हिमालयन रहस्यः टाइम ट्रेवलिंग साधना-3

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अदृश्य वार्म होल में घुसकर साधक पहुंच जाते हैं एक से दूसरे ब्रह्मांड में

पिछले अंकों में हमने जाना युगों से समय यात्रा होती आ रही है। अलग अलग ग्रहों, ब्रह्मांडों में समय की गति अलग होती है। इसी तरह अलग अलग आयाम में समय की गति अलग होती है। आधुनिक वैज्ञानिक ब्लैक होल के द्वारा टाइम ट्रेवलिंग की सम्भावना तलाश रहे हैं। अध्यात्म विज्ञान में समय यात्रा के लिये ब्लैक होल का उपयोग युगों से होता आ रहा है। उदाहरण के लिये हमने कुम्भ स्नान का विज्ञान जाना। जहां कुम्भ कुंड में डुबकी लगाते ही हजारों सक्षम साधक विलुप्त होकर समय यात्रा जर निकल जाते हैं। इस कारण बाद में न वे मिलते हैं न उनकी लाशें।
अब आगे….

आज हम वार्म होल के द्वारा समय यात्रा करने का विज्ञान जानेंगे। इसके लिये पहले आधुनिक वैज्ञानिकों की खोज जान लेते हैं। सन् 1935 में अल्बर्ट आइंस्टीन तथा नाथन रोजन ने मिलकर एक खोज की। उन्होंने सापेक्षता के सिद्धांत के आधार पर गणितीय रूप में ये सिद्ध किया कि इस ब्रह्माण्ड में उपस्थित किन्ही दो बिंदुओं के बीच शार्ट कट रास्ता होता है। जो स्पेस और टाइम दोनों को कम कर देता है। इस शॉर्ट कट रास्ते को ही वार्म होल कहते हैं।
अंतरीक्ष तीन आयामों से मिलकर बना होता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक इसके अलावा एक और आयाम होता है। वह चौथा आयाम है समय यानि टाइम। स्पेस के तीनों आयामों में आंखों से न दिखने वाले छोटे-छोटे सूक्ष्म छेद होते हैं। इन्ही तीनों आयामों की तरह चौथे आयाम समय में भी छेद होते हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि इन छेदों के रास्ते वार्म होल में प्रवेश करके टाइम ट्रेवलिंग की जा सकती है। विज्ञान के सामने बड़ी समस्या है कि वार्म होल में प्रवेश के लिये जिन छेदों का उपयोग किया जाना है वे इतने छोटे हैं कि बिना यंत्र आंखों से दिखते ही नहीं। तो इनमें कोई व्यक्ति घुसे कैसे।
किंतु अध्यात्म विज्ञान के विद्वान युगों से इन सूक्ष्म छेदों के रास्ते वार्म होल में जाकर समय यात्रा करते आये हैं। हम भी इनका ही उपयोग करने जा रहे हैं।
अब सवाल है कि जिस काम को आधुनिकतम मशीनों-यंत्रों से परिपूर्ण विज्ञान नही कर पा रहा उसे सिर्फ योग साधना के बूते कैसे किया जा सकता है। जवाब है सूक्ष्म शरीर। अध्यात्म विज्ञान को सूक्ष्म शरीर का उपयोग करना आता है। जबकि आधुनिक विज्ञान अभी तक सूक्ष्म शरीर से परिचित ही नही हो पाया है।
वैज्ञानिकों ने वार्म होल में प्रवेश के लिये जिन स्पेस छिद्रों का पता लगाया है वे अत्यंत सूक्ष्म हैं। उसमें स्थुल शरीर प्रवेश नही कर सकता। वैज्ञानिक कोशिश कर रहे हैं कि स्थुल शरीर को शक्तिशाली विद्धुतीय तरंगों के बीच से गुजार कर इतना मैग्नीफाई कर दिया जाये कि वह हवा की तरह स्पेस के सूक्ष्म छिद्रों में घुस सके। वहां से वार्म होल में पहुंचे। एेसे में व्यक्ति का शरीर स्थुल होकर जब दूसरी तरफ निकलेगा तो हो सकता है करोड़ों साल पीछे भूतकाल में या करोड़ों साल आगे भविष्य में पहुंच जाये। अघोषित रूप से इस पर काम चल रहा है।
अब बात करते हैं अध्यात्म विज्ञान की। अध्यात्म में मनुष्य के दो शरीरों का व्यापक उपयोग किया जाता है। एक है स्थुल शरीर, दूसरा है सूक्ष्म शरीर। सूक्ष्म शरीर स्पेस के सूक्ष्म छिद्रों में आसानी से प्रवेश करने लायक होता है। अनकों सक्षम साधक, ऋषि मुनि अपने सूक्ष्म शरीर का संचालन जानते हैं। जिस तरह सामान्य व्यक्ति अपने हाथ पैर का उपयोग करते हैं उतनी ही आसानी से वे अपने सूक्ष्म शरीर का उपयोग करते हैं। वे अपने सूक्ष्म शरीर से स्पेस के सूक्ष्म छेदों में प्रवेश कर जाते हैं। वहां से वार्म होल के रास्ते एक आयाम से दूसरे आयाम में पहुंच जाते हैं। वह आयाम कुछ सौ, कुछ हजार, कुछ लाख या कुछ करोड़ साल भूत या भविष्य का हो सकता है। या फिर वह आयाम देवलोक, ऋषिलोक, गंधर्वलोक, भैरवीलोक, योगिनी लोक, यक्षिणी लोक, पाताललोक या कोई दूसरा ग्रह या कोई दूसरा ब्रह्मांड हो सकता है। यह साधक की क्षमता और इच्छा पर निर्भर करता है।
अब सवाल है यह कि स्थुल शरीर के बिना की गई सूक्ष्म शरीर की समय यात्रा में क्या काम पूरे किये जा सकते हैं। उसमें क्या मजबूरियां हो सकती हैं।
इससे पहले हम मोबाइल पर वीडियो कालिंग का उदाहरण समझते हैं। हजारों किलोमीटर दूर बैठा व्यक्ति वीडियो कालिंग के द्वारा दूसरे व्यक्ति से बात कर सकता है। उसे देख सकता है। उसके द्वारा दिखाई जाने वाली सभी चीजों को देख सकता है। उसके आसपास के दृश्य देख सकता है। उन्हें समझ सकता है। उनसे ज्ञान, जानकारी प्राप्त कर सकता है। अपनी बात कह सकता है। अपनी बात समझा सकता है। किसी समस्या का समाधान ले दे सकता है। डाटा ट्रांसफर कर सकता है। धन ट्रांसफर कर सकता है। दोस्ती कर सकता है। लड़ाई कर सकता है। कहां जाये तो वे सभी कार्य कर सकता है जो बिना छुवे हुए किये जा सकते हैं।
सूक्ष्म शरीर मोबाइल से लाखों गुना अधिक संवेदनशील और क्षमतावान है। उसी ने पंचतत्वों का उपयोग करके स्थुल शरीर का निर्माण किया है। इसलिये वह स्थुल शरीर के कार्यों का सम्पादन भी कर सकता है। समय यात्रा के दौरान सूक्ष्म शरीर कुछ बंदिशों को छोड़कर स्थुल शरीर से किये जाने वाले लगभग सभी कार्य कर सकता है।
अब वे बंदिशें जान लेते हैं। सूक्ष्म शरीर से खाना नही खाया जा सकता। पानी नही पिया जा सकता। इसीलिये जब कोई साधक उच्च आयाम में जाता है तो उसे खाने पीने की जरूरत नही पड़ती। वहां दवाओं की भी जरूरत नही होती। क्योंकि सूक्ष्म शरीर का उपचार उर्जाओं से होता है। सूक्ष्म शरीर से सेक्स नही किया जा सकता। इसलिये कुछ उच्च आयामों में उद्देश्य पूर्ति के लिये धरती के लोगों को चुनकर ले जाया जाता है। वहां बच्चे पैदा नही होते।
वार्म होल से समय यात्रा करने के लिये सूक्ष्म शरीर का उपयोग आना चाहिये। उसे इच्छानुसार एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की तकनीक मालुम होनी चाहिये। उसका अच्छा अभ्यास जरूरी है। सूक्ष्म हिमालय साधना में साधक अपने घरों में रहकर सूक्ष्म शरीर के उपयोग के विधान को अपनाएंगे। सूक्ष्म शरीर से हिमालय के सिद्ध क्षेत्रों में पहुंचेंगे। सूक्ष्म शरीर से ही वहां मंत्र जप करेंगे। सूक्ष्म शरीर से ही वहां के दृश्य देखेंगेै, वहां की सिद्धिदायी उर्जाओं को ग्रहण करेंगे।
इनमें से जो साधक अपने सूक्ष्म शरीर को अच्छी तरह उपयोग कर लेंगे उन्हें टाइम ट्रेवलिंग साधना का अवसर दिया जाएगा।
आगे हम समय यात्रा के उस सिद्धांत को जानेंगे जिसमें सूर्य की किरणों पर सवार होकर एक से दूसरे आयाम में जाया जाता है।
क्रमशः
शिव शरणं।।

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