काली मठः जहां बैठते ही कुंडली जागरण हो सकता है

गुरु जी की हिमालय साधना…12

राम राम, मै शिवप्रिया
हिमालय साधना के दौरान गुरु जी ने गुप्तकाशी को अपना मुकाम बनाया. वहां से केदार घाटी के अन्य सिद्ध स्थलों पर जाकर साधनायें कीं. हिमालय साधना से वापस लौटने पर मैने उनसे साधना वृतांत बताने का अाग्रह किया. ताकि मृत्युंजय योग से जुड़े साधक उनके अनुभवों का लाभ उठा सकें. यहां मै उन्हीं के शब्दों में उनका साधना वृतांत लिख रही हूँ।

|| गुरु जी ने बताया…||

शिव सहस्त्र नाम साधना अपने आप में अद्वितीय है. इसमें ब्रह्मांड के सभी देवी देवताओं का समावेश है. मेरा निजी अनुभव है कि इसे करने का मतलब से सारे ब्रह्मांड को पूज लेना. केदारघाटी जाग्रत शक्तियों और सिद्ध जगहों से भरा पड़ा है. गुप्तकाशी में एक कहावत सुनी * जितने कंकर उतने शकर.* अर्थात् घाटी हर पत्थर में शिव उपस्थित हैं. मै घाटी की सभी शक्तियों के साथ अपनी एनर्जी मैच कराने निकला था.

इसी क्रम में काली मठ गया. काली मठ गुप्त काशी से 7 किलोमीटर दूर सरस्वती नदी के तट पर है. गजब की एनर्जी है यहां की. जैसे ही मै काली पिंड के समक्ष साधना करने बैठा, वैसे ही सारे शरीर में करेंट की सी झनझनाहट फैल गई. एेसा लगा जैसे जमीन के भीतर से निकल कर करेंट मेरे शरीर में नाच रही है. उसका केंद्र उर्ध्यगामी था. बड़ा ही विलक्षण और रहस्यमयी अनुभव था.

आपको बताता चलूं कि कुंडली जागरण के लिये इसी तरह से उर्ध्यगामी उर्जा प्रवाह चाहिये होता है. जिसके लिये कुंडली साधक लम्बी लम्बी साधनायें करते हैं. महीनों, सालों और कई बार तो जन्मों तक ये उर्जा प्रवाह नही मिल पाता. प्राकृतिक रूप से उर्जा का एेसा उर्ध्यगामी वेग अपने आप में बड़ा चमत्कार था. बैठे बैठे विचार आया कि इस उर्जा के साथ मै अपनी कुंडली शक्ति का परीक्षण कर लूं. दरअसल मै जानना चाहता था कि ये विशाल उर्जा नीचे कहां से आ रही है. मैने अपनी कुंडली शक्ति का प्रवाह रीढ़ की हड्डी के सहारे निम्न गामी कर दिया. अब मेरी उर्जा उस उर्जा के विपरीत नीचे की तरफ जा रही थी. मेरे भीतर एक कंपकंपा देने वाला विस्फोट हुआ. मेरी कोशिश भंग कर दी गई.

कुछ देर तक मै चेतना शून्यता की स्थित में रहा. जैसे मेरे सोचने समझने की शक्ति हाईजैक कर ली गई हो. भीतरी विस्फोट ने मेरे रोम रोम को कंपा दिया था. जैसे किसी को करेंट का भारी झटका लगने पर होता है. जब दिमाग ने काम करना शुरू किया तो समझ पाया कि ये दो शक्तियों का टकराव था. दूसरे प्रयास के लिये मै खुद को तैयार करने लगा. इस बार मै अपने कुंडली शक्ति को पूरी तरह से केंद्रित करके नीचे उतारने वाला था.

तभी शिव गुरु का निर्देश मिला* एेसा मत करो.*

मैने खुद को रोक लिया. मगर नीचे से ऊपर की तरफ प्रवाहित हो रही विशाल उर्जा के उदगम को जानने की इच्छा बची रही. उसे मैने शिव गुरु के हवाले कर दिया. जैसे ही मेरी वहां की साधना पूरी हुई तो एक पुजारी पास आये. मुझे बताये बिना काली पिंडी से कुमकुम लेकर मुझे तिलक किया. वहीं से उठाकर एक पुष्य दिया. और उस स्थान का महत्व बताने लगे. मै जानना तो चाहता था मगर उनसे इसकी इच्छा नही जताई थी.

उन्होंने बताया कि रक्त बीज और उसकी सेना का संहार करके देवी काली बहुत भयंकर क्रोध को प्राप्त हो गई थीं. वे सामने पड़ने वाले सभी लोगों का संहार करती हुई आगे बढ़ रही थीं. जिससे सृष्टि के संहार का खतरा पैदा हो गया. तो यहां से कुछ दूर आगे भगवान शिव उनके सामने आकर लेट गये. क्रोध में काली मां उन्हें देख नही पायीं और उन पर पैर रख दिया. जब इस बात का अहसास हुआ तो उन्हें बहुत दुख हुआ. इतना कि वे पत्थर सी हो गईं. तब तक वे इस स्थान तक पहुंच गई थीं. यहां वे दुख के मारे जमीन में समा गईं.

यहीं पर नीचे काली कुंड है.कुंड को ढ़ाई फूट आकार के चांदी के बड़े श्री यंत्र से ढका गया है. यही श्री यंत्र नीचे कुंड में जाने का दरवाजा है. यंत्र के ऊपर काली पिंडी स्थापित है. लोग उसी के दर्शन करते हैं. उसी के चारों तरफ साधना स्थल विकसित कर दिया गया है. यहां बड़े बड़े तांत्रिक सिद्धियां अर्जित करने आते हैं. नवरातों में काली कुंड को खोला जाता है. तब नीचे से जबरदस्त शक्तियां निकलती हैं. इसीलिये नवरातों में यहां साधना करा विशेष महत्व है.

अब मुझे पता चल चुका था कि नीचे से आ रही विशाल उर्जाओं का उदगम कहां है. यकीनन अगर मेरी कुंडली पहले से जाग्रत न होती, तो भी यहां साधना के लिये बैठते ही जाग जाती. क्योंकि नीचे से ऊपर उठ रही उर्जाओं का वेग बहुत अधिक था. उस उर्जा की छुवन विद्युतीय थी. जिसके कारण कुंडली को स्ट्रोक मिलता. और ऊपर को जा रहे उर्जा प्रवाह के साथ कुंडली का आरोहण हो जाता।  आज भी जब मै उस जगह के बारे में सोचता हूं, तो मेरे औरिक शरीर में उस विद्युतीय उर्जा का प्रवाह शुरू हो जाता है. यानि कि वहां की साधना के परिणाम स्वरूप मेरी उर्जायें वहां से जुड़ गईं.

अब मै उस जगह पर साधना करने का इच्छुक था, जिसे भगवान शिव ने काली का क्रोध शांत करने के लिये चुना. या दूसरे शब्दों में कहें कि देवी काली की भयानक और विनाशकारी उर्जाओं को स्तम्भित करने के लिये चुना था. वो स्थान मामूली नही हो सकता. एेसा बिल्कुल नही है कि उग्र और प्रज्वलित उर्जाओं को कहीं भी नियंत्रित किया जा सके. उन्हें फ्रीज करने के लिये बहुत ही सक्षम और ठंडी जगह की जरूरत रही होगी. जिसके बारे में भगवान शिव पहले से जानते होंगे. मै वहां साधना करके उन उर्जाओं को अपने औरिक शरीर का अंग बनाना चाह रहा था. मालूम हुआ कि वो जगह काली मठ से तकरीबन 3 किलोमीटर आगे है. जिसे इन दिनों रुच्छ महादेव के नाम से जाना जाता है. दूसरे शब्दों में ये रक्ष यानी रक्षा करने वाले महादेव हैं.

मै रुच्छ महादेव के लिये निकल पड़ा.

क्रमशः…।

… अब मै शिवप्रिया।
आपके लिये गुरु जी द्वारा बताया आगे का वृतांत जल्दी ही लिखुंगी।
तब तक की राम राम।
शिव गुरु जी को प्रणाम।
गुरु जी को प्रणाम।

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