सुनसान के साधक…9

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रहस्यमयी शक्तियों वाले साधक

सभी अपनों को राम राम।
उत्तरकाशी में बादल फटा। भारी तबाही हुई।
उसका असर दूर तक दिखा। गंगा जी का जल स्तर निचले क्षेत्रों तक खतरे के निशान को पार कर गया।
मैने उत्तरकाशी में साधना का प्रोग्राम बदल दिया। पहाड़ों से उतरकर नीचे समतल की तरफ आ गया। कुछ दिन हरिद्वार में साधना करके मौसम साफ होने पर उत्तरकाशी जाने का मन बनाया।
यहां गंगा जी के किनारे शिवार्चन साधना जारी रखी।
शिवार्चन के बाद गंगा जी के सानिध्य में 4 घण्टे की साधना चल रही थी। पहाड़ों के सौंदर्य को ‘मिस’ कर रहा था। नीचे आकर खड़ी साधना बन्द हो गयी।
गंगा किनारे की साधना के लिये सुनसान क्षेत्र चुना था। वहां दो नदियां आकर मिलती हैं। दो नदियों का जहां संगम होता है, वह स्थल साधना के लिये बेमिशाल होता है। इस बात को साधना की गहरी समझ रखने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं।
सो सुनसान होंने के बावजूद कुछ साधक वहां मिल ही जाया करते थे।
मै उस दिन भी वहीं गया।
समय तकरीबन 7 बजे शाम का था।
जब मै वहां पहुंचा तब पहले से ही एक और व्यक्ति बैठे हुए थे। वहां से लगभग दो सौ मीटर दूर दो और व्यक्ति दिखे। वे कुछ तांत्रिक क्रियाएं कर रहे थे। उन्होंने दो खप्पर में आग जला रखी थी। उसकी रोशनी में उनकी क्रियाएं नजर आ रही थीं। सामान्य लोगों के लिये वे क्रियाएं असामान्य थीं। थोड़ी डरावनी, थोड़ी विचलित करने वाली।
साधना के लिये जहां मै रुका, वहां पास बैठे व्यक्ति को मेरा आना अच्छा नही लगा। उन्होंने एक नजर मेरी तरफ देखा और अपनी क्रिया में लीन हो गए।
वे सिगरेट की तम्बाकू निकालकर उसमें कुछ मिलाकर दोबारा सिगरेट में भर रहे थे। इस तरह तैयार की गई कई सिगरेट उनके सामने बालू पर रखी थीं और कुछ वे तैयार कर रहे थे।
वे नीचे गंगा जी की बालू पर बैठे थे। गंगा जी की धारा से इतने पास कि चाहें तो हाथ बढाकर पानी छू लें।
मै पास में स्थित पत्थर की शिला पर बैठ गया। रोज इसी पर बैठकर साधना करता था।
ये व्यक्ति मुझे पहली बार दिखे। देखने में एकदम साधारण। छोटे बाल, धारियों वाली पुरानी टी शर्ट, पुरानी सी मटमैली पैंट। पहली नजर में मजदूर से लग रहे थे।
लगा वे चरस गांजा पीने वाले कोई व्यक्ति हैं। गंगाजी के किनारे ऐसे नशेबाज अक्सर मिल जाते हैं। मैने सोचा अपने नशे में दखलंदाजी की आशंका से उन्हें मेरा वहां बैठना बुरा लग रहा हैं। सोचा वह कुछ देर में नशा करके चले जायेंगे।
लेकिन वे नही गए। बल्कि शायद मेरे जाने का इंतजार करते रहे।
उन्होंने एक सिगरेट सुलगाई। हवा का रुख मेरी तरफ था। सो उनकी तरफ से आ रहा नशीला धुंआ मुझे परेशान करने लगा। सिगरेट खत्म होने पर उन्होंने अपनी टीशर्ट उतार दी। अपना आसन जमाने लगे। तब मुझे पता चला कि वे साधना करने के इरादे से वहां बैठे हैं।
कुछ देर बाद उन्होंने दो सिगरेट और जलाई। एक को सीधी अगरबत्ती की तरह बालू पर खड़ी कर दी। दूसरी को खुद पीने लगे। बालू पर सीधी खड़ी सिगरेट ऐसे सुलग रही थी जैसे कोई उसके कस लगा रहा हो। धीरे धीरे धीमी होती उसकी आग अचानक ऐसे दमकने लगती जैसे किसी ने कस खींचा हो। साथ ही एकदम से धुवां निकल पड़ता।
बीच बीच में वे इसी तरह सिगरेट जलाते। और उसे बालू पर अगरबत्ती की तरह गाड़ देते। वह वैसे ही सुलग सुलग कर जलती रहती जैसे कोई पी रहा हो।
उन्होंने अपने मोबाइल पर पुराने गाने बजा रखे थे। उनमें अधिकांश लता-किशोर के थे। शायद साधना के समय टाइम जानने के लिये गाने बजाए हों। मेरे मोबाइल पर मृत्युंजय मन्त्र बज रहा था। जिसकी अवधि एक घण्टे थी। जब वह चार बार बज जाता तो मुझे पता चल जाता कि साधना के चार घण्टे हो गए।
वहां गंगा जी का बहाव बहुत तेज था। उनके सिगरेट सुलगाने की प्रक्रिया के कुछ देर बाद धारा की विपरीत दिशा से उछली एक मछली उनके सामने आकर गिरी। इतनी तेज बहाव में मछली को देख मै थोड़ा अचंभित था। वह भी उझलकर पानी से बाहर आकर गिरी। ऐसा बिल्कुल नही था कि वहां मछलियों की भरमार हो। और वे उछलकर बाहर आ रही हों।
फिर भी ऐसा हुआ।
उन्होंने बालू पर पड़ी मछली को उठाया।
उसे हाथ में लेकर ऐसे निरीक्षण किया जैसे मछली उनकी जरूरत हो और उनके बुलावे पर वहां आई हो। उलट पलटकर देखकर उन्होंने मछली को वापस पानी में छोड़ दिया।
एक और सिगरेट सुलगाकर बालू पर लगा दी। खुद आंखे बंद करके ध्यान मुद्रा में बैठ गए। कुछ देर बाद एक और मछली उझलकर पानी से बाहर बालू पर आकर गिरी। पहली वाली की तरह वह भी छोटे आकर की थी।
इस बार मछली मुझसे ज्यादा नजदीक थी। मैने उठाया, हाथ पर रखकर 10 बार उसे राम राम सुनाया और वापस पानी में छोड़ दिया।
मै रोज वहां आता था। मछलियों को पानी से निकलकर बाहर कूदते कभी नही देखा। समझ गया कि उन पर मन्त्र शक्ति का उपयोग किया जा रहा है। शायद बलि देने के लिये।
पास मौजूद साधक ने मछली को पानी मे वापस डालते मुझे देख लिया था। उनके हावभाव से प्रतीत हुआ कि इससे वे नाखुश हैं। शायद उन्हें भी लग रहा था कि मै यूं ही घूमने टहलने वाला व्यक्ति हूं, कुछ देर में चला जाऊंगा।
मै वापस पत्थर शिला पर बैठ गया।
संकल्प लेकर आंखे बंद कीं और साधना की गहराइयों में उतरने लगा।
कुछ समय ही बीता होगा। मुझे तेज बदबू का अहसास हुआ। इतनी तेज की बर्दास्त से बाहर होने लगा।
फिर लगा कि मुझे धकेला जा रहा है। ठीक वैसे ही जैसे किसी को धकेलकर अपने लिये जगह खाली कराई जाती है। दबाव इतना अधिक था कि आंखे खुल गईं। ऐसा कोई न दिखा जो धक्का दे रहा हो। वे साधक अपने स्थान पर थे। वे ध्यान में जा चुके थे। उनकी गर्दन और पीठ काफी नीचे तक झुक गयी थी। ध्यान में जाने पर कई लोगों के साथ ऐसा होता है।
वहां हम दोनों के अलावा और कोई नही दिख रहा था। फिर भी किसी अन्य की उपस्थिति का असरदार प्रभाव था। मुझे अभी भी धकेले जाने का अहसास हो रहा था। जैसे कोई वहां से बलपूर्वक हटा देना चाहता हो।
मुझ पर किसी तरह का हमला नही हुआ था। फिर भी सुबह बनाया मेरा सुरक्षा कवच टूट चुका था।
हद हो गयी। मेरे मन में आवाज उठी।
न जान न पहचान। न दुश्मनी न अदावत। फिर भी पंगेबाजी!
बड़ा विचित्र और विचलित करने वाला अहसास हो रहा था। एक बार सोचा चलो किसी को एतराज है तो हट जाते हैं यहां से।
परन्तु फिर क्षत्रियता जग पड़ी। मन ने कहा ऐसे कैसे हट जाए। किसी को एतराज है तो अपनी बात कहे तो सही। यह तो दादागिरी है। हम न हटेंगे।
नही पता था कि किस शक्ति से सामना होने वाला है। नही पता था कि सामने वाला कितना नुकसान कर सकता है।
संकल्प ले चुका था। सो साधना बीच में नही रोक सकता था। साधना के मन्त्र को छोड़कर कवच का निर्माण भी नही कर सकता था।
सो शिवगुरु से देवदूतों की मांग कर ली।
कुछ ही देर में रस्साकसी खत्म हो गयी।
साधना पूरी हुई।
आंखे खोलीं तो वे अभी भी ध्यान में मिले। उनके सामने एक मछली मरी पड़ी थी। शायद बलि दी गयी।
जब मै उठने को हुआ तभी उन्होंने अपनी आंखें खोलीं। अब वे जान चुके थे कि मै भी साधक हूं।
आंख खोलते ही कुछ देर और रुकने के लिये कहा। मै बैठ गया।
परिचय हुआ।
बोले किस मिट्टी के बने हो आप!
क्यों? मैने जवाब में सवाल किया।
बस ऐसे ही। उन्होंने हंस कर प्रसंग समाप्त करने की कोशिश की।
मगर मैने बात खत्म न होने दी। और उनसे पूछा आप बिना जाने समझे हुए भी लोगों से वैर मोल ले लेते हो। इसे अहंकार समझें या नादानी।
नही नही। मैने आप से वैर नही निभाया। वे बोले ये तो मेरी सिद्ध की हुई शक्ति थी जो आपको यहां से हटाना चाहती थी। अब तक मैने इसे हारते नही देखा, मगर आप तो तस से मस नही हुए।
क्या सिद्ध किया है आपने। जिज्ञासावश मैने पूछा। क्योंकि उनके पास कौन सी शक्ति है, यह मै जान न सका था।
पिशाच!
उनका जवाब सुनकर मै चुप रहा। पिशाच शक्ति के बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नही थी। बस इतना पता था कि वे प्रेतों से अलग योनि के होते हैं। उनकी शक्तियॉ प्रेतों के मुकाबले अधिक होती हैं। उनकी प्रवृत्ति और घात करने के तरीकों की मुझे प्रामाणिक जानकारी न थी। यह भी पता नही था कि उन पर नियंत्रण कैसे किया जाता था। दरअसल इस दिशा में मेरी दिलचस्पी कभी नही रही। सो इस बारे में जानने की कोशिश ही नही की।
अब जानने समझने का अवसर आया।
मैने उन साधक से इसका आग्रह किया। उन्होंने पिशाच शक्ति से विस्तार में परिचय कराया। जानकर लगा जैसे किसी दूसरी दुनिया की बात हो।
क्रमशः
शिव शरणं
(औपचारिक घोषणा: जो लोग अध्यात्म की गहराइयों से वाकिफ नही हैं, वे मन में किसी तरह का भ्रम पालने की बजाय इस वृतांत को काल्पनिक किस्से-कहानी की तरह से समझकर खुद को इससे अलग रखें।)

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