रहस्यमयी संत से फिर हुई मुलाकातः मृत्यु का सौदा

गुरु जी की हिमालय साधना…17wp-1470493388114.jpg
राम राम, मै शिवप्रिया
हिमालय साधना के दौरान गुरु जी ने गुप्तकाशी को अपना मुकाम बनाया. वहां से केदार घाटी के अन्य सिद्ध स्थलों पर जाकर साधनायें कीं. हिमालय साधना से वापस लौटने के बाद भी उनकी मौन साधना जारी है. इस बीच वे सिर्फ उन्हीं लोगों से बात कर रहे हैं. जो समस्याग्रस्त हैं. उन्हें समाधान देने के लिये ही बोलते हैं. बीच बीच में मै उनसे उनका साधना वृतांत जानने की कोशिश कर रही हूं. जैसे जैसे उनसे जानकारी मिल रही है. मै आपके लिये लिखती चल रही हूं. ताकि मृत्युंजय योग से जुड़े साधक उनके अनुभवों का लाभ उठा सकें. यहां मै उन्हीं के शब्दों में उनका साधना वृतांत लिख रही हूँ।

|| गुरु जी ने आगे बताया…||

साधना से बचे समय में मै पहाड़ों की ऊंचाईयों पर घूमने चला जाया करता था. अक्सर उस तरफ, जहां सामान्य रूप से लोग नही जाते. उस दिन दोपहर 12 बजे मेरी साधना पूरी हुई. नीलमणि उससे पहले ही मेरे लाॅज में आ चुके थे. वे मध्य प्रदेश से आये थे. पेशे से इंजीनियर नीलमणि सिद्ध साधक हैं. कई सिद्धियां कर चुके हैं. मेरे साथ हिमालय साधना करने की लालसा उन्हें यहां ले आई थी. वे आये, साथ में अपना पालतू यानि सिद्ध किया प्रेत भी साथ लाये.

उन्हें लगता था कि पहाड़ों में घूमने के दौरान मुझे कुछ खास अध्यात्मिक उपलब्धियां होती हैं. वे उन्हें देखना, जानना और सीखना चाहते थे. इसलिये मेरे साथ चल दिये. तय हुआ था कि जब तक मै पहाड़ों में घूमते हुए शिव सहस्त्र नाम की 5 आवृत्तियां पूरी न कर लूंगा. तब तक हम आपस में बात नही करेंगे. वैसे भी मेरे साथ रहने के दौरान मेरे अध्यात्मिक शिष्य मुझसे अधिक बात नही करते. उन्हें मालुम है कि मुझे मौन अधिक पसंद है.
हम गुप्तकाशी के विश्वनाथ मंदिर के पीछे वाली पहाड़ियों की तरफ चढ़ रहे थे. उधर से कुछ दूर हैलीपैड को जाने वाली सड़क पर चल कर आगे एक पंगदंडी पर बाईं तरफ मुड गये. यहां के हैली पैड से केदारनाथ धाम को हैलीकाप्टर उड़ान भरते हैं. वहां से केदारनाथ धाम पहुंचने में हैलीकाप्टर को 8 मिनट लगते हैं. आने जाने का किराया 7000 है. जो लोग केदारनाथ की लम्बी और थकाने वाली चढ़ाई नही चढ़ पाते. वे हैलीकाप्टर से उड़कर दर्शन कर आते हैं.
हैलीपैड की राह पर कुछ कैम्प बने हैं. उनकी विपरीत दिशा में मुड़कर हम पहाड़ी पर चढ़ने लगे. यहां घने जंगल हैं. जो जंगली जानवरों का मुकाम हैं. हमने हाथ में लम्बे और मजबूत डंडे ले रखे थे. जो पहाड़ी चढ़ने में टेक का काम करते हैं. साथ ही अचानक जंगली जानवर सामने आ जाये तो उन्हें डराने के भी काम आते हैं. आगे चढ़ाई खड़ी होती जा रही थी. छोटे छोटे कदम रखते हुए हम धीरे धीरे चढ़ रहे थे. बिना कोई बात किये हुए. आगे बढ़ते रहे.
पहाड़ी हरियाली की खूबसूरती आगे खींचे लिये जा रही थी.
उनका प्रेत बार बार शांति भंग कर रहा था. नीलमणि ने उसका नाम जेम्स रखा था. क्योंकि वे उससे लोगों की जासूसी कराते थे. यानि लोगों के बारे में छिपी जानकारियां इकट्ठी कराते थे. उसे उन्होंने लगभग डेढ़ साल पहले सिद्ध किया था. तब से साथ ही रखे थे. दोनो एक दूसरे से मालिक गुलाम की तरह नही, बल्कि दोस्त की तरह पेश आते थे. यहां मै उसकी वजह से डिस्टर्ब हो रहा था. क्योंकि वो हमसे आगे ये देखता चल रहा था कि कोई खतरा तो नहीं. इस चक्कर में बड़े बड़े पेड़ों को जोर से हिला डालता था. जिससे अचानक चौकाने वाला शोर उत्पन्न होता था. एकदम से हलचल मच जाती थी.
इससे शिव सहस्त्र नाम जाप की एकाग्रता टूट रही थी. कुछ देर तो मै बरदास्त करता रहा. मगर उसकी हलचल बढ़ती जा रही थी. तो मैने नीलमणि से कहा इसको क्यों लाये साथ. बोलो शांत रहे या वापस लौट जाये. थोड़ी देर के लिये वो शांत हो गया. मगर जल्दी ही फिर हरकतें करने लगा.
कुछ देर बाद एकाएक एक पेड़ की मोटी डाली टूटी और हम लोगों के बिल्कुल सामने आ गिरी. अगर वो पत्थरों में नही फंस जाती तो पलटती हुई हम पर आ जाती. एेसे में हम उसके नीचे दब जाते.
नीलमणि गुस्से में चिल्लाये. क्या कर रहा है बेवकूफ.
मै समझ गया ये हरकत जेम्स की थी. तभी जहां डाली गिरी थी उसके पीछे से एक भालू डर कर भागता दिखा. भालू भारी भरकम था. जेम्स ने पेड़ की डाली से उस पर ही हमला किया होगा. उसे लगा होगा रास्ते में खड़ा भालू हम लोगों पर हमला कर सकता है. इसलिये उसने हमें बचाने के लिये एेसा किया होगा.
जब इस बात का अहसास हुआ तो नीलमणि को जेम्स पर प्यार आ गया. वे गुस्सा भूलकर उसे दुलराने लगे.
मै मुस्कराया और आगे चल दिया.
नीलमणि का ये अदृश्य साथी बड़ा ही विचित्र बाड़ीगार्ड था. अदृश्य होने के कारण कब क्या कर रहा है, इसका ठीक ठीक अंदाजा नही हो पाता था. मगर अंत में नतीजा सकारात्मक ही निकाल लेता था. नीलमणि से उसने शर्त ले रखी थी कि जब चाहे अदृश्य हो सकता है. इसलिये वो अपनी मर्जी से ही सामने आता था. उसे अदृश्य रहने में ज्यादा सुविधा होती थी.
आगे हमने जेम्स को रास्ते का निरीक्षण करते हुए चलने की पूरी छूट दे दी. अब वो कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गया था. हम जहां जहां से गुजर रहे थे वहां के पेड़ों को एेसे हिलाता चल रहा था, जैसे हमारे साथ तूफान चल रहा हो. रास्ते में उसने कहीं से कुछ कंद भी लाकर दिये. नीलमणि ने उन्हें खाकर भूख मिटाई. वे पहाड़ चढ़ते चढ़ते भूखें हो गये थे. लो एनर्जी फील कर रहे थे. जेम्स के लाये कंद खाकर एनर्जाइज हो गये.
हम तकरीबन 7 किलोमीटर चढ़ते चले गये. जहां तक हम चढ़ गए थे. वहां आमतौर से कोई आता जाता नहीं. इसलिये वहां हमारे अलावा कोई नही था. पहाड़ के 7 किलोमीटर मैदानी क्षेत्रों के 30 किलोमीटर से भी अधिक थकाऊ होते हैं. नीलमणि बहुत थक गये. कई जगह बैठकर रिलैक्स किया. मै हिमालय साधना में आने के बाद कई दिनों से पहाड़ों में घूम रहा था. उनका पहला दिन था.
जिस उम्मीद में वे मेरे साथ आये थे. वैसा उन्हें कुछ नही दिखा.
अंत में बोले गुरुदेव अब लौट चलें क्या.
नही थोड़ा और चलेंगे. मैने कहा और मुस्कराकर आगे चल दिया.
वे बोले गुरुदेव मै यहीं बैठकर आपका इंतजार कर लूं. जेम्स आपके साथ रहेगा.
मै उनके पास बैठ गया. उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा कुछ मिस न हो जाये तुमसे. मेरी इस बात ने उनके शरीर में करेंट सा प्रवाहित कर दिया.
वे बोले नही नही मै आपके साथ ही रहुंगा.
कुछ देर बाद हम उठे. आगे चल दिये. लगभग आधा किलोमीटर और चले होंगे कि सामने से दो लोग आते दिखे. वे हमारी तरफ और हम उनकी तरफ बढ़ रहे थे. हम पास आते गये. जब बिल्कुल पास आये तो मै थोड़ा अचम्भित हुआ. सामने से आ रहे लोगों में से एक को मै पहचानता था.
आप यहां भी. पास आते ही मैने अभिवादन करते हुए उनसे कहा. वे वही रहस्यमयी दिव्य संत थे जो मुझे नीलकंठ के पहाड़ी जंगलों में मिले थे. जिन्होंने खतरे के कारण मुझे घने जंगलों में आगे जाने से रोका था. खुद उसी दिया में जाकर विलुप्त हो गये थे. जिन्होंने मुझे लोगों का प्रारब्ध उपचारित करने की सलाह दी थी। जिन्होंने इसकी विधि जानने के लिये मुझे केदार क्षेत्र में आने का सुझाव दिया था. उसी कारण मै यहां आया.
हां मै. और अभी अगले 6 साल तक मै तुमको बार बार मिलता रहुंगा. वे बोले और ठहाका लगाकर जोर से हंस दिये. मुझे याद आया नीलकंठ क्षेत्र में मिलने के दौरान भी वे बार बार हंसते जा रहे थे. सम्मोहक हंसी हंसना उनका स्वभाव था.
तो मै आपके साथ ही हो लेता हूं. मैने मजाक में कहा आपको यूं जगंलो में मुझे बार बार ढूंढ़ना नही पड़ेगा.
वे फिर ठहाका लगाकर हंस पड़े.
मै भी हंस दिया.
ये तुमसे मिलने कहीं भी आ जाएंगे. ये बात उनके साथ आये दूसरे बुजुर्ग ने कही. तो मेरा ध्यान उनकी तरफ गया.
मैने उन्हें अभिवादन किया. उन्होंने मुझे किया. हम एक दूसरे की तरफ मुखातिब हुए. वे भी सिद्ध संत थे.
मै उनके बारे में अंदाजा लगा ही रहा था कि पहले वाले संत ने कहा ये तीन सौ साल से इस समय का इंतजार कर रहे थे. इसलिये मै साथ ले आया.
यानी उनकी उम्र तीन सौ साल से अधिक थी. मै निष्कर्ष पर पहुंचा.
साथ ही इस बात की पुष्टि के लिये मैने उनके मस्तिष्क को रीड करने की तैयारी कर ली. इसके लिये उनके आज्ञा चक्र को मुझे अपने भीतर प्रवेश करने की अनुमति देने की कमांड दे दी.
इस पर पहले वाले संत ने कहा रुक जाओ भाई. इतनी भी क्या जल्दी है. मै खुद ही इनका परिचय देता हूं.
आपने अपना परिचय तो अब तक नही दिया. मैने मीठी सी शिकायत की. और न ही मुझे आपके बारे में पता लगाने की अनुमति दे रहे हैं.
दरअसल पिछली बार जब वे मिले थे तो अपना पिरचय छिपा गये थे. जब मैने उनका दिमाग पढ़ने की कोशिश की तो पाया कि उन्होंने अपनी उर्जाओं को सूचना न देने के लिये प्रतिबंधित कर रखा है. जिसके कारण मै उनका मस्तिष्क रीड नही कर सका था.
आज मै बताता हूं. अपने बारे में भी. इनके बारे में भी. संत ने कहा. आने वाले कुछ समय तक हमें एक टीम की तरह काम करना है. इसलिये परिचय तो जरूरी होगा ही.
मगर हमारे बारे में और हमारे काम के बारे में जानने से पहले आपको इस जीवन का मोह त्यागना होगा. ये बात साथ आये दूसरे संत ने कही.
जीवन का मोह त्यागना होगा या शरीर त्यागना होगा. मैने सीधा सवाल किया. क्योंकि अब बात मुद्दे की हो रही थी.
नही शरीर नही त्यागना होगा. इस शरीर की कुछ समय तक जरूरत रहेगी. उन्होंने कहा. मगर जीवन से मोह त्यागना होगा.
जीवन से मोह त्यागना होगा. या जीवन में जो अपने बन गये हैं उनसे मोह भंग करना होगा. मैने पूछा.
जीवन में जो अपने बन गये हैं उनसे मोह भंग करने की रचना तो रच दी गई है. पहले वाले संत ने कहा और ठहाका लगाकर हंस दिये.
मै उनकी बात का मतलब बहुत अच्छी तरह समझ रहा था. वे मेरे और मेरे इस जीवन के अपनों के प्रारब्ध की तरफ इशारा कर रहे थे. मै चुप रहा.
दूसरे वाले संत ने गम्भीरता से कहना शुरू किया साफ शब्दों में कहें तो ये मृत्यु का सौदा साबित हो सकता है. एेसी मृत्यु जिसे हम तीनो मिलकर तय करेंगे.
मै चुप रहा. खामोशी को उन्होंने मेरी सहमति मान लिया. सच भी यही था. मैने उन्हें मूक सहमति दे दी थी.
मगर उनकी आगे की बातें सुनकर नीलमणि बेचैन हो गये.
पहले तो वे उन लोगोें को यहां देखकर अचम्भित थे. अब उनकी बातें सुनकर बुरी तरह भयभीत से हो गये. इतना कि खुद को रोक नही पाये और बीच में हस्तक्षेप करके बोल पड़े. नही गुरुदेव ये सब बिल्कुल नही होना चाहिये. मै इनकी बातों से बिल्कुल सहमत नही हुं. आपको भी नही होने दूंगा. आप लोगों की भलाई कर पाने में अपने आप में सक्षम हैं. इनके फार्मूले पर चलने की मुझे कतई जरूरत नही लगती.
मैने नीलमणि को शांत रहने का इशारा किया.
मगर वे शांत नही हुये.
संतो का प्रस्ताव जानकर उनका मन मस्तिष्क विचलित हो गया था. मेरे प्रति प्रेम और अपनेपन ने उन्हें बेचैन कर दिया था. सही कहें तो वे अनियंत्रित नजर आ रहे थे. उनके मनोभाव भांपकर मैने और संतों ने उनका कोई विरोध नही किया.
बस उनके शांत होने का इंतजार करने लगे.
क्रमशः…।

… अब मै शिवप्रिया।
रहस्यमयी संतों का परिचय और उनके उद्देश्य का रहस्य मै आगे लिखुंगी.
तब तक की राम राम।
शिवगुरु जी को प्रणाम।
गुरु जी को प्रणाम।

4 responses

  1. Bharatbhai Manishanker rajyagury | Reply

    शिवप़ियाजी रामराम ।ये पठते ही हम कोई नयी दुनियामे खोजाते है ।पू.गुरुजीका सानिघ्य पा लेते है ।आपका बहोत धन्यवाद ।

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  2. Kya aisa ho skta hai ki mai mrit aatma ya pret se sakshatkar kr saku.kripya mujhe bhi aisi sadhnaye ke bare me bataye

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  3. dr.pratiksha parmar | Reply

    Pranam guruji ham aap par puri sradha se Jude hue He.

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  4. Pranam guru ji ,
    phir aage kya huva ….

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