फिर हिंसक हो गई काली धरती में समा गईं

गुरु जी की हिमालय साधना…16राम राम, मै शिवप्रिया

हिमालय साधना के दौरान गुरु जी ने गुप्तकाशी को अपना मुकाम बनाया. वहां से केदार घाटी के अन्य सिद्ध स्थलों पर जाकर साधनायें कीं. हिमालय साधना से वापस लौटने पर मैने उनसे साधना वृतांत बताने का अाग्रह किया. ताकि मृत्युंजय योग से जुड़े साधक उनके अनुभवों का लाभ उठा सकें. यहां मै उन्हीं के शब्दों में उनका साधना वृतांत लिख रही हूँ।

|| गुरु जी ने आगे बताया…||

रुच्छ महादेव के शिवलिंग का उपयोग भगवान शिव द्वारा कालांतर में एक बार और किया गया. तब ये शिवलिंग नही था. पत्थर की एक सिला भर थी.

बात उस समय की है जब एक राक्षस ने कड़ी तपस्या की. ब्रह्मा जी से अपराजित होने का आशीष प्राप्त कर लिया. उसने वरदान मांगा कि अगर उसका खून धरती पर गिरे तो उसी क्षण हर बूंद से उसके जैसा बलशाली राक्षस तैयार हो जाये. दरअसल ये क्लोनिंग की उच्च तकनीक थी. शिव व्यवस्था में बंधे ब्रह्मा जी को तथास्तु कहना पड़ा.

यहां एक बात पर चर्चा कर लेना जरुरी होगा. वो ये कि ब्रह्मा जी को एेसा क्या हो जाता है, जो किसी भी उसका मनचाहा वरदान दे देते हैं. बाद में वही लोग वरदान के बूते धरती से लेकर स्वर्ग तक आतंक मचाते हैं. अधिकांश राक्षसों ने उनसे वरदान लेकर तबाही मचाई. सुनने, पढ़ने और सोचने से एेसा लगता है जैसे ब्रह्मा जी को दुनिया की परवाह ही नही. वे यूं ही बिना सोचे समझे राक्षसों को वरदान दे देते हैं.

मगर एेसा नही है. ये महादेव की व्यवस्था है. उन्होंने तपस्यवियों और साधकों के हित में एक अचूक व्यवस्था बनाई है. जिसके मुताबिक निर्धारित विधान से जप, तप करने पर देवता को प्रकट होना ही पड़ेगा. साथ ही अपनी क्षमतानुसार वरदान भी देना होगा. अगर कोई देवी या देवता विधि पूर्वक निर्धारित साधना के बावजूद साधक के सामने प्रकट नही होते. तो भगवान शिव ने उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाई का प्रावधान किया है. जिसके तहत साधक उस देवता के क्रोध मंत्र का जाप शुरू कर सकता है. उसके बाद भी अगर देवता साधक के सामने नही आता तो शिव मर्यादा के मुताबिक उसके लिर के टुकड़े टुकड़े हो जाएंगे. देवता की मृत्यु हो जाएगी.

साधकों के हित में बड़ी ही सक्षम और विलक्षण व्यवस्था बनाई है महादेव ने. ताकि कोई भी देवता साधकों की अनदेखी न कर सके. यहां तक की कुछ साधक अप्सराओं, यक्षणियों को सिद्ध करके उन्हें पत्नी- प्रेमिका की तरह रखते हैं. कुछ अन्य योनियों की अदृश्य शक्तियों को कई साधक गुलाम सा बनाकर रखते हैं. उनसे मनचाहे काम कराते हैं. ये सब भगवान शिव की इसी व्यवस्था के कारण सम्भव होता है. वर्ना देवताओं को क्या गर्ज है जो वे धरती पर आकर साधकों की बातें मानें.  इसका उलंघन कोई भी देवी देवता नही कर सकते. स्वयं शिव भी इसका पालन करते हैं. यही कारण है कि विधान का पालन करके की गई तपस्या के तहत ब्रह्मा जी को साधक के समक्ष आना ही पड़ता था. उन्हें अपनी क्षमतानुसार वरदान देना ही पड़ता था.

अब सवाल है कि एेसे मामलों में अक्सर ब्रह्मा जी ही क्यों वरदान देने पहुंच जाते हैं. एेसा नही है कि सिर्फ ब्रह्माजी की वरदान देने आते हैं. सभी देवी देवताओं को अपने साधकों समक्ष आना पड़ता है. ये साधक के क्षेत्र की सामान्य घटना है. मगर जो घटनायें पूरी दुनिया को प्रभावित करती हैं. उनके लिये सक्षम वरदान का होना जरूरी है. चूंकि ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता हैं. उन्हें सृष्टि के सभी रहस्यों की जानकारी है. इसलिये दुनिया में अपना परचम लहराने के इच्छुक लोग उनकी ही तपस्या करते हैं. उन्हे लगता है कि ब्रह्मा जी से ही एेसा सक्षम वरदान मिल सकता है. भगवान शिव से एेसे वरदान लेने के लिये ज्यादा कठोर तप का विधान है. इसलिये एेसे साधक उनकी बजाय ब्रह्मा जी को ही प्राथमिकता देते आये हैं. संसार के व्यवस्थापक होने के नाते भगवान शिव ने सिर्फ विष्णु जी को साधना व्यवस्था के इस विधान से उन्हें मुक्त रखा है. उन्हें भक्त प्रेम के वशीभूत होकर आना पड़ता है.

तो उस राक्षस ने ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त कर लिया कि उसके खून की जितनी बूंदें जमीन पर गिरेंगे उतने ही उसके हमशक्ल महाबली पैदा हो जाएंगे. उसका रक्त धरती पर बीज की तरह काम करेगा. इसीलिये उसका नाम रक्त बीज पड़ा. ब्रह्मा जी से वरदान लेकर वह लगभग अजेय हो गया. जब भी उसे कोई मारने की कोशिश करता. उसका खून बहता. धरती पर गिरता. उसके जैसे तमाम वीर पैदा हो जाते. इस तरह उसकी कभी खत्म न होने वाली सेना तैयार हो जाती. और वह जीत जाता. उसने धरती, आकाश, पाताल सब जगह आतंक मचा दिया. देवताओं को भी अपने स्थान छोड़कर भागना पड़ा.

लम्बा समय बीत गया. कोई उसे हरा न सका. सब परेशान थे. सबका बुरा हाल था. त्रिदेव भी उसे मारने की स्थिति में नही थे. तब त्रिशक्ति के निर्णाम का निर्णय लिया गया. इसके लिये ब्रह्मा, विष्णु, शिव के डी.एन.ए. को एकत्र करके भयानक स्वरूप में आदि शक्ति का आवाह्न हुआ. ताकि वे रक्तबीज के खून को धरती पर गिरने से रोक सकें. भले ही इसके लिये उन्हें अमानवीय स्तर तक जाना पड़े. वे काली के रूप में प्रकट हुईं. उनसे रक्तबीज के संहार की प्रार्थना की गई.

देवी काली रणभूमि में आ गईं. रक्त बीज पर आक्रमण हुआ. भयानक युद्ध छिड़ा. मां काली ने राक्षसों का संहार शुरू कर दिया. चारो तरफ खून ही खून. हजारों राक्षस मारे गए. मगर रक्त बीज की सेना कम होने की बजाय बढ़ती जा रही थी. क्योंकि जमीन पर गिरने वाले उसके खून की बूंदें नये रक्त बीज पैदा कर रही थीं. जिसे देखकर देवी काली का गुस्सा सीमा पार कर गया. उन्होंने एक अमानवीय मगर जरूरी फैसला लिया. उन्होंने रक्तबीज का खून पीना शुरू कर दिया. उसके शरीर से निकले खून को जमीन पर गिरने से पहले वे उसे अपने खप्पर में ले लेतीं. फिर पी जातीं. इस तरह उन्होंने रक्तबीज का सारा खून पी लिया. तब उसे मार पाईं.

मगर इस दौरान मानव खून पीने के कारण देवी काली सुध बुध खो बैठीं. वे भयानक गुस्से में थीं. खुद पर से उनका नियंत्रण खत्म हो गया. वे भूल गईं कि किसे मारना है किसे नही. गुस्से की अधिकता के कारण उन्हें लग रहा था कि सबको मार देना है, और उनका खून पी जाना है. राक्षसों की सेना समाप्त हो गई. अब बारी देवताओं की थी. क्रोधित काली ने उन्हें मारना शुरू कर दिया. जो सामने आया वो मारा गया. अब लग रहा था दुनिया में कोई नही बचेगा. सब मारे जाएंगे.

इस स्थिति का किसी को अंदेशा ही न था. फिर एक बार सृष्टि का विनाश होता दिखने लगा. त्रिदेव भी चिंतित हो गये. मगर वे काली का सामना न कर सके. खून की प्यासी हो चली देवी को हरा पाना उनके वश में न था. क्योंकि उनमें त्रिदेवों की ही शक्तियां समाई थीं. संहार जारी था. मृत्यु से बचने के लिये देवता व अन्य लोग पहाड़ों की तरफ भागे. उन्हें देकार घाटी उपयुक्त लगी. सोचा भगवान शिव बचा लेंगे. शिव से प्रार्थना की गई.

लोगों को बचाने के लिये एक बार फिर महादेव ने जान हथेली पर ले ली. उन्होंने क्रोधित काली पर नियंत्रण के लिये फ्रीज करने वाली उर्जाओं का प्रयोग करने की योजना बनाई. उस समय तक काली केदार घाटी में प्रवेश कर चुकी थीं. भगवान शिव मंदाकिनी और सरस्वती नदी के संगम पर पहुंचे. उन्हें यहां की सर्द उर्जाओं की क्षमता पता थी. वो यही स्थान था, जहां रुच्छ महादेव हैं.

यहां पहुंचकर महादेव ने घाटी के उसी पत्थर सिला का चयन किया. जिसे कालांतर में विष की पीड़ा से बचने के लिये किया था. भगवान शिव जानते थे कि अगर चूके तो काली के खतरनाक हमले से बचना नामुमकिन होगा. इसलिये प्रयोग के लिये वातावरण को अनुकूल करना जरूरी था. विशाल पत्थर को जमा देने वाली ठंडी नीली उर्जाओं से भर दिया. खुद सर्द उर्जाओं का भंडार लेकर उस पर लेट गये. काली उसी रास्ते से गुजरने वाली थीं.

उस समय मां काली विशाल आकृति में थीं. उनके कदम फुट, मीटर नही बल्कि किलोमीटर के हिसाब से पड़ रहे थे. जिससे वे पहाड़ियों, घाटियों को लांघती जा रही थीं. इस घाटी में आते ही उनका पहला कदम शिव पर पड़ा. जो फ्रीज कर देने वाली नीली उर्जाओं को घनीभूत करके लेटे थे. उनके सम्पर्क में आते ही क्रोध से जल रही देवी काली की उर्जायें शिथिल होने लगीं. उन्हें शिव की उर्जाओं की पहचान हो गई. तब अहसास हुआ कि उन्होंने शिव को रौंद डाला.

इस बात का अहसास होते ही मां काली रुक गईं. मगर तब तक कुछ कदम चल चुकी थीं. भगवान शिव की सर्द उर्जाओं और देवी काली के मन में पनपे पछतावे के भाव ने उन्हें जड़ कर दिया. वे पत्थर सी हो गईं. और धरती में समा गईं.

जहां वे समाईं वो स्थान आज काली मठ के नाम से स्थापित है. वहां की उर्जायें आज भी साधकों को सिद्धियां देती हैं. दुनिया भर के तंत्र साधक वहां सिद्धियां अर्जित करने आते हैं. जहां मां काली समाई थीं. उसे काली कुंड कहा जाता है. उस पर चांदी का बड़ा श्री यंत्र पत्र ढ़ककर काली पिंडी स्थापित है. मैने उस स्थान पर स्वयं कुंडली जाग्रत कर देने वाली उर्ध्यगामी उर्जायें पायीं. इस बारे में हम पहले बात कर चुके हैं.

काली मठ से थोड़ी दूसरी पर रुच्छ महादेव हैं. इन दिनों हम वहां की दैवीय शक्तियों की बात कर रहे हैं. जिस पत्थर को भगवान शिव ने अपनी शक्तियों से भरकर काली को फ्रीज करने के लिये प्रयोग किया था. वही अब रुच्छ महादेव शिवलिंग है. यही पत्थर विष की पीड़ा से मुक्ति के लिये भगवान शिव द्वारा उपयोग में लाया गया था.  

क्रमशः…।

… अब मै शिवप्रिया।
ये पत्थर रुच्छ महादेव कैसे बना. और इसके सिद्ध होते ही जगत जननी देवी मां यहां रहने खुद क्यों चली आई. और अभी तक यहां क्यों रहती हैं. ये रहस्य मै आगे लिखुंगी.
तब तक की राम राम।
शिव गुरु जी को प्रणाम।
गुरु जी को प्रणाम।

2 responses

  1. पढ़ते समय लगता था की गुरूजी साक्षात् बात कर रहे है, जैसे Television पर. जो ज्ञानकारी दी है उसके बारे मे तो क्या कहना !

    कोटी कोटी साधुवाद.

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  2. pls give me your mumbai center’s address and contact no.

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