Life with Corona-3: क्वारंटीन का विकल्प ढूंढा जाए

Life with Corona: सेहत भी समृद्धि भी
इलाज के विकल्प की तरफ बढ़ने की जरूरत
क्वारंटीन का विकल्प ढूंढा जाए

चौथा विश्व युद्ध कोरोना नाम के घुसपैठिये से है। सारी दुनिया एक तरफ, कोरोना दूसरी तरफ। भविष्य में हम देखेंगे दुनिया का नेता वही देश बनेगा जो सबसे पहले अपने देश में पारम्परिक और वैकल्पिक चिकित्सा को कोरोना इलाज की छूट देगा। कुछ देशों की बदकिस्मती है कि वहां जड़ी बूटियां नही होतीं। वहां हल्दी नही खाई जाती, वहां लोग तुलसी, नीम, अश्वगंधा का प्रयोग नही जानते। वहां के लोग योग से इम्युनिटी बढ़ाना नही जानते। वहां लोगों को आध्यात्मिक ऊर्जाओं का उपयोग नही आता। वहां पारम्परिक और वैकल्पिक चिकित्सा के साधन नही हैं

सभी अपनों को राम राम।
कोरोना के डर से मै जिंदा लाश हो गयी। यह बात हमें महाराष्ट्र की साधिका रमा राठी ने पिछले अंक में लिखी। अब दिल्ली की शशी शर्मा की पीड़ा देखें। Pranaam guruji, rama rathi hi jaise same istiti humari hai, raat m nind nahi aarahi hr waqt dimag m yahi chalta rahta hai, aapki post-life with corona perne ke baad thori himmat milihai, aaj ki post se aache filling k sath aatm bal bara hai.
 
यह सिर्फ दो लोगों की दशा नही बल्कि दुनिया के करोड़ों लोगों की बानगी है। दुनिया में जितने लोग कोरोना के बीमार हैं, उससे कई गुना ज्यादा कोरोना फोबिया के शिकार हैं। जिनते लोग कोरोना से मर रहे हैं उससे कई गुना अधिक लोग कोरोना के डर से जिंदा लाश बने जा रहे हैं। यह मानसिक मौत है, जो भौतिक मौत से अनेकों गुना ज्यादा पीड़ा देती है। इसमें व्यक्ति हर दिन हर क्षण छटपटाता है, तड़पता है। यह सिलसिला अंतहीन होता है।
बताते चलें कि रमा राठी और शशी शर्मा दोनो ही पढ़ी लिखी और जिम्मेदार महिलायें हैं। सालों से दोनो अपने परिवारों की जिम्मेदारी बेहतर तरीके से निभाती आ रही हैं। समय समय पर अनेकों विपरीत स्थितियाँ फेस करने के बावजूद हमें वे कभी न डरी दिखीं न असहाय। शशी शर्मा खुद ज्योतिष और डिवाइन हीलिंग की प्रेक्टिशनर हैं। लोगों को समस्याओं से मुक्त होने की सलाह देती हैं। लोग उनका लाभ भी उठाते हैं। बड़ी चिंता की बात है, जब शशी जैसे लोगों की हिम्मत टूट रही है तो दूसरों की हालत क्या होगी?
देखने में आया है कि कोरोना से ज्यादा डर कोरोना सावधानी के तहत क्वारंटीन बाध्यता का है। कोरोना छुआछूत की बीमारी है। इसलिये रोगियों को क्वारंटीन करने की विवशता आ रही है। किंतु यह रोगी, रोग संदिग्धों और उनके परिवारजनों के लिये अत्यधिक विचलनकारी और सरकारों के लिये बड़ी सरदर्दी व संसाधनों की भारी खपत करने वाली व्यवस्था है।
इसका विकल्प तुरन्त लाया जाना चाहिये।
हमारे पूर्वज सेल्फ क्वारंटीन लागू करने के ऐक्सपर्ट रहे हैं। गांवों में रहने वाली देश की अधिसंख्य आबादी अभी भी इसे सफलता पूर्वक अपनाती है। परिवार में जब किसी को चेचक निकल आती है तो तत्काल प्रभाव से उसे अन्य सदस्यों के संपर्क से अलग कर दिया जाता है। उसके उपयोग की चीजें औरों की पहुंच से दूर कर दी जाती हैं। उसकी देखभाल के लिये कोई एक सदस्य नियुतक होता है। वह भी छुआछूत न फैले इसकी सावधानियों का पालन करता है। उस घर में पड़ोसियों और रिश्तेदारों का आना जाना रुक जाता है। घर की रसोई में कढ़ाई चढ़नी रोक दी जाती है। अर्थात उस घर में कोई भी तला भुना भोजन नही बनता। जब बनेगा नही तो गरिष्ठ भोजन न रोगी खायेगा न घर के दूसरे लोग। इससे इम्युनिटी बिगड़ने का खतरा जीरो हो जाता है। पुराने नीम के पेड़ के नीचे स्थित शीतला माता की निर्धारित पारम्परिक प्रक्रिया पूरी करके रोगी की नकारात्मकता खत्म की जाती है।
नीम की ऊर्जा में एलर्जी, इंफेक्शन खत्म करने की विलक्षण क्षमता होती है। साथ ही इसमें अश्वगंधा की तरह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की विशेषता होती है। लगभग हर गांव में किसी न किसी रूप में नीम वृक्ष में शीतला माता स्थापित हैं।
लोग रोग निवारण के लिये पूजा करने के बहाने नीम पेड़ के नीचे इकट्ठे होते हैं। उन्हें रोग नाशक ऊर्जाएं मिल जाती हैं। यदि कोई व्यक्ति हर दिन 30 मिनट नीम पेड़ के नीचे बैठे तो उसे डॉक्टरों के पास कभी नही जाना पड़ेगा। साथ ही उसे बुढापा नही व्याप्त होगा। कुछ सालों तक लगातार नीम के नीचे समय बिताने वालों की ऊर्जाएं दूसरों को भी रोग मुक्त करने में सक्षम हो जाती हैं।
क्वारंटीन के विकल्प के रूप में हम पूर्वजों द्वारा घरों में अपनाई गई विधियों पर भी विचार कर लेना चाहिये। जिनके सहारे हजारों पीढ़ियों ने सैकड़ों बार महामारियों का सामना किया है।
अब जब दुनिया कोरोना के साथ जीने की दिशा में बढ़ रही है तब सबसे पहले कोरोना फोबिया को खत्म करना होगा। इसके लिये दुनिया की सभी सरकारों और सभी स्वास्थ संगठनों को पहल करनी चाहिये। पहले तो कोरोना के बीमारों और उनकी मौतों के आंकडों का प्रसारण रुके। यह लोगों को डरा रहा है। निराश कर रहा है। आत्मबल खत्म कर रहा है।
ठीक हो रहे कोरोना बीमारों को हाइलाइट किया जाए। इससे कोरोना भय घटेगा।
जब आधुनिक मेडिकल के पास कोरोना का कोई घोषित इलाज नही है तो पारम्परिक और वैकल्पिक चिकित्सा पद्धितियों को भी इसके मरीजों के उपचार की छूट दी जाए। हो सकता है वहां से कोई उत्साहजनक नतीजा मिल जाये। बताते चलें कि हमारे देश में बीमार पड़ने वाले लोगों में 80 प्रतिशत से अधिक लोग अपने इलाज की शुरुआत पारम्परिक चिकित्सा से ही करते हैं। ज्यादातर दादी नानी के नुस्खों से घर में रहकर ही खुद को ठीक कर लेते हैं। ये नुस्खे आयुर्वेद विज्ञान के वे प्रामाण हैं जिन्होंने सदियों से करोड़ों की बीमारियां खत्म की हैं। बचे हुए दूसरे बीमार स्थानीय डॉक्टरों के पास जाते हैं। उनमें अधिकांश ठीक हो जाते हैं। बीमारी बढ़ने पर उनमें से कुछ प्रतिशत को ही हॉस्पिटलों तक जाना पड़ता है।
हॉस्पिटल पहुंचने के बाद भी उनमें से कुछ की मौत होती ही है। डॉक्टरों की तरफ से एक तर्क आता है घरेलू इलाज में समय बर्बाद किया गया, इसलिये रोग बढ़ा और मौत हुई। यदि ऐसा है तो उनकी मौत नही होनी चाहिये जो नियमित मेडिकल चेकअप कराते हैं। मगर मरते वे भी हैं। देखने में आया है कि नियमित मेडिकल चेकअप कराने वाले या मेडिकल बीमा कराने वालों को सामान्य लोगों की अपेक्षा अस्पतालों के चक्कर अधिक लगाने पड़ते हैं। क्योंकि आधुनिक चिकित्सा चेतावनियों के कारण वे वैकल्पिक चिकित्सा कम अपनाते हैं।
सिर्फ हॉस्पिटल में भर्ती होना ही जिंदगी बचने की गारंटी नही होती।
जरूरत के मुताबिक पारम्परिक और आधुनिक दोनो चिकित्सा को अपनाना ही उपयोगी है।
आज जब दुनिया भर में आधुनिक चिकित्सा कोरोना के सामने असहाय है तब अन्य चिकित्सा पद्धतियों को भी उपचार की इजाजत मिल जानी चाहिये। डर वैकल्पिक चिकित्सा से नही है बल्कि उसमें बरती गई बेपरवाही से कोरोना का छुआछूत बढ़ने का है। संक्रमण का फैलाव न हो इसके लिये वैकल्पिक चिकित्सकों से जरूरी गाइडलाइन का पालन कराया जाए।
चौथा विश्व युद्ध कोरोना नाम के घेसपैठिये से है। भविष्य में हम देखेंगे दुनिया का नेता वही देश बनेगा जो सबसे पहले अपने देश में पारम्परिक और वैकल्पिक चिकित्सा को कोरोना इलाज की छूट देगा। कुछ देशों की बदकिस्मती है कि वहां जड़ी बूटियां नही होतीं। वहां हल्दी नही खाई जाती, वहां लोग तुलसी, नीम का प्रयोग नही जानते। वहां पारम्परिक चिकित्सा के साधन नही। वहां के लोग योग से इम्युनिटी बढ़ाना नही जानते।
अफसोस की बात है जिन देशों में चिकित्सा की उपरोक्त संपत्ति, साधन उपलब्ध है। वहां के हुक्मरान उन्हें लागू करने की हिम्मत नही कर पा रहे। कहीं विपक्ष की हायतौबा तो कहीं जगहँसाई की झिझक। ऐसे में जनहित को ध्यान रखते हुए जो देश आधुनिक चिकित्सा के साथ पारम्परिक चिकित्सा विज्ञान का उपयोग करने की हिम्मत दिखायेगा। निश्चित ही उसके समक्ष दुनिया का नेता बनने का अवसर होगा।
कोरोना के साथ जीते हुए सेहत और समृद्धि दोनो को बरकरार रखा जाए इसके लिये सक्षम उर्जा विज्ञान की बारीकियों पर हम आगे चर्चा करेंगे।
इस बीच IIT दिल्ली के वैज्ञानिकों और जापान की एक संस्था के वैज्ञानिकों ने संयुक्त शोध में अश्वगंधा से कोरोना की दवा बनाने की संभावना ढूंढी है.
हमारी ऊर्जा विद्वान एनर्जी थैरेपिस्ट शिवप्रिया दीदी ने देश में कोरोना की शुरुआत के समय ही अश्वगंधा, नीम, सफेद सेज (एक तरह की तुलसी) और कपूर के तेल की ऊर्जाओं से कोरोना बचाव के लिए प्रभावशाली दवा बन सकने की बात कही थी. साथ ही उन्होंने 17 मार्च 2020 को इन चीजों की ऊर्जाओं से कोरोना बचाव का सुरक्षा कवच बनाना सिखाया था जिसका लाभ मृत्युंजय योग के साधक लगातार उठा रहे हैं उसका लिंक हम यहां दे रहे हैं । लिंक क्लिक करके आप भी इस विधि को जानकर अपना और दूसरों का कोरोना सुरक्षा कवच बना सकते हैं।

कोरोना सुरक्षा कवच यूट्यूब लिंक (क्लिक करें….)

IIT दिल्ली की शोध संबंधित लिंक(क्लिक करें…)

!! शिव शरणं !!