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देव बाधा मुक्ति के लिये पारद शिवलिंग का उपयोग हुआ

मेरी कुण्डली आरोहण साधना- 17Anahat
प्रणाम मै शिवांशु
गुरुदेव के अध्यात्मिक मित्र तुल्सीयायन महाराज अपने 44 श्रेष्ठ शिष्यों की कुंडली जाग्रत करके उसका ऊपर के चक्रों में आरोहण कराना चाहते थे। मगर ध्यान योग से एक साथ इतने लोगों की कुंडली आरोहण में वे समय अधिक लग रहा था. सो उन्होंने गुरुवर से उर्जा विज्ञान का सहयोग मांगा. गुरुदेव ने कुंडली आरोहण से पहले सभी साधकों को दूषित उर्जाओं से मुक्त कराया. उसके लिये सबसे पहले ग्रहों की पिंड उर्जाओं कुंडली जागरण रुद्राक्ष के द्वारा साधकों की हथेली पर बुलाया गया. उनके जरिये ग्रहों की दूषित उर्जाओं को ग्रहों पर ही विस्थापित कर दिया गया. जो साधक 19 जुलाई या 19 सितम्बर के कुंडली महासाधना शिविर में आ रहे हैं. वे इस विज्ञान को प्रत्यक्ष जानेंगे और स्वयं करेंगे.
अब आगे….
ग्रहों की दूषित उर्जाओं को हटाने के बाद गुरुदेव ने साधकों को देव बाधा से मुक्ति का अनुष्ठान शुरू कराया. इसे समझने से पहले जान लेते हैं कि देव बाधा होती क्या है. और इसके क्या नुकसान हैं.
अक्सर हमारे पूजा पाठ बिगड़ने से देव बाधा पैदा होती है. इसके कुछ कारण आगे बता रहा हूं.
 
1. अगर कोई व्यक्ति एेसी पूजा पाठ करता है जिनकी उर्जाओं की उसे जरूरत नही होती. तो उनसे प्राप्त गैर जरूरी उर्जायें उसके आभामंडल और उर्जा चक्रों को असंतुलित कर देती हैं. जिसके कारण पूजा पाठ से लाभ होना तो दूर, बने काम भी बिगड़ने लगते हैं. ये देव बाधा का एक रूप है.
 
2. अगर कोई व्यक्ति जरूरत से ज्यादा पूजा पाठ, साधना करता है. तो उससे प्राप्त अतिरिक्त उर्जाएं उसके आभामंडल और उर्जा चक्रों के रंगों के घनत्व को असंतुलित करती हैं. जिससे बीमारियां और गैर जरूरी खर्चों की स्थिति पैदा होती है. ये भी देव बाधा का एक रूप है. ध्यान रखें अति हर चीज की बुरी ही होती है.
 
3. अगर कोई व्यक्ति किसी मनौती, पूजा पाठ, अनुष्ठान या साधना का संकल्प लेकर उसे पूरा नही करता है. तो उसका अवचेतन मन अपने
आप विपरीत कमांड ग्रहण कर लेता है. जिससे अवचेतन शक्ति विपरीत काम करने लगती है. ये स्थिति बहुत खतरनाक है. अपनी ही अवचेतन शक्ति द्वारा जीवन में उथल पुथल मचा दी जाती है. एेसे व्यक्ति को भारी अस्थिरता, समस्याओं और अपयश का सामना करना पड़ता है. ये भी देव बाधा का एक रूप है.
 
4. अगर कोई व्यक्ति बीज मंत्रों का जाप करता है. मगर उसे बीज मंत्रों की छंद ( लय) नही आती या उसका उच्चारण दोष पूर्ण है. तो ब्रह्मांडीय सोर्स से भारी मात्रा में प्राप्त होने वाली उर्जाओं में विकृत्ति उत्पन्न होती है. ये बहुत खतरनाक है. इससे आभामंडल और उर्जा चक्रों पर बहुत ही विनाशकारी असर पड़ता है. शुरूआत में तो जाप करने वालों को कुछ समय अच्छा लगता है. मगर कालांतर में चक्र दुर्दशाग्रस्त होकर अंतहीन बीमारियां और समस्याएं पैदा करने लगते हैं. ये भी देव बाधा का एक रूप है.
 
5. अगर कोई व्यक्ति मंत्रों का उच्चारण दोष पूर्ण करता है. या उसके छंद के विपरीत जप करता है. तो उसी क्षण उर्जा चक्रों में प्रदूषण पैदा होने लगता है. जिससे कामकाज में रुकावटें होती हैं. साथ ही शारीरिक क्षमतायें कमजोर होती हैं.
अक्सर देखने में आता है कि लोग माला जाप के दौरान मंत्रों की गिनती पूरी करने के चक्कर में जल्दी जल्दी जाप करते हैं. क्योंकि जाप बताने वाले ने उन्हें उस मंत्र के छंद की आवृत्ति की जानकारी नही दी होती है. जिससे मंत्र की पूर्व निर्धारित छंद टूट जाती है. एेसे में मंत्र जाप ही समस्याओं का कारण बन जाता है. छंद मंत्र जाप के उच्चारण की लय को कहते हैं. उसके अनुसार ही मंत्र की तरंगे उत्पन्न होती हैं. निर्धारित तरंगों से ही वांछित रंग की उर्जा प्राप्त होती है. यही रंगीन उर्जा चक्रों का जागरण करती है. जाग्रत चक्र बड़ी शक्ति के रूप में काम करते हैं. चक्रों को जगाने को ही अध्यात्म की भाषा में सिद्धी कहा जाता है. गलत तरीके से मंत्र जप करके चक्रों पर बिगड़ी उर्जा बुला ली जाये तो वे दूषित होकर विनाशकारी परिणाम देते हैं. ये भी देव बाधा का एक रूप है.
 
6. जल्दबाजी में की जाने वाली पूजा पाठ, टोका टाकी के बीच की जाने वाली पूजा पाठ, आपस में बातचीत करते हुए की जानी वाली पूजा पाठ, गुस्से में की जाने वाली पूजा पाठ, तनाव में की जाने वाली पूजा पाठ से अर्जित देव उर्जाएं भी दूषित होकर निरंतर समस्याएं पैदा करती हैं. ये भी देव बाधा का एक रूप है.
 
7. नियम, संयम और भली नीयत वाले लोगों के बारे में खराब सोचने से लोगों के आभामंडल में छेद हो जाते हैं. जिससे काम होते होते रुकने लगते हैं. बार बार अपमान का सामना करना पड़ता है. ये भी देव बाधा का एक रूप है.
 
8. जो सिद्ध साधक हैं, संत प्रवृत्ति वाले हैं, आदतन लोगों के लिये हितकारी हैं. उनके खिलाफ सोचने वाले लोगों के भी आभामंडल में छेद हो जाते हैं. जिससे काम होते होते रुकने लगते हैं. बार बार अपमान का सामना करना पड़ता है. ये भी देव बाधा का एक रूप है.
 
9. देव स्थलों की आलोचना करने वाले, वहां तोड़ फोड़ करने वाले, वहां अव्यवस्था फैलाने वाले या वहां गंदगी फैलाने वाले लोगों के आभामंडल टेढ़े हो जाते हैं. एेसे में उन्हें बहुत उतार चढ़ाव का सामना करना पड़ता है. ये भी देव बाधा का एक रूप है.
 
10. हरे पेड़ काटने वाले लोग, नदियों व जलासयों में गंदगी फैलाने वाले लोगों के आभामंडल हमेशा असंतुलित होकर एक ही दिशा में भागते रहते हैं. एेसे में कर्ज और कलह से छुटकारा मिल पाना मुश्किल होता है. ये भी देव बाधा का एक रूप है.
देव बाधा, पितृ बाधा और तंत्र बाधा से मुक्ति के लिये गुरुदेव ने पारद शिवलिंग का उपयोग कराया.
पारद शिवलिंग किस तरह से इन बाधाओं को हटाता है. उसके पीछे का विज्ञान क्या है. ये मै आगे बताउंगा.
 
जो लोग 19 जुलाई और 19 सितम्बर की कुंडली महासाधना में आ रहे हैं, वे अपने साथ अपना पारद शिवलिंग जरूर लायें. जिनके पास पारद शिवलिंग नही है वे शिविर में पहुंचते ही प्राप्त कर लें. अपने पारद शिवलिंग की क्वालिटी जरूर सुनिश्चित कर लें. कम से कम 70- 30 के अनुपात वाला शिवलिंग ही इन बाधाओं की उर्जाओं को हटा पाने में सक्षम होता है.
…. क्रमशः ।
 
सत्यम् शिवम् सुंदरम्
शिव गुरु को प्रणाम
गुरुवर को नमन.