शिवप्रिया की शिव सिद्धि…8

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शिवप्रिया की शिव सिद्धि…8
अपने ही शरीर के ब्रह्मांड में प्रवेश

【अपने ही भीतर घूमना, अपने अंगों के भीतर चलना, अपनी रक्त नलिकाओं के भीतर तैरना, उर्जा नाड़ियों के प्रवाह में लोक परलोक को देखना। यह सब अकल्पनीय रोमांच से भरा होता है। शरीर के भीतर का आयाम उच्च आयामों जैसा ही रहस्यों से भरा है। वहां भी करोड़ों करोड़ जीव होते हैं। उनमें लाखों प्रजातियां हैं। आपस में उनके रिश्ते होते हैं। वे अलग अलग कालोनियों में मिलते हैं। उनमें संवाद होता हैं।】

सभी अपनों को राम राम
गहन साधना में शिवप्रिया की सूक्ष्म यात्रा जारी है। गहन  साधनाओं के समय सूक्ष्म चेतना जहां एक तरफ उच्च आयामों की दुनिया में यात्रा करती है। वहीं शरीर के भीतर की यात्रा भी सम्पन्न होती है। इस पड़ाव के बारे में  कम ही लोग जानते हैं।
इसके लिये गहरी क्षमता की जरूरत होती है। साधक जब उच्च आयामों में प्रवेश करने की क्षमता प्राप्त कर लेता है, तब शरीर के भीतर की यात्रा आरम्भ होती है। शास्त्रों में इसका कई जगह विस्तार से विवरण मिलता है।
शरीर के भीतर की यात्रा बड़ी ही रोमांचकारी होती है। अपने ही भीतर घूमना, अपने अंगों के भीतर चलना, अपनी रक्त नलिकाओं के भीतर तैरना, उर्जा नाड़ियों के प्रवाह में लोक परलोक को देखना। यह सब अकल्पनीय रोमांच से भरा होता है। शरीर के भीतर का आयाम उच्च आयामों जैसा ही रहस्यों से भरा होता है। वहां भी करोड़ों करोड़ जीव होते हैं। उनमें लाखों प्रजातियां होती हैं। आपस में उनके रिश्ते होते हैं। वे अलग अलग कालोनियों में मिलते हैं। उनमें संवाद होता हैं।
उन पर विभिन्न तरह की जिम्मेदारियां होती हैं। उनके अपने कार्य क्षेत्र होते हैं। अलग अलग कार्य क्षमता होती है। वे सब अपने काम में लगे मिलते हैं। उनकी अलग अलग उम्र होती है।
धरती का विज्ञान उन्हें बैक्टीरिया कह कर छोड़ देता है।किंतु उनके परिचय में ग्रंथ रचे जा सकते हैं।
शास्त्रों में शरीर के भीतर ब्रह्मांड होने की बात अनेकों तरीके से बताई गई है। कुछ विद्वानों ने यहां तक लिखा है कि शरीर अपने आप में सम्पूर्ण ब्रह्मांड है। जो कुछ ब्रम्हांड में है वह सब शरीर में है। इस सच्चाई को देखना इंद्रलोक में भ्रमण करने से कम आनंददायी नही।
किंतु शरीर के ब्रह्मांड में भ्रमण कर सकें ऐसी क्षमता कम ही साधकों में होती है। शरीर के भीतर की दुनिया तिलस्म सी लगती है। वहां कई जगह अटक कर भटक जाने के खतरे होते हैं। सक्षम मार्गदर्शक के बिना इस यात्रा की सफलता बिल्कुल भी संभव नही। इस पड़ाव से गुजरे बिना ब्रह्मांड सिद्धियां संभव नही।
शिवप्रिया के मार्गदर्शक शिवदूत ने साधना के आठवें दिन उन्हें शरीर के भीतर की यात्रा आरम्भ कराई। इसके लिये उनकी सूक्ष्म चेतना ने पहले उच्च आयाम में प्रवेश किया। वहां के रास्ते से शरीर के ब्रह्मांड में प्रवेश हुआ।
शरीर के ब्रह्मांड में भ्रमण के दौरान शिवप्रिया को तमाम अलौकिक अनुभव हुए। उनके मार्गदर्शक कहीं साथ रहे तो कहीं अकेले ही यात्रा कराई।
इसी सूक्ष्म यात्रा के बीच शिवप्रिया को उर्जा शक्ति का दिव्य शिवलिंग प्राप्त हुआ। मार्गदर्शक ने शिवप्रिया को उस शिवलिंग को सिद्ध करना, अपने नाभि चक्र में स्थापित करके उसकी शक्तियों का उपयोग करना सिखाया।
दसवें दिन की साधना तक उस शिवलिंग ने कई जगह शिवप्रिया का मार्गदर्शन भी किया। उन्हें रास्ते दिखाए। दसवें दिन की साधना में मार्गदर्शक शिवदूत उस शिवलिंग की शक्तियां बढ़ाने के लिये उन्हें तिलस्मी दुनिया मे ले गए। जहां उर्जा का विशाल शिवलिंग स्थापित है। वहां कदम कदम पर खतरे थे। उस शिवलिंग तक पहुंचने के प्रयास में मार्गदर्शक शिवदूत विष के शिकार हो गए। मृत्यु की स्थिति तक पहुंच गए।
शिवप्रिया के शिवलिंग ने उन्हें बचाने का मार्ग सुझाया। जिसे अपनाने में शिवप्रिया बुरी तरह घायल हुईं। उनके हाथों के चक्र और नाभि चक्र जलकर नष्ट हो गए। जिसका प्रभाव उनके भौतिक शरीर पर भी पड़ा। उस दिन की साधना पूरी करके उठीं तो खुद को बीमार पाया। हाथों और नाभि में भारी जलन व पीड़ा मिली।
ऐसा क्या और क्यों हुआ? यह हम आगे जानेंगे।
शिव शरणं।

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