साधक
अपने भीतर के साधक को चेक कर लें…
राम राम मै शिवांशु
गुरुदेव कहते हैं हम सब के भीतर एक शिव हैं. सभी को उसे जगाकर उपयोग में लाना चाहिये. ये बात किसी चमत्कार की नहीं बल्कि जरुरत की है. जब आप खुद को साध लेते हैं तो साधक बन जाते हैं. एक साधक ही अपने भीतर शिव को जगा सकता है.
साधना रहस्य को आगे बढ़ाने से पहले आज कुछ अन्य जरूरी बातें भी कर लेते हैं.
इस ग्रुप का पहला उद्देश्य आपके भीतर के शिव को जगाना ही है.
हमें पता है कि हम आपको बहुत कुछ एेसा देने जा रहे हैं जो अमूल्य है, बदले में आपको भी गुरुकुल मर्यादाओं को अपनाना होगा. हम आपको अपने हृदय में बना कर रखेंगे, और आपके भीतर शिव को जगाकर ही मानेंगे. लेकिन आपको साधक वाला व्यक्तित्व अपनाना होगा.
अन्यथा ये ग्रुप आपके किसी काम का नहीं, दूसरे शब्दों में मै ये भी कहना चाहुंगा कि आप इय ग्रुप के योग्य नहीं. जिनमें साधक के गुणों की कमी मिलेगी उन्हें ग्रुप से हटाये जाने की प्रक्रिया शुरु की जा रही है. ताकि ग्रुप के सच्चे साधकों को उनकी ऊंचाइयों तक बिना रुकावट पहुंचाया जा सके.
अब शिव साधक ग्रुप गुरुकुल मर्यादाओं के मुताबिक ही चलेगा. जो निम्न होंगी. साधक होने के लिये काम काज, घर परिवार या समाज छोड़ देना कतई जरुरी नहीं होता.
1. समस्याएं सबके जीवन में आती हैं. लेकिन एक साधक समस्याओं से अधिक अपने को अपग्रेट करने पर ध्यान देता है. जिससे समस्याएं पीछे छूटती जाती हैं और साधक उनके दुष्प्रभाव से बचते जाते हैं.
2. साधक चाल चरित्र, खाने, सोने, बोलने पर कंट्रोल में सक्षम होते हैं.
3. साधक दूसरों की कमियां नहीं देखते, बल्कि उनकी अच्छाईयों पर ही नजर बनाये रहते हैं.
4. साधक सदैव दूसरों की भावनाओं का सम्मान करते हैं. उनके गुणों को मान्यता देते हैं.
5. साधक कभी भी जल्दबाजी में फैसला नहीं करता. और न ही हड़बड़ी में रहते हैं.
6. एक सच्चे साधक की उर्जायें तमाम दूसरे लोगों का जीवन बदलने में सक्षम होती हैं. जिस तरह से बुरी संगत में रहने से व्यक्तियों का जीवन तबाह हो जाता है उसी तरह साधक की संगत से जीवन स्वतः सुधर जाते हैं.
7. साधक कभी भी अपनी असफलता के लिये दूसरों को दोष नहीं देते.
8. साधक कभी भी अपने मार्गदर्शक या गुरु की अवहेलना नहीं करते. उनके अनुभव का पूरा लाभ लेने के लिए उनकी बताई हुई हर बात को फालो करने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं.
9. साधक भौतिक समस्याओं के लिए ईश्वर या अपने गुरु को कभी भी जिम्मेदार नहीं ठहराते हैं.
आप जांच लें. इनमें कौन सी मर्यादाएं आप में मौजूद हैं. जो नहीं हैं उन्हें अपनाना होगा. इसके लिये जहां जरूरत होगी हम आपका सहयोग करेंगे.
ये ग्रुप विशुद्ध रूप से साधकों के लिए ही रहेगा. जो लोग इन मर्यादाों को नहीं अपना पायेंगे उन्हे ग्रुप से हटाया जाएगा. लोकहित में हम उन लोगों को यह विलक्षण और उच्च ज्ञान देना चाहते हैं जो इसके योग्य ही नहीं.
कुछ लोग ग्रुप में तकरीबन निष्क्रिय से पड़े हैं. ये मानकर कि शायद उन्हें साधनाओं की आवश्यकता नहीं, उन्हें भी ग्रुप से हटाया जा रहा है. क्योंकि हम बिना मांगे ज्ञान नहीं देना चाहते.
साधक सबके भीतर है
सही समय पर गुरु मिल जाये तो बात बन जाये…
3 December 2015
प्रणाम मै शिवांशु
आप में से कई लोगों ने पूछा है कि योग्य साधक कैसे बना जाये. कुछ लोगों ने यक्षिणी साधना की विधि पूछी है. गुरुवर ने इजाजत दी तो यक्षिणी सिद्ध करने की वो विधि जरूर बताऊंगा, जो मैंने अपनाई थी.
मगर पहले साधक की पात्रता पर बात कर ली जाये तो उचित रहेगा. लेकिन इस बारे में सिद्धांत बताऊंगा तो लगेगा कि मै प्रवचन देने बैठ गया. सो आप बीती सुनाता हूँ. शायद इस गूढ़ विषय को समझने के लिये ये तरीका अधिक रुचिकर और सुविधाजनक साबित हो.
तकरीबन15 साल पहले. बात तब की है जब गुरुदेव का रुझान पत्रकारिता से समाप्त सा होने लगा था. तब वे लखनऊ में रह रहे थे. एकाएक उन्होंने पत्रकारिता से जुड़े अपने ज्यादातर साथियों से सम्बन्ध खत्म करने शुरू कर दिये. मुझसे भी. कुछ समय बीता और वे पत्रकारिता की ग्लैमर भरी दुनिया से अलग हो गए.
उनके पत्रकार मित्र और साथी हैरान थे. मगर किसी को उनके अध्यात्म में उतर जाने की खबर न थी. मै बमुश्किल उनसे दोबारा जुड़ पाया. उनसे कई सालों बाद मिला. संतोष हुआ कि उनके मन में मेरे लिये स्नेह कम न हुआ था. मगर वे पूरी तरह बदल चुके थे. तेज तर्रार पत्रकारों वाले तेवरों की जगह शांत और सिद्ध साधक ने ले ली थी.
उन दिनों वे एक श्मशान साधना कर रहे थे. मैंने सुन रखा था श्मशान साधनाओं में शराब और मांस अनिवार्य होता है. पत्रकारिता के 10 बरस के साथ के दौरान उन्हें कभी शराब, मांस को हाथ लगाते न देखा था. सो मन आशंकाओं से भर गया. क्या उन्होंने इन सबका उपयोग शुरू कर दिया?
गुरुवर ने साधना के दौरान मुझे अपने साथ श्मशान में रहने की अनुमति दे दी. मै उनके साथ 2 रात श्मशान में रहा. उनकी साधना में एक भी ऐसी चीज का प्रयोग नही हुआ जो नॉनवेज के दायरे में हो. मन को बड़ी तसल्ली मिली. श्मशान साधना रहस्य सामने आया तो मेरा भी दुनियादारी से मोह भंग होने लगा.
श्मशान में चमत्कार देखकर मेरे भीतर का भी साधक मचल उठा.
मैंने गुरुदेव से एक बार फिर शिष्य के रूप में स्वीकार करने की जिद शुरू कर दी. उन्होंने कहा ये पत्रकारिता नही है जो तुम अपने रसूख के बूते इसमें घुस जाओगे. ये दुनिया अलग और अविश्वसनीय है. दोस्तों और अपनों के बीच हंसी के पात्र हो जाओगे. सो यहां से दूर ही रहो.
मै न माना. पहले भी मेरी जिद के सामने झुककर उन्होंने मुझे स्वीकार था और पत्रकारिता सिखाई थी. फिर स्वीकार किया और अध्यात्म सिखाने को तैयार हो गए. मगर शर्त थी कि मुझे अपनी पात्रता साबित करनी होगी.
मै निश्चिन्त था. क्योंकि पहले भी वे मुझे जो निर्देश देते थे उनके बारे में भला बुरा सोचे बिना कर डालता था. सोचा कि अभी भी ऐसा ही करना होगा.
मै अक्सर उनके साथ साधनाओं में रहने लगा. उस दौरान ब्रह्माण्ड के जिन रहस्यों से आमना सामना हुआ उन्हें देखकर मै साधना विज्ञान का दीवाना हो गया. अब बाहरी दुनिया में अच्छा ही नही लगता था. 24 घण्टे उनके सम्पर्क में रहने का मन करता था.
रोज अर्जी लगता था कि कोई एक सिद्धी करा दीजिये. उनका एक ही जवाब होता. इंतजार करो. इसे सुनकर मन में बड़ी बेचैनी हो जाती. विचार आता मै तो इनके लिये जान तक देने को तैयार हूँ. जो कहें वो सबकुछ करने को तैयार हूँ. फिर ताल मटोल क्यों कर रहे हैं. कई बार तो पत्रकारों की तरह सोच डालता कि लगता है इनके पास मुझे सिद्ध करने लायक कुछ है ही नही.
कई माह बीत गए.
एक दिन उनके जवाब से क्षुब्ध होकर सोचने लगा अब गुरुवर में वो बात नही रही. शायद अब वे मुझे कुछ दे ही नही सकते. उस समय गुरुदेव सामने ही बैठे थे. एकाएक बोल पड़े. मै तुम्हें क्यों दूँ ? मै सकपका गया. मतलब साफ था कि उन्होंने मेरा मन पढ़ लिया. वे कहते जा रहे थे तुम्हारा कोई कर्ज है मुझ पर ? मै तुम्हारा गुलाम हूँ ? या मैंने अपना जीवन तुम्हारे नाम किया हुआ है ? जिसे तुम मेरे प्रति अपना समर्पण या भक्ति मानते हो उसमें इतना दम नही जो मै तुम पर अपना कीमती समय खर्च कर दूँ. पहले इस तथाकठित भक्ति, समर्पण में से ‘कुछ पाने’ की भावना हटाओ तब मेरी साधनाओ के लायक बन पाओगे. तुम पाना तो वो चाहते हो जिससे दुनिया जीत लो, मगर बदले में थोडा समय भी खर्च कर पाने की सामर्थ्य नही. जाओ दोबारा मत आना.
और उन्होंने मुझे भगा दिया. दो साल तक मै उनसे मिलने के लिये छटपटाता रहा. मगर उन्होंने टाइम नही दिया.
इस बीच वे लखनऊ से दिल्ली शिफ्ट हो गए. अब मेरे पास न उनका कांटेक्ट नं. था और न ही पता. मै भी गुरुवर के उन साथियों की सूची में आ गया जो चाहकर भी उन तक पहुंच नही सकते थे.
4 December 2015
साधक सबके भीतर है 2
अपने समर्पण को गुरु पर एहसान न समझें.
प्रणाम मै शिवांशु…
दो बरस की तड़पन मेरे लिये बड़ी दुखदायी थी. हर दिन दुनिया में होते हुए भी लगता था कि यहां मेरा कोई नही. इतनी छटपटाहट तो शायद प्रेम सम्बंधों की जुदाई में भी न होती होगी.
दो सालों में खुद से एक सवाल 2 हजार से भी अधिक बार पूछा. मुझे या किसी को साधना सिद्ध कराने के पीछे गुरुदेव के मन में क्या लालच पैदा किया जा सकता है. धन देकर या उनकी सेवा करके. अच्छे भोजन का लालच या आभूषण का लालच. उनकी जय जयकार का लालच या उनको सम्मानित करके.
जवाब न मिला.
खुद से जो जवाब मिलते थे वे कुछ यूं थे – जो हमें धनवान बनने की साधना सिद्ध करा सकते हैं. वे अपने जीवन में धन तो खुद ही उत्पन्न कर लेंगे. साधक के धन की उनको जरूरत कहां. जो ब्रह्मांडीय शक्तियों को सिद्ध करा सकते हैं उन्हें साधक की सेवा की जरूरत कहां. वे तो खुद ही दूसरों की समस्यायें हल करते रहते हैं. जिन्होंने कई सालों से भोजन ही छोड़ रखा है उनको साधक के भोजन की जरूरत ही कहां. जो आभूषण पहनते ही नहीं उन्हें साधक के आभूषण की जरूरत ही कहां. जो अपनी साधना की खातिर एकांत को अधिक पसंद करते हों उन्हें साधक के जयकारे की जरूरत ही कहां. जिनके साथ नाम जुड़ जाने भर से किसी का सिर फक्र से उठ जाता हो उसे साधक के सम्मान की जरूरत ही कहां.
तो क्या गुरुवर को अब कभी मेरी जरूरत नहीं पड़ेगी. वे कभी मुझे अपने पास न आने देंगे. बस यही वो विचार था जिससे मै तड़प जाता था. हर वक्त सोचता था एेसा क्या करूं, एेसा क्या दूं जो उन्हें रिझा सके.
ईश्वर हों तो उन्हें प्रार्थनायें करके मना लूं. पर ये तो ईश्वर तक पहुंचने की राह हैं. जो दूसरों को ईश्वर तक पहुंचाने की राह आसान कर देता हो उसे कोई देना भी चाहे तो क्या दे? इन सवालों ने मुझे हरा दिया. भौतिक जीवन में एेसा कुछ भी नजर न आया जिससे मै गुरुवर को अपनी तरफ आने को विवश कर सकता.
एक दिन बिठूर में मुझे एक सिद्ध संत मिले. मुझसे पूछा कोई गहरा दुख लेकर घूम रहे हो. मै कोई मदद करूं! मैने स्वीकार किया कि गहरे दुख में हूं. और उन्हें पूरी बात बता दी.
संत ने कहा भगवान को भक्ति और गुरु को विश्वास से जीता जा सकता है. गुरु के प्रति अटल विश्वास ही उन्हें रिझा सकता है. उन्हें कभी भी अपने टाइम टेबुल में उलझाने की कोशिश मत करो. जब तक पात्रता सुनिश्चित नही होगी तब तक कोई भी सक्षम गुरु साधना की अनुमति न देगा. अध्यात्म की दुनिया में जिससे मांगने गये हो उसे कुछ दे सकते हो एेसा गरूर मत पालो. गुरु के हृदय में स्थान पा लोगे. जब बात उच्च साधनाओं की हो तो इच्छाओं और साधनाओं की एक दूसरे में मिलावट मत करो. ध्यान में रखो जब साधना सिद्ध होगी तो इच्छायें खुद ही पूरी हो जाएंगी.
मैने उनसे एक और सवाल पूछ लिया. गुरुवर से सम्पर्क कैसे हो. उन्होंने कहा अपने गुरु के गुरु भगवान शिव से प्रार्थना करो.
मैने की.
सफलता मिल गई.
एक दिन गुरुवर का मैसेज आया. लिखा था मेरी फ्लाइट रात 10 बजे अमौसी एयर पोर्ट पर लैंड करेगी. आकर मिलो.