकर जलाने लायक बनाना था. मेरे तो पसीने छूट गए. मैने ये काम कभी नही किया था. वैसे तो जो कुल्हाड़ी मुझे दी गई उसका वजन 2 किलो से ज्यादा नही रहा होगा. फिर भी वो मुझे पहाड़ जैसी लग रही थी. मेरे काम में अनाड़ीपन साफ नजर आ रहा था. कुल्हाड़ी लकड़ी के लट्ठे पर मारते ही इधर उधर उछल जा रही थी. 
10 मिनट. एक भी लकड़ी तैयार न कर पाया. चेहरा पसीने से नहा गया.मै परेशान हो गया. मै थक गया. अब कुल्हाड़ी उठाना मेरे लिये मुश्किल हो रहा था. मुझे बड़ी शर्मिंदगी सी होने लगी कि मै काम तो कर रहा था. मगर उसके नतीजे जीरो थे. 10 मिनट बाद उनमें से एक वरिष्ठ सन्यासी स्वरुपानंद दी मेरे पास आये. मुझे लगा शायद उन्हें मेरी हालत पर तरस आ गया हो.
उन्होंने मुझे पास बैठने को कहा. आपको इसका अनुभव नही है मित्र. थोड़ा विश्राम कर लें.
10 मिनट वे मेरे पास बैठकर अपनी बातों से मेरी थकावट दूर करते रहे. मै मन ही मन सोच रहा था कि शायद अब वे मुझे ये काम न करने को कहेंगे.
मगर एेसा न हुआ. 10 मिनट बाद वे मुझे सिखाने लगे कि लकड़ी कैसे चीरते हैं. पांच मिनट तक उन्होंने लट्ठे पर कुल्हाड़ी चलाई. जलाने लगयक काफी लकड़ी तैयार कर ली. फिर मुझे कुल्हाड़ी पकड़ाकर बोले अभी एेसे ही करना. वे दूसरे काम के लिये चले गये. मै फिर से लकड़ी चीरने लग गया. इस बार मेरी कुल्हाड़ी इधर उधर नही पड़ रही थी. अगले 20 मिनट में मैने कुछ लकड़ियां जलाने लायक बना लीं.
मै थक गया. कुल्हाड़ी वहीं रखकर पानी पीने चला गया. लौटा तो देखा मेरी कुल्हाड़ी से एक अन्य सन्यासी लकड़ी काट रहे थे. यानि कि उस दिन लकड़ियों की जरूरत थी. मै उन्हें लकड़ियों काटते देखने लगा. तो उन्होंने इशारे से पास पड़ी झाड़ू उठाने को कहा. मैने उठा लिया. तो उन्होंने सफाई का इशारा किया. मै समझ गया. उन्हें मेरी हालत पर तरस आया था. और उन्होंने अपना काम मुझसे बदल लिया था. मै झाड़ू लगाने की कोशिश करने लगा. भीतर से आशंकित था कि कहीं इसमें भी फेल न हो जाऊं. क्योंकि मैने पहले कभी झाड़ू भी नही लगाई थी.
सारे काम निपटने के बाद सन्यासियों को मेरे इलाज में जुटना पड़ा. क्योंकि कुल्हाड़ी चलाने से मेरे दायें हाथ की हथेली में दो फफोले से उभर आये थे. उनमें काफी तेज दर्द था. दांया हाथ होने के कारण मै अपनी संजीवनी हीलिंग भी नही कर पा रहा था.
लौटने पर गुरुवर ने मेरा संजीवनी उपचार किया. साथ ही हिदायत दी कि जो काम तुम्हारे वश का नही उसे मत किया करो. संत आश्रम की सेवा के लिये अपने करने लायक काम तुम्हे खुद चुनना चाहिये था. उन लोगों ने तो जो ज्यादा जरूरी था वो काम तुम्हें दे दिया. वे तो सन्यासी हैं. न उन्हें किसी से मोह करना आता है और न ही भेदभाव.
मैने गुरुवर को सन्यासियों की उर्जा रिपोर्ट दी.
मेरी तैयार रिपोर्ट के आधार पर 18 सन्यासियों को कुंडली आरोहण साधना में शामिल होने से रोक दिया गया. उनकी पात्रता कमजोर थी.
क्या पात्रता होती है कुंडली आरोहण की. ये मै आपको आगे बताउंगा. साथ ही बताउंगा कि मै तब उस साधना का पात्र था या नहीं.
 …. क्रमशः ।
सत्यम् शिवम् सुंदरम्
शिव गुरु को प्रणाम
गुरुवर को नमन.

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