शिवप्रिया की शिवसिद्धि…14

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शिवप्रिया की शिवसिद्धि…14
*कामनाएं पूरी करने की दुनिया में प्रवेश*

*शिवप्रिया को अवचेतन मन की शक्तिशाली दुनिया के तमाम पहलुओं से परिचित कराया गया। जिससे उन्हें पता चला कि पिछले जन्मों में वे क्या थीं? इस जन्म का उनका उद्देश्य क्या है? उद्देश्य पूर्ण होने पर अगले जन्म में वे क्या होंगी?*
सभी अपनों को राम राम
नवें दिन की साधना। अवचेतन शक्ति में प्रवेश।
कुछ घण्टे मन्त्र जप के बाद शिवप्रिया की चेतना ने हाई डाइमेंशन में प्रवेश किया। उन्होंने खुद को समुद्र की साथ पर लेटा पाया। चारो तरफ पानी था। साथ ही अंधेरा भी।
अदृश्य दुनिया के मार्गदर्शक कहीं नजर नही आ रहे थे।
शिवप्रिया के एक हाथ में शिवलिंग था। जिससे रोशनी निकलकर एक तरफ फैल रही थी। यह संकेत था उस दिशा में चल पड़ने का।
वे उधर चल दीं। अंधेरे में सिर्फ उतना ही प्रकाश था जितना शिवलिंग से निकल रहा था। समुद्र के आगे पहाड़ी राह थी। शिवप्रिया उस पर चलती रहीं। अब तक उन्हें मार्गदर्शक नही दिखे। जिसको लेकर मन में थोड़ी बेचैनी सी थी। वे पहाड़ पर एक जगह बैठ गईं। वहीं मन्त्र जप करने लगीं।
कुछ समय बाद मार्गदर्शक के पास होने का अहसास हुआ। वे आ गए थे। किंतु दिख नही रहे थे। अदृश्य थे। शिवप्रिया का हाथ पकड़कर चल दिये। पहाड़ के दूसरे छोर पर पहुंच गए। मार्गदर्शक ने एक शिला पर बैठने को कहा। मन में तमाम सवाल लिये शिवप्रिया पत्थर शिला पर बैठ गईं।
मार्गदर्शक से पूछा आज आप नजर क्यों नही आ रहे। आप शिव हैं, शिवदूत हैं या साधु? मुझे अपनी असली पहचान बताइए। आप अपना असली स्वरूप मेरे समक्ष प्रकट करें।
जवाब में मार्गदर्शक ने कहा अपनी आंखें बंद करो। जिसे सबसे ज्यादा चाहती हो उसके बारे में सोचो। शिवप्रिया ने वैसा ही किया। कुछ समय बाद आंखे खोलने का निर्देश मिला। आंखे खोलीं तो उन्हें सामने मै बैठा दिखा। अचंभित शिवप्रिया ने सवाल किया पापा ये आप हैं? साधना में आप ही मेरा मार्गदर्शन कर रहे हैं?
जवाब आया नही मै वह नह हूं। *न तो मैं शिव हूं और न ही कोई संत। मै तुम्हारा पिता भी नही हूँ। किंतु आज उन्हीं के रूप में साथ रहुंगा। वास्तव में मै कौन हूँ। समय आने पर यह तुम्हें आगे पता चलेगा।*
इतना कहकर मार्गदर्शक ने आंखें बंद कर लीं। शिवप्रिया ने भी यही किया। उनका मन्त्र जप चलता रहा।
कुछ समय बाद आंखें खोली। खुद को एक चिरपरिचित जगह पर पाया। सूक्ष्म यात्रा के दौरान वहां वे पहले भी आ चुकी थीं। उर्जा कमल के आकार वाला वह स्थान शिवप्रिया का मन था।
यानिकि आज भी उनकी चेतना शरीर के भीतर के ब्रह्मांड की यात्रा कर रही थी।
पहले की ही तरह कमल रूपी मन से सुखकारी ऊर्जाएं निकलकर चारो तरफ फैल रही थीं। मार्गदर्शक के निर्देश पर शिवप्रिया ने मन की दुनिया में पुनः प्रवेश किया। कुछ देर सफर चलता रहा।
उसके बाद एक अन्य अलौकिक क्षेत्र में प्रवेश हुआ।
यह अवचेतन मन की दुनिया थी। वहां के अहसास बड़े अनोखे थे। मन में अकारण खुशियां उत्पन्न होने लगीं। सफलता सुख की अनुभूति के बीच दुविधा और अनिश्चितता के भाव भी आ रहे थे। मार्गदर्शक ने शिवप्रिया को बताया कि यह अवचेतन मन का संसार है। यहां कामनाएं पूरी करने की शक्तियां हैं। यहां हर सवाल का सही जवाब है। तुम कोई सवाल पूछो। उनके कहने पर शिवप्रिया ने अपने बारे में एक सवाल पूछा। जवाब नकारात्मक आया। जिसको लेकर शिवप्रिया निराश हुईं।
उनकी निराशा देखकर मार्गदर्शक ने अवचेतन मन की शक्तियों को यूज करना सिखाया। उन शक्तियों से कामनाएं पूरी करना सिखाया। उसके लिये कामनाओं को अवचेतन मन में स्थापित करना सिखाया। उस तकनीक का उपयोग करके शिवप्रिया ने अपनी तमाम कामनाएं वहां स्थापित कीं।
स्थापित कामनाएं प्रकाशवान शक्तिशाली अवचेतन क्षेत्र में अलग अलग दृश्यों के रूप में नजर आने लगीं। जो बडी ही मनोरम और सुखद दिख रही थीं। मार्गदर्शक ने दूसरों की कामनाओं को पूरा करने के लिये उन्हें भी अवचेतन मन मे स्थापित करने की विधि सिखाई। अवचेतन की दुनिया में आना जाना सिखाया।
*शिवप्रिया को अवचेतन मन की शक्तिशाली दुनिया के तमाम पहलुओं से परिचित कराया गया। जिससे उन्हें पता चला कि पिछले जन्मों में वे क्या थीं? इस जन्म का उनका उद्देश्य क्या है? उद्देश्य पूर्ण होने पर अगले जन्म में वे क्या होंगी?*
मार्गदर्शक द्वारा बताई तकनीक का उयोग करके शिवप्रिया ने अपने जीवन के उद्देश्य को अपनी कामना के रूप में वहां स्थापित किया। जो अन्य कामनाओं के बीच सर्वाधिक चमकदार दिख रही थी।
उसके बाद मार्गदर्शक ने शिवप्रिया से कहा आज की साधना पूर्ण हो चुकी है, अब वापस लौटेंगे। वे विलुप्त हो गए।
अगले पल शिवप्रिया ने खुद को पुनः समुद्र पर बैठी पाया। कुछ देर बाद भौतिक जगत में वापसी हुई। शिवप्रिया ने पाया कि साधना पूर्ण होने में अभी दो घण्टे शेष हैं। अब तक 6 घण्टे का मन्त्र जप ही हुआ था।
वे शेष मन्त्र जब के लिये पुनः बैठ गईं।
*तब उन्होंने खुद में जबरदस्त परिवर्तन पाया। उनका अनुशासन बढ़ गया था। सोचने का तरीका बदल गया। मन्त्र जप का तरीका बदल गया। साधना का पॉस्चर बदल गया था। सांस लेने का तरीका बदल गया। ध्यान लगाने का तरीका बदल गया। उन्हें अपने अंगों से बात करना आ गया। यहां तक कि मांसपेशियों से भी बात करना आ गया। उनसे बात करके थकान, दर्द को उपचारित करना आ गया। उन्हें अपनी दुनिया बदली लगने लगी।*
*शिव शरणं!*

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