संत गाथा…6

संत जिनके साथ यक्षिणी रहती थीं


51794112_1899594820151278_8752997470683791360_n.pngसभी अपनों को राम राम
*उन्होंने यक्षिणी को पत्नी के रूप में सिद्ध किया था. देवी उनके साथ रहती थीं. तन से मन से धन से उनका सहयोग करती थीं. लोक परलोक की मनचाही सूचनायें देती थीं. यक्षिणी सिद्धि के बाद उनका जीवन एश्वर्य से भर गया. मगर उन्हें अपनी इस सिद्धी पर अफसोस था.*
मेरी मुलाकात उनसे मुम्बई में हुई.
बात 1989 की है.
तब मै कानपुर से प्रकाशित दैनिक स्वतंत्र भारत अखबार में रिपोर्टर था. भारत सरकार के श्रम मंत्रालय ने देश भर से 22 पत्रकारों का विशेष प्रशिक्षण हेतु चयन किया.
उनमें मै भी था.
उसी सिलसिले में मुम्बई गया.
प्रशिक्षण के लिये कुरला के सेंट्रल इंटीट्यूट में वर्कशाप का आयोजन हुआ. मंत्रातय की तरफ से हम सभी पत्रकारों के रहने की व्यवस्था इंटीट्यूट के हास्टल में की गई थी.
वर्कशाप का समय सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक था.
उसके बाद हम फ्री होते थे.
खाली वक्त में हम काफी दूर पैदल चलकर समुद्र किनारे टहलने निकल जाते थे. मेरे साथ दार्जलिंग से आये पत्रकार दीपांश भी होते थे. कभी कभी कुछ और लोग भी साथ जाते थे.
वह सोलहवां दिन था जब सागर किनारे मेरी मुलाकात उनसे हुई. मै दीपांश के साथ जा रहा था तभी पास से कुछ लोगों की टोली गुजरी. उनमें एक साधु थे, बाकी उनके शिष्य. साधु फिल्मी साधुओं की तरह बहुत फैशनेबल लग रहे थे. मंहगे सफेद कपड़े का चोला पहना था. हाथों में रत्नजड़ित सोने की अंगूठियां थीं. गले में सोने की कई चैन थीं. सभी चेन में किसी न किसी देवता का लाकेट था. उनके वस्त्रों से निकल रही मंहगे इत्र की सुगंध दूर तक फैल रही थी. उनके शिष्य भी वेशभूषा से रईश ही लग रहे थे. वे सब अपनी मस्ती में बातें करते हुए पास से गुजर गये.
एक दूसरे को क्रास करते समय मेरी और साधु की नजरें मिलीं. वे एक तरह निकल गये मै दूसरी तरफ. उनकी आंखों में देखकर मुझे अनायास ही लगा कि वे सिद्ध साधु हैं. उनसे बातें करने का मन हुआ. मगर विपरीत दिशा में चलने के कारण हम एक दूसरे से दूर होते जा रहे थे. सो बात करने का अवसर नही मिला.
अगले दिन सागर किनारे टहलते हुए हम फिर आमने सामने आ गये.
वे भी वहां रोज टहलने आते थे. उन्हें देखकर मेरे मन में बात करनी की इच्छा हुई. विचार किया कि रुककर उनसे बात करुंगा.
बात करने का इरादा उनका भी था. क्योंकि पास आने पर वे रुक गये.
सीधे मुझसे मुखातिब होते हुए पूछा आप पत्रकार हो, कानपुर से आये हो.
उनका सवाल सुनकर मेरे साथ दीपांश भी आश्चर्य में थे. हम साधु से कुछ कहते उससे पहले ही उन्होंने हमारे आश्चर्य को और बढ़ा दिया. अबकी उन्होंने दीपांश का नाम लेकर सम्बोधित किया कहा दीपांश आप दार्जलिंग से हो. आप भी पत्रकार हो.
इससे पहले कि वे हमारे आश्चर्य को बढ़ाने वाला कोई और सवाल पूछते. मैने उनसे पूछा आप हमारे बारे में कैसे जानते हैं.
मेरे सवाल के जवाब में वे हंसते हुए बोले चलो कहीं बैठकर बात करते हैं. पत्रकारों से बातें करने मुझे अच्छा लगता है.
दीपांश काफी धार्मिक किस्म के व्यक्ति थे. पूजा पाठ में उनका बहुत रुझान था. उनका पारिवारिक बैकग्राउंड पूजा पाठ वाला था. साधु संतों से मिलना मेरी तरह उन्हें भी पसंद था. हलांकि उस समय तक मुझे पूजा पाठ में अधिक दिलचस्पी नही थी. बस भगवान के सामने हाथ जोड़ लेता था. तब तक मै तंत्र मंत्र, जादू, टोना, ज्योतिष आदि को बिल्कुल नही मानता था. बल्कि इन चीजों को मानने वालों को मै पांखड का शिकार मानता था.
बचपन से ही साधु संगत मिलती रही थी. सो साधु संतों में मेरा पूरा विश्वास था. इस बात पर दीपांश कहते थे आप आधे धार्मिक हो. मेरा जवाब होता मुझे धार्मिक नही अध्यात्मिक बनना पसंद है.
हम दोनो को ही उन साधु से बात करने की दिलचस्ची थी. तय हुआ कि उनके होटल में बैठा जाये. वे एक होटल में ठहरे थे.
बातचीत में पता चला वे साधु मूल रूप से मध्य प्रदेश के रहने वाले थे. नाम था देवनाथ. उनके शिष्य उन्हें महराज जी कहकर सम्बोधित करते थे. देवनाथ जी के गुरू को यक्षिणी सिद्ध थीं. उन्होंने यक्षिणी को मां स्वरूप में सिद्ध किया था. उन्होंने ही देवनाथ जी को यक्षिणी सिद्ध कराई. मगर देवनाथ जी ने यक्षिणी को पत्नी स्वरूप में सिद्ध किया. बाद में इस बात पर वे बहुत पछताये.
देवनाथ जी ने 16 साल पहले यक्षिणी सिद्धी हासिल की.
विधान उनके गुरू ने सिखाया. साधना की अवधि 41 दिन की थी. इसके लिये उन्हें शमशान के नजदीक स्थित एक गांव में रखा गया. वहां गांव से बाहर मौजूद गूलर के पेड़ पर बैठकर मंत्र जप करना होता था. साधना का काल रात 10 से 3 बजे का था. विधान के मुताबिक 41वी रात में यक्षिणी को प्रकट होना था. उस वक्त वहां किसी अन्य की मौजूदगी यक्षिणी को आने से रोक सकती थी. इसलिये अंतिम दिन उनके गुरू साधना स्थल पर नही रुके. वे सारी बातें समझाकर देवनाथ जी को अकेले गूलर के पेड़ पर छोड़कर लौट आये.
साधक सक्षम हो और विधान का ठीक से पालन किया गया हो तो अंतिम दिन देवी यक्षिणी प्रत्यक्ष होती हैं. वे साधक से उसकी मर्जी पूछती हैं कि वह उन्हें मां, बहन या प्रेमिका-पत्नी में से किस रूप में पाना चाहता है. साधक अपनी इच्छा बताकर देवी को माला पहनाता है और उनसे आजीवन साथ रहने का वचन लेता है. सिद्ध देवी साधक द्वारा जताई इच्छानुसार सदैव उसके साथ रहती हैं.
देवनाथ जी के गुरू ने कहा था कि यक्षिणी को मां रूप में अपनाना. देवनाथ जी ने अपने गुरू द्वारा बताये विधान का पूरी तरह पालन किया. मगर देवी यक्षिणी को अपनाने वाला स्वरूप बदल दिया. उनके साथ के कुछ साधुओं ने बताया था कि पत्नी रूप में प्राप्त यक्षिणी साधक की सदैव सेवा करती है. उन्हें धन सम्पत्ति देती है. मान सम्मान प्रतिष्ठा दिलाती है. देवलोक की औषधियां लाकर देती है जिससे साधक सदैव स्वस्थ और शक्तिशाली बना रहता है. उसका यौवन और सम्मोहन बना रहता है. मगर यदि साधक किसी अन्य महिला के साथ सम्बंध बनाये तो उसे मार डालती है.
देवनाथ जी के मन में तमाम सवाल थे. क्या कोई देवी पत्नी बन सकती है. पत्नी बनकर इस तरह के सुख दे सकती है. वे अपने सवालों के साक्षात जवाब चाहते थे. इसलिये साधना की अंतिम रात में जब देवी यक्षिणी प्रकट हुईं तो उन्हें पत्नी रूप मे साथ रहने की इच्छा जता दी. देवी उनके जीवन में पत्नी रूप में पधार गईं.
उनके जीवन में आते ही देवनाथ की काया पलट गई. उनके मान सम्मान, धन सम्पत्ति में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोत्तरी होने लगी.
मगर वे वासनागामी हो गए. अधिकांश समय यक्षिणी के साथ बिताने लगे. कई कई दिनों तक एक ही कमरे में पड़े रहते थे. ध्यान साधना, पूजा पाठ लगभग बंद हो गया. इस बात से कुपित होकर देवनाथ जी के गुरू ने उन्हें त्याग दिया. जो कि उनके लिये बहुत बड़ी क्षति थी. 10-12 साल तक उन्हें यक्षिणी की सेवा बहुत अच्छी लगी. उस बीच उनके गुरू ने शरीर त्याग दिया. उन्हें गुरू देह को मुखाग्नि देने का अधिकार नही मिला.
इस बात ने उन्हें झकझोरा. वे जान गये थे कि इस जीवन में उन्हें मोक्ष नही मिलेगा. उन्हें यक्षिणी को पत्नी रूप में स्वीकारने का अफसोस होने लगा. देवी को साथ रखने की एेसी आदत पड़ी कि उन्हें छोड़ भी नही पा रहे थे. गलती का अहसास होने पर वे अध्यात्म की मुख्य धारा की तरफ लौटने लगे. लोगों से मिलना जुलना शुरू किया.
मुम्बई मुलाकात में बिना पूछे मेरे और दीपांश के बारे में उन्हें जो जानकारी थी वह यक्षिणी द्वारा दी गई थी.
उस दिन के बाद हम उनसे रोज मिलते रहे. उस बीच उनके साथ यक्षिणी होने के प्रबल प्रमाण बार बार सामने आते रहे. अब वे यक्षिणी का उपयोग दूसरों की भलाई के लिये भी करने लगे थे.
*शिव शरणं*
क्रमशः

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