शिवप्रिया की शिवसिद्धि…15

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शिवप्रिया की शिवसिद्धि…15
महर्षि दधीचि से भेंट: शक्ति स्थापना

गहन साधना के 23 वें दिन शिवप्रिया की चेतना महर्षि दधीचि के समक्ष पहुंची। शिवप्रिया उनसे परिचित नही थीं। किंतु महर्षि उन्हें जानते थे। उन्होंने शिवप्रिया की ऊर्जा में दैवीय शक्ति की स्थापना करके आगे की साधना के लिये तैयार किया।
सभी अपनों को राम राम
शिवप्रिया के गहन साधना वृतांत से उच्च साधक सूक्ष्म जगत से परिचित हो रहे हैं। कई साधकों ने वृतांत को अधिक विस्तार से दिए जाने का आग्रह किया है। हम कोशिश करेंगे।
इस बीच मार्गदर्शन कर रही सूक्ष्म जगत की शक्तियों ने शिवप्रिया को अपने सहस्रार चक्र पर स्थापित होकर साधना करना सिखाया। जिससे उनकी चेतना का उच्च आयामों में प्रवेश अधिक आसान और तीब्र हो गया।
10 वें दिन की साधना में उनके मार्गदर्शक बदले जाने का संकेत दिया गया था। उसी दिन उन्हें ऋषियों के एक विशाल साधना क्षेत्र में ले जाया गया। यह साधना क्षेत्र एक अलौकिक उर्जा शिवलिंग के पास स्थित था। मार्गदर्शक द्वारा उन्हें उस शिवलिंग के भीतर डाल दिया गया। उसके भीतर ऊर्जाओं का प्रवाह अत्यधिक था। जिसके बीच शिवप्रिया ने खुद को घण्टों पैरालाइज सा पाया। उस दिन की साधना समाप्त होने के बाद काफी देर तक उनका भौतिक शरीर भारी जकड़न और पीड़ा में रहा।
उस उर्जा शिवलिंग को पार करने के बाद शिवप्रिया विभिन्न ऋषियों के साधना कक्षों के बीच से गुजरीं। वहां ऋषिगण तपस्यारत थे। शिवप्रिया को उनके साधनकक्षों में जाने की अनुमति थी। लेकिन एक कक्ष में जाने से यह कहकर रोक दिया गया कि उसमें प्रवेश का अभी समय नही आया। शिवप्रिया ने उस दिन की शेष साधना अन्य ऋषियों के साथ बैठकर पूरी की।
23 वें दिन की साधना आरम्भ होते ही शिवप्रिया की चेतना उनके सहस्रार चक्र पर पहुंच गई। वहीं बैठकर मन्त्र आरम्भ किया। कुछ देर बाद मार्गदर्शक आ गए। आज उनके साथ साधुवेश में एक अन्य व्यक्ति भी थे।
ये वही थे जो दसवें दिन की साधना के समय आये थे।  पुराने मार्गदर्शक ने शिवप्रिया को उनसे परिचित कराया। बताया कि तुम्हारी आगे की साधना यही कराएंगे। नए मार्गदर्शक ने शिवप्रिया का हाथ थामा और उनकी सहमति का इंतजार किये बिना सहस्रार चक्र से निकलकर एक तरफ चल दिये।
शिवप्रिया को पहले वाले मार्गदर्शक से बहुत लगाव हो गया था। उनसे अलग होकर दुखी हो रही थी। जिसे देखकर नए मार्गदर्शक ने समझया साधना सफलता के लिये मोह त्याग अनिवार्य है।
वे उन्हें लेकर उसी उर्जा शिवलिंग के समक्ष गए जिसमें शिवप्रिया ने खुद को पैरालाइज पाया था। शिवलिंग को प्रणाम करके आगे बढ़े। वे उस कक्ष में गए, जिसमें जाने से पिछली बार रोक दिया गया था।
वह साधना कक्ष औरों से अलग था।
उसमें एक ऋषि साधनारत थे। मार्गदर्शक ने बताया कि वे महर्षि दधीचि हैं। शिवप्रिया महर्षि दधीचि के बारे में कुछ नही जानती थीं। मार्गदर्शक ने महर्षि को प्रणाम किया। शिवप्रिया ने भी।
महर्षि ने आंखे खोलीं। शिवप्रिया को देखा। बोले तुम आ गयी। विस्मित शिवप्रिया उनकी तरफ देखती रहीं। महर्षि ने कहा तुम मुझे पहचान नही पा रही हो, कोई बात नही मेरे पास आओ। वे उनके पास गईं। महर्षि ने पीछे घूमने का इशारा किया। वे घूम गईं। महर्षि ने उनकी स्पाइनल कॉड को ऊपर से नीचे तक चेक किया। मार्गदर्शक से कहा सब ठीक है, आप इन्हें साधना में आगे ले जा सकते हैं। मार्गदर्शक ने उन्हें कोई चमकती हुई चीज दी। जिसे महर्षि ने शिवप्रिया की स्पाइनल कॉड के निचले हिस्से में स्थापित कर दिया।
उस वस्तु के अपने भीतर स्थापित होते ही शिवप्रिया को लगा कि वे अनंत उर्जा स्रोत से जुड़ गईं हैं। उस अनुभूति को शब्दों में नही कहा जा सकता।
महर्षि ने शिवप्रिया को साधना की सफलता का आशिर्वाद देकर विदा किया। उनकी साधना का स्तर बढ़ चुका था।
संदर्भवश बताते चलें कि महर्षि दधीचि अध्यात्म की दुनिया का बहुत बड़ा नाम है। वे ब्रह्मांडीय और मानवीय उर्जा के प्रकांड ज्ञाता थे।  जिसके कारण उनका रोम रोम दूसरे ऋषियों से अलग था। एक राक्षस को वरदान था कि उसकी मृत्यु सिर्फ किसी तपस्वी की हड्डियों से बने बज्र से ही हो सकती है। इस वरदान के चलते राक्षस ने देवलोक सहित समस्त संसार पर कब्जा कर लिया। सिर्फ दधीचि ऋषि के तप क्षेत्र में प्रवेश नही कर सका। वह क्षेत्र उत्तर प्रदेश में नैमिशारण्य के नाम से जाना जाता है। राक्षस के भय से संसार के सभी देवी देवता और तीर्थो ने नैमिशारण्य में शरण ली।
राक्षस को मारने के लिये बज्र बन सके इसमें सिर्फ ऋषि दधीचि की ही हड्डियां सक्षम थीं। देवताओं ने उनसे अपनी हड्डियों का दान करने की प्रार्थना की।
महर्षि ने लोक कल्याण हेतु देवों का आग्रह स्वीकार किया। उनकी प्रिय गाय उन्हें प्रेम से अक्सर चाटती थी। ऋषिवर नंगे बदन उसके सामने समाधि लगाकर बैठ गए। गाय उन्हें चाटने लगी और चाटती रही। उसे पता ही नही था कि अति प्रेम में वह क्या कर रही है। गाय ने चाट चाट कर ऋषि के शरीर से त्वचा और उसके बाद मांस खत्म कर दिया। ऋषिवर की बची हड्डियों से देवताओं ने बज्र बनाया। उससे राक्षस का संहार हुआ।
इस तरह महाऋषि दधीचि अन्य तपस्वियों से अलग थे।
माता पार्वती भगवान शिव को पति रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिये कठिन तप किया।
माता पार्वती सर्वोच्च कोटि की साधिका थीं। वे साधना में सभी नियमों का अच्छरशः पालन करती थीं। उन्हें सभी ऋषियों, मुनियों के मार्गदर्शन और आशीर्वाद प्राप्त थे। विभिन्न देवी देवताओं का सहयोग प्राप्त था। फिर भी कठिन तप के बाद भी उनकी साधना सफल नही हो रही थी।
क्योंकि पूर्व जन्म में यज्ञ की अग्नि में कूदकर आत्मदाह किये जाने के कारण उनकी ऊर्जाओं में विकार था। उलझाव था। जिससे साधना की सफलता रुकी थी।
तब महर्षि दधीचि ने उनकी ऊर्जाओं का निरीक्षण किया। उन्हें उपचारित किया। ऊर्जाओं को साधना सफलता हेतु सक्षम बनाया। उसके बाद ही माता पार्वती की साधना सफल हुई। वे भगवान शिव की अर्धांगिनी बनीं।
शिव शरणं!

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