शिवप्रिया की शिवसिद्ध…20

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शिवप्रिया की शिवसिद्ध…20
ब्रह्मांड को मजबूर कर देने वाली साधना

इसमें लिखी साधना तकनीक का उपयोग करके साधक हजारों वर्षों से ब्रह्मांड को अपनी कामनाएं पूरी करने के लिये मजबूर करते आये हैं। देवों और ऋषियों का मानना है कि जिस राज्य में इसके ज्ञाता होते हैं, उस राज्य में संकट व्याप्त नही होते। वे राज्य पराजित नही होते। वहां के लोगों को दुर्दिन व्याप्त नही होते। ऋषि अथर्वा द्वारा शिवप्रिया के ज्ञान में इसी वेद का ज्ञान स्थापित किया गया। अब हिमालय की कंदराओं में उन्हें उसका उपयोग सिखाया जा रहा है।
सभी अपनों को राम राम
उच्च साधक आज का वृतांत ध्यान पूर्वक पढ़ें और साधना रहस्य को समझें। आज मै एक रहस्य साझा करते हुए आगे बढूंगा।
शिवप्रिया की गहन साधना का यक्ष लोक और अथर्व वेद से गहरा संबंध है। किंतु संस्मरण में न होने के कारण अब तक उन्हें इसकी जानकारी नही है। पहली बार हम इस रहस्य पर चर्चा कर रहे हैं। इस लेख के माध्यम से वे इस पक्ष के कुछ बिंदुओं से अवगत हो सकेंगी। तब जन्मों से जारी अपनी सूक्ष्म यात्रा की तमाम बिखरी कड़ियों को जोड़ सकेंगी।
बताता चलूं कि अधिकांश साधक साधना के दौरान होने वाली अनुभूतियों को डिकोड नही कर पाते। वे उन्हें स्वप्न की तरह भूलते जाते हैं। इस कारण सूक्ष्म यात्राओं के दौरान घटी घटनाओं को महत्व नही देते। उनमें छिपी उपलब्धियों को जान नही पाते। फलतः साधनाएं सफल होकर भी विफलता के आवरण में अटकी रहती हैं।
सूक्ष्म यात्राओं की घटनाओं को वही डिकोड कर सकता है जो उन राहों से गुजरा हो। इसी कारण बड़ी साधनाओं की उपलब्धियां पाने के लिये सक्षम गुरु की अनिवार्यता होती है। इसी वजह से मै साधकों से अपने साधना संस्मरण नियमित रूप से लिखते रहने के लिये कहता हूं।
ब्रह्मा पुत्र ऋषि अथर्वा ने अथर्व वेद की रचना की। संसार में सबसे पहले यक्षों की प्रथा चलाने-वाले ऋषि अथर्वा ही थे।
ऋषि अथर्वा पूर्व जन्म में असुर हरिण्य थे। प्रलय काल में ब्रह्माजी निंद्रा में थे। तब उनके मुख से वेद निकल रहे थे। असुर हरिण्य ने ब्रह्मलोक जाकर वेदपान कर लिया। इसकी जानकारी होने पर देवताओं ने हरिण्य की हत्या करने की तैयारी कर की। हरिण्य जान बचाने के लिये भगवान शिव की शरण में गया। महादेव ने उसे अगले जन्म में वेद रचना का वरदान दिया।
अगले जन्म में वे अथर्वा ऋषि हुए। अथर्व वेद की रचना की। यह सनातन का अंतिम और चौथा वेद है। कुछ विद्वानों का मत है इस वेद की रचना ऋषि अंगिरा ने की। वहीं कुछ विद्वान मानते हैं ऋषि अंगिरा ने अथर्व वेद में शोध शामिल किए। इसीलिये गोपथ ब्राह्मण में इसे ‘अथर्वांगिरस’ वेद कहा गया है।
अथर्व वेद में ब्रह्मज्ञान के अलावा चिकित्सा विज्ञान का व्यापक उल्लेख है। यहां तक कि इसमें सर्जरी तक का विज्ञान उपलब्ध है। इसे मेडिकल का पहला ग्रंथ कहा जा सकता है। आयुर्वेद इसी का उपग्रन्थ है। अथर्व वेद संहिता में ऋषिकालीन उच्च विज्ञान और उसके सूत्रों की व्यापक जानकारी है। सांसारिक जीवन के सुखों के लिये इसमें तंत्र विज्ञान, टोटका विज्ञान की सटीक तकनीक है। इसकी साधना तकनीक का उपयोग करके हजारों वर्षों से साधक ब्रह्मांड को अपनी कामनाएं पूरी करने के लिये मजबूर करते आये हैं।
देवों और ऋषियों का मानना है कि जिस राज्य में अथर्व वेद के ज्ञाता होते हैं उस राज्य में संकट व्याप्त नही होता। उस राज्य को पराजित नही किया जा सकता। उस राज्य के लोगों में दुर्दिन व्याप्त नही होते।
ऐसा इसलिये कहा जाता है क्योंकि अथर्व वेद में तन, मन, धन की समस्याओं को समाप्त करने के अचूक साधन लिखे हैं। इसमें देवी देवताओं को वरदान देने के लिये मजबूर करने वाला ब्रह्मज्ञान है। हर रोग को ठीक करने की चिकित्सा पद्धति है। औषधि, जड़ी बूटी, वनस्पति विज्ञान है। रत्न, मणि माणिक्य विज्ञान है। भविष्य विज्ञान है। अचूक वैदिक उपचार है। अथर्व वेद में वर्णित पृथ्वीसूक्त वास्तुदोष निवारण के लिये ऋषिकाल से अब तक अचूक सिद्ध होता आया है। इसके प्रयोग से पृथ्वी तत्व का जागरण हो जाता है। अथर्व वेद में पति पत्नी के संबंधों की प्रगाढ़ता, शांति सुख के अकाट्य सूत्र हैं। देव समान शत्रुओं का भी नाश कर देने की समर्थ वाले उपाय इसमें मौजूद हैं।
इस वेद का मूल आधार विज्ञान है। इस कारण इसके सूत्र हमेशा ही फलदायी सिध्द हुए हैं।
बताते चलें कि माता पार्वती की शिव सिद्धि में अथर्वा ऋषि के पुत्र महर्षि दधीचि की महत्वपूर्ण भूमिका थी। गहन साधना के 23 वें दिन अदृश्य दुनिया के मार्गदर्शक शिवप्रिया की चेतना को महर्षि दधीचि के पास ले गए। महर्षि ने उनकी ऊर्जाओं को उपचारित किया। 26 वें दिन की साधना में उन्हें दोबारा महर्षि दधीचि के पास ले जाया गया। महर्षि उन्हें अपने पिता अथर्वा ऋषि के पास ले गए। अथर्वा ऋषि ने शिवप्रिया के ज्ञान में अथर्व वेद संहिता का ज्ञान स्थापित किया। महर्षि दधीचि ने उस दिन शिवप्रिया को पुनः मिलने की बात कहकर विदा किया था।
अथर्वा पुत्र दधीचि ने अथर्व वेद का विज्ञान भलीभांति अपनाया। जिससे वे महा तपस्वी के साथ महा पराक्रमी भी बने। क्षेष्ठता के मुद्दे पर क्षत्रिय और ब्राह्मणों के मध्य हुए युद्ध में उन्होंने राजा क्षुव को पराजित किया। उस युद्ध में ऋषि दधीचि का शरीर बुरी तरह क्षिन्न भिन्न हो गया। तब असुर गुरु शुक्राचार्य ने भगवान शिव से प्राप्त मृत संजीवनी का उपयोग करके उन्हें पुनर्जीवित किया। इस कारण उन्हें शुक्राचार्य का धर्म पुत्र भी कहा गया। शुक्राचार्य ने ऋषि दधीचि को महा मृत्युंजय मन्त्र सिद्ध कराया। साथ ही विष्णु आराधना कराकर उन्हें नारायण कवच और ब्रह्म कवच धारण कराया।
ऋषि दधीचि को अणु अस्त्र बनाने का विज्ञान पता था। वे अणु शक्ति के पहले आविष्कारक थे। वे देवताओं के शस्त्रागार के प्रभारी बने। अथर्व वेद के ज्ञान से चिकित्सा के महा ज्ञाता बने। उन्होंने देवताओं के चिकित्सक अश्वनीकुमारों को चिकित्सा का ब्रह्मज्ञान देने सिखाया।
जिससे नाराज होकर देवराज इंद्र ने ऋषि दधीचि का सिर काट दिया। उन्होंने खुद के चिकित्सा विज्ञान का उपयोग करके अपनी सर्जरी सम्पन्न की। घोड़े का सिर लगाकर अपने जीवन को आगे बढ़ाया।
महर्षि दधीचि के सर्जरी चिकित्सा विज्ञान का बड़ा उपयोग उनकी पत्नी वेदमती द्वारा भी किया गया। एक बार वृत्तासुर नाम के असुर ने देवलोक को जीत लिया। इंद्र का सिंहासन छिन गया। वृत्तासुर को ऋषि दधीचि की हड्डियों से बने अस्त्र से ही मारा जा सकता था। भगवान शिव और विष्णु के कहने पर इंद्र ने महर्षि के पास जाकर अपने पूर्व कृत्य की मांफी मांगी। और अस्त्र बनाने के लिये उनसे हड्डियों की मांग की। महर्षि दधीचि बहुत ही उदार और क्षमावान थे। साथ ही लोक कल्याण के लिये सदैव तत्पर। उन्होंने अपने प्राणों का त्याग करके हड्डियां का दान कर दीं। जिससे बने अस्त्र से वृत्तासुर मारा गया।
महर्षि दधीचि के अंतिम संस्कार के समय उनकी पत्नी वेदमती ने सती होने का प्रण किया। उस समय वे गर्भवती थीं। इसलिये विद्वानों द्वारा उन्हें रोक दिया गया। देवी वेदमती ने अपने पति से चिकित्सा का उच्च विज्ञान सीखा था। उन्होंने एक नुकीले पत्थर से अपने गर्भ की सर्जरी की। आज की भाषा बोलें तो ऑपरेशन करके पुत्र को जन्म दिया। नवजात शिशु को पीपल के एक पेड़ पर स्थापित अपनी कुल देवी दधिमती को सौंपकर उसके पालन पोषण का वचन लिया। फिर पति के अवशेषों के साथ सती हो गईं।
पीपल के वृक्ष के सानिध्य में पलने बढ़ने के कारण उनके पुत्र को पीप्लाद के नाम से पुकारा गया। पीप्लाद बड़े तपोनिष्ठ थे। विद्वानों ने उन्हें शिव का अंश माना। उन्होंने भी अथर्व वेद के सूत्रों को अपनाया। बड़े हुए तो मन में भाव आया कि देवताओं और दानवों की लड़ाई के कारण उनके माता पिता की मृत्यु हुई। उन्हें माता पिता के सानिध्य से वंचित होना पड़ा। उन्होंने इसके लिये जिम्मेदार शक्तियों को दंडित करने का निर्णय लिया। कठिन तपस्या करके महादानव उत्पन्न किये। उन्हें दुनिया खत्म कर देने का आदेश दिया। इससे संसार में हाहाकार मच गया। सब भगवान शिव के पास भागे। भगवान शिव
पीप्लाद के पास गए। उन्हें समझाया कि इससे उनके पिता द्वारा किया गया त्याग और दान कलंकित हो जाएगा।
पीप्लाद ने भगवान शिव की बात मानकर महादनवों को रोक दिया। किंतु शनि पर आक्रमण कर दिया। उनका मानना था कि शनि की साढ़े साती के कारण सत्कर्मो के बावजूद उनके माता पिता की कष्टप्रद मृत्यु हुई। वे शनि को दंड देने चाहते थे। इसलिये शनि को पराजित किया।
ऐसे ही अथर्व वेद का ज्ञान अपनाने वाले असंख्य साधकों ने समय समय पर ब्रह्मांड को अपनी बात मानने के लिये मजबूर किया है। संदर्भ वश हम उनकी चर्चा आगे भी करते रहेंगे।
गहन साधना के दौरान शिवप्रिया की चेतना कुछ दिनों से हिमालय की एक गहरी गुफा की यात्रा कर रही है। वहां तपस्यारत एक ऋषि उन्हें अथर्व वेद संहिता के ज्ञान का उपयोग सिखा रहे हैं।
शिव शरणं!

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