रुच्छ महादेवः विशाल शिवलिंग से उर्जा की लपटें निकलने लगीं

गुरु जी की हिमालय साधना…13

Guru ki sadhna3

पीले पत्थर वाले रुच्छ महादेव शिवलिंग के दर्शन अलौकिक हैं

राम राम, मै शिवप्रिया
हिमालय साधना के दौरान गुरु जी ने गुप्तकाशी को अपना मुकाम बनाया. वहां से केदार घाटी के अन्य सिद्ध स्थलों पर जाकर साधनायें कीं. हिमालय साधना से वापस लौटने पर मैने उनसे साधना वृतांत बताने का अाग्रह किया. ताकि मृत्युंजय योग से जुड़े साधक उनके अनुभवों का लाभ उठा सकें. यहां मै उन्हीं के शब्दों में उनका साधना वृतांत लिख रही हूँ।

|| गुरु जी ने आगे बताया…||
काली मठ से कुछ ही घंटे में मै रुच्छ महादेव पहुंच गया. पहले मेरी यहां आने की कोई योजना नही थी. क्योकि इससे पहले मैने इस जगह के बारे में कुछ सुना ही नही था. न ही किसी ग्रन्थ में इस बारे में कुछ पढ़ा था. काली मठ की उर्जाओं ने मुझे यहां आने के लिये प्रेरित किया. या यूं कहें कि ये मेरी डेस्टेनी में था. क्योंकि जिस निमित्त मुझे केदार घाटी में आने के लिये प्रेरित किया गया था, वो उद्देश्य यहां आये बिना पूरा ही नही हो सकता था.
एक और खास बात. ये ऋषि वशिष्ठ की सिद्धि स्थली रही है. ऋषि वशिष्ठ मेरे गोत्र के अधिष्ठाता हैं. अर्थात मेरा ये शरीर उनके डी.एन.ए. से जुड़ा है. इस बार की हिमालय साधना में मै बिना पूर्व योजना के ही उन जगहों पर पहुंचता जा रहा था, जहां ऋषि वशिष्ठ ने सिद्धियां अर्जित कीं. रुच्छ महादेव पहुंचकर मुझे पता चला कि इस जगह ऋषि वशिष्ठ ने साधना करके सिद्धियां अर्जित की थीं. उन्होंने ही सरस्वती व मंदाकिनी नदी के संगम पर रुच्छ महादेव के विशाल शिवलिंग की स्थापना की. ये जानकर मुझे आश्चर्य भी हुआ और खुशी भी. क्योंकि पिछले दिनों जब मुझे वशिष्ठ गुफा ले जाया गया. तो वहां साधना के दौरान मै अपने डी.एन.ए. से जुड़े तमाम रहस्यों को अनायास ही जान गया था. ये भी कि इस डी.ए.न.ए. से जुड़े लोग कैसे सिद्धियों को आसान कर सकते हैं. सही कहें तो विभिन्न गोत्रों से जुड़े साधकों की साधना सिद्धी की तकनीक से परिचित हो गया. वहां मैने वो पा लिया जिसके लिये जीवन भर रिसर्च करनी पड़ सकती थी.
जब पता चला कि यहां भी ऋषि वशिष्ठ ने सिद्धियां अर्जित की थीं. तो बड़ा अपनापन सा जाग गया. मन में विचार आया कि उन्होंने ही यहां बुला लिया. शायद कुछ और बड़ा देने वाले हैं.
मेरे साथ आये लोग पीछे छूट गये थे. दरअसल रुच्छ महादेव एक गहरी घाटी में है. वहां पहुंचने के लिये पहाड़ों से लगभग डेड़ किलोमीटर नीचे उतरना पड़ता है. वे लोग पहाड़ों के ही रहने वाले थे. उन्हें पहाड़ों में चढ़ने और घाटियों में उतरने की प्रैक्टिस थी. उन्हें लगा कि मुझे घाटी उतरने में देर लगेगी. इसलिये ऊपर रूककर चाय नाश्ता लेने लगे. मुझे कुछ खाना पीना नही था. इसलिये मुझसे कहा गया आप धीरे धीरे उतरिये. हम पीछे से आते हैं. मै घाटी में उतरने लगा. इन दिनों पहाड़ों पर चढ़ना उतरना सीख गया था. इसलिये आराम से उतर गया. साथ आये लोग मुझसे आधे घंटे पिछड़ गये.
गजब की प्राकृतिक सुंदरता मिली यहां. ऊंची पहाड़ियों के बीच सरस्वती और मंदाकिनी की इठलाती जल धारायें. पत्थरों से टकराकर उछलता उनका पानी. चारों तरफ ऊंचे पहाड़ों की हरियानी. उन पर चीड़, देवदार के वृक्षों की सजावट. पहाड़ी जंगल हरी चादर सी बिखेरे दिखे. उनके बीच से निकलकर धुंवें से उड़ रहे बादलों के समूह. सब कुछ सम्मोहनकारी था. एेसा सम्मोहन जो देव लोक की शक्तियों को भी खींच लाये.
रुच्छ महादेव तक पहुंचने के रास्ते में सरस्वती की धारा थी. उसे पार करने के लिये स्थानीय प्रशासन ने वहां रस्सी वाला पुल बनाया है. जिसमें मानव चलित ट्राली लगी होती है. मुझे मंदिर की तरफ जाते देख पास में भेड़ चरा रहे 2 छोटे लड़के एक पहाड़ी मोड़ से निकर कर बाहर आ गए. उनकी उम्र 10 साल से कम ही थी. वे अपने आप ही रस्से वाले पुल के पास पहुंच गए. मुझे भी उधर ही बुलाया. मै गया तो ट्राली में बैठने का इशारा किया. दूसरी तरफ भी उनकी ही उम्र के दो लड़के थे. मेरे बैठते ही उन्होंने ट्राली की रस्सी खीचनी शुरू कर दी. मै नदी के ऊपर हवा में झूलता हुआ दूसरी तरफ पहुंच गया. इस तरीके से मैने पहली बार कोई नदी पार की थी.
पूछने पर लड़कों ने बताया कि पहले वहां रस्सी वाला पुल बना था. 2013 को केदार धाम में जो जो जल प्रलय आई थी उसमें पुल बह गया. साथ ही पुल बनानी वाली कंपनी का पावर हाउस भी बह गया. वहां पानी से बिजली बनाने वाला थर्मल पावर स्टेशन था. अब उसका नामोनिशान नही. जल प्रलय का यहां भी व्यापक असर हुआ था. रुच्छ महादेव के आस पास धर्मशाला और कई अन्य तरह के मकान बन गये थे. सब बह गये. अब वहां एेसे किसी निर्माण का कोई मनोनिशान नही दिखता. वहां जाने वाले नए लोग जान भी नही सकते कि कभी कोई निर्माण भी थे. मगर मंदिर को जरा भी नुकसान नही हुआ.
आश्चर्य जनक रूप से रुच्छ महादेव शिवलिंग मंदाकिनी नदी की धारा के बीच स्थापित है. एक व्यक्ति ने बताया कि पहले शिवलिंग धारा के बीचो बीच था. जल प्रलय के बाद धारा थोड़ा खिसक गई. और शिवलिंग कुछ किनारे हो गया. मगर अभी भी मंदाकिनी की जल धारा चौबीसों घंटे शिवलिंग का जलाभिषेक करती है. ये क्रम हजारों साल से चला आ रहा है. चूंकि शिवलिंग जलधारा में है इसलिये उस जगह मंदिर नही बन सकता. वहां रुच्छ महादेव खुले आसमान के नीचे हैं. पास ही में कोटि महेश्वरी का मंदिर है.
मैने विशाल शिवलिंग का जलाभिषेक किया. शिव सहस्त्र नाम सुनाते हुए शिवार्चन किया. शिवार्चन के दौरान मुझे शिवलिंग से उठती उर्जा की लहरें लगतार दिखती रहीं. उर्जा की इतनी प्रचंड लहरें मै पहली बार देख रहा था. बिल्कुल एेसे जैसे रेगिस्तान में ऊंचे तापमान पर छलावा सी जल तरंगे दिखती हैं.
ये मेरा भ्रम नही था. उर्जा की तरंगे शिवलिंग से निकलकर काफी ऊंचेै तक उठ रही थीं. खुली आंखों से मै उन्हें बिल्कुल साफ देख रहा था. वे लहराती हुई लगातार घनीभूत होती गईं. इतनी कि मै उनके भीतर विभिन्न तरह की आकृतियों को देखने लगा. बिल्कुल टी.वी. स्क्रीन की तरह. ये सब देव आकृतियां थीं. जैसे शिव सहस्त्रनाम सुनने को चली आयी हों. और मुझे अपनी उपस्थिति से अवगत करा रही हों.
साथ दिये चित्र में पीने पत्थर वाला रुच्छ महादेव शिवलिंग है.
शिवार्चन पूरा होने के बाद उर्जा लहरें बंद हो गईं. मेरे मन में इस रहस्य को जानने की इच्छा पनपी. मुझे इस विज्ञान की जानकारी न थी. किसी साधना के दौरान एेसा कुछ घटित होता है. ये भी नही पता था. मै इस रहस्य को जानना चाहता था. अपनी इच्छा शिव गुरु के चरणों में अर्पित करके आंखें बंद कर लीं. कुछ क्षणों बाद जवाब आ गया. मैने दिव्य उर्जाओं को प्रणाम किया और कोटि महेश्वरी की तरफ चल पड़ा.
क्रमशः…।

… अब मै शिवप्रिया।
गुरु जी नीलकंठ से साधना शुरू करके रुच्छ महादेव पहुंचे. रुच्छ महादेव का नीलकंठ से क्या सम्बंध ये. यहां साधकों को ब्रह्म संगीत क्यों सुनाई देता है. देवी मां अपने करोड़ों रुपों में खुद ही आकर यहां क्यों बस गईं. ये रहस्य मै आगे लिखुंगी.
तब तक की राम राम।
शिव गुरु जी को प्रणाम।
गुरु जी को प्रणाम।

One response

  1. घाटी का वर्णन कितना सुंदर रूप से किया है, पढते समय लग राहा था हम वही है. अनेक अनेक हार्दिक साधुवाद .

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