रहस्यमयी संत से भेट: कहा लोगों को खुद उनकी पूजा करना सिखाओ

गुरु जी की हिमालय साधना…6

राम राम, मै शिवप्रिया

गुरु जी इन दिनों अपनी गहन साधना के लिये देव स्थली हिमालय के शिवप्रिय केदार घाटी में हैं। साधना का पहला चरण मणिकूट पर्वत पर कदलीवन में पूरा किया। प्रथम चरण पूरा होने पर पिछले दिनों ऊँची पर्वत चोटिओं से उतरकर हरिद्वार आये। तब फोन पर विस्तार से बात हो सकी। मैंने उनसे अपनी साधना को विस्तार से बताने का अनुरोध किया। जिससे मृत्युंजय योग से जुड़े साधक प्रेरणा ले सकें। साधकों के हित को ध्यान में रखकर गुरु जी ने साधना वृतांत विस्तार से बताना स्वीकार कर लिया। मै यहां उन्हीं के शब्दों में उनका साधना वृतांत लिख रही हूँ। 

|| गुरु जी ने आगे बताया…||

साधना के बाद पहाड़ों पर घूमने जाने का आज मेरा तीसरा दिन था। कल तेंदुवे और अजगर वाली घटना के बाद आज मै उस तरफ नही गया। बल्कि उसके उल्टी दिशा वाले जंगल की तरफ निकल पड़ा। 

रास्ते में बाबा रामदेव के पतंजलि संस्थान का पहाड़ी फार्म मिला। वहां उनकी संस्था ने दो जगह कई किलोमीटर पहाड़ खरीद रखे हैं। उनके दोनों पहाड़ी फॉर्मों में पानी की निजी व्यवस्था है। जहां औषधीय खेती की जा रही है। वहां मैंने अनुसंधान होते भी देखा। बाबा रामदेव की बिया बान पहाड़ों में औषधियों की खेती कराने की योजना मुझे शानदार लगी। इससे कठिन जीवन जी रहे स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

उनके फॉर्म हॉउस में कुछ कर्मचारी मिले। उनमें से दो के पैरों और घुटनों में घाव थे। वे बाईक से गिरकर छिल गए थे। भीग जाने के कारण उनके घाव पक गए थे। मैंने संजीवनी करके उन्हें हील किया। इंफेक्शन खत्म करने, घाव को सुखाने और दर्द मिटाने के लिए घावों में ढेर सारी नीली ऊर्जा भर दी। मुझे विश्वास है जल्दी ही उनके घाव सुख गए होंगे।

जब उन लोगों को पता चला कि मै क्षेत्र में साधना करने आया हूँ। और इस वक्त पहाड़ घूमने निकला हूँ तो उन्होंने मुझे कई तरह की स्थानीय जानकारियां दीं। अच्छे लोग थे वे। उन्होंने मुझे अंग्रेज कुटिया की तरफ घूमने जाने की सलाह दी।

मै उनके फॉर्म हॉउस से निकलकर अंग्रेज कुटिया की तरफ जाने वाले रास्ते पर चल पड़ा। वहां किसी विदेशी ने अपना एनर्जी ट्रेनिंग सेंटर बना रखा है। जहां वे विदेशों से सैलानियों को लाकर क्रिया योग सिखाते हैं। क्षेत्रीय लोग उस जगह को अंग्रेज की कुटिया कहते हैं। 

कल जो साधक मिले थे उन्होंने बिना थके पहाड़ों पर घूमने की असरदार तकनीक सुझाई थी। बताया कि हाथ में मजबूत डंडा रखें और छोटे बच्चों की तरह छोटे छोटे कदम रखकर चढ़ाई चढ़ें। हलांकि पहले दिन नीलकण्ठ से पार्वती मन्दिर की चढ़ाई चढ़ते समय मेरे आध्यात्मिक मित्र ने भी यही सलाह दी थी। मगर मैंने इसे अब  अपनाया। ऐसा करने से पहाड़ चढ़ना काफी आसान हो गया था। अब थकान नही लग रही थी। डंडा टिकाकर चलने का मतलब था मेरे शरीर का आधा बोझ उस पर होना। बाद में इसी तकनीक के सहारे मै हिमालय की ऊँची चढ़ाइयां बिना थके चढ़ता रहा।

थोड़ी दूर चलकर मैने आसान रास्ता छोड़ दिया और एक पगडंडी पर आ गया। पगडंडी पहाड़ की चोटी की तरफ जा रही थी। ऊपर जाकर मेरा वहां से गंगा की धारा देखने का इरादा था। मै समझना चाहता था कि यहां के लोग पानी के लिये गंगा जी का लाभ क्यों नही ले पा रहे हैं।

लगभग आधा घंटे ही चला था कि किसी ने पीछे से आवाज दी ‘उधर मत जाओ।’

मै रुक गया। पलट कर देखा। मेरे पीछे एक संत खड़े थे। बिलकुल पास। इतना कि मै हाथ बढ़ाकर उन्हें छू सकता था। कब इतने करीब आ गए, पता ही न चला।

पहाड़ों की सैर करते समय मै शिव सहस्त्र नाम जाप करता रहता था। सारा ध्यान शिव गुरु के नामों पर ही रहता था। शायद इसी कारण पीछे से आने वाले कदमों को सुन न सका।

उन्होंने सफ़ेद अचला ओढ़ा था। हाथ ने मेरी तरह ही डंडा था। एकहरा बदन। गोरा रंग। लगभग 6 फ़ीट ऊंचाई। बिलकुल सफ़ेद दाढ़ी बाल। बालों में लिपटी जटायें। पूरे माथे पर फैला  सफ़ेद तिलक। चेहरे पर दिव्य तेज। आखों में अपनेपन का सम्मोहन। 

मै देखता ही रह गया। कितनी देर, पता नही।

वे ठहाका लगाकर हँसे। तब मेरी तन्द्रा टूटी। 

हँसते हुए बोले सोच रहे होंगे मैंने क्यों रोका?

मैंने हाँ में सिर हिला दिया।

वे फिर ठहाका लगाकर हँस पड़े। उनकी हँसी में नकलीपन बिलकुल नहीं था। निर्दोष हँसी। ऐसी जो दूर तक गूंज कर लोगों में उत्साह भर दे। हँसी में खुलापन था। आजादी थी। सम्मोहन था। 

मै चुप रहा। पता नही क्यों। बस उन्हें देखता रहा। 

उन्होंने एक ठहाका और लगाया।

खुद ही बोले अब सोच रहे होंगे मै इतना क्यों हँसता हूँ?

हाँ। मै बोला मगर आपका हँसना मुझे अच्छा लग रहा है। आज तक किसी को इतनी स्वाभाविक हँसी हँसते नही देखा। 

तो तुम भी हँसो। उन्होंने कहा और फिर ठहाका लगा पड़े।

मै भी हँस दिया।

हँसने से ऊर्जा बढ़ती है। तुम तो लोगों की ऊर्जाएं ठीक करते हो न। उन्होंने कहा तो मै चौंक गया। हम पहली बार मिले थे। मगर उन्हें मेरे बारे में पता था।

वे फिर हँसे। और बोले अब सोच रहे होंगे मुझे ये कैसे मालूम?

मैंने हाँ में सिर हिला दिया।

मै आँखे पढ़ता हूँ। वे बोले तुम भी तो ऊर्जा पढ़कर लोगों के बारे में जान लेते हो। 

उनकी ये तकनीक मेरे लिये नई थी। मैंने उनकी एनर्जी रीड करके उनके बारे में जानने की कोशिश की। मगर नाकाम रहा। क्योंकि उन्होंने अपनी ऊर्जाओं की प्रोग्रामिंग करके उनको अपनी सूचना देने से प्रतिबंधित कर रखा था।

ये जानकर मै मुस्करा दिया।

वे हँस दिए। क्योंकि मेरे मुस्कराने का सबब जान गए थे।

उन्होंने एक चट्टान पर बैठने का इशारा किया।

मै बैठ गया। वे भी पास में बैठ गए। बैठते ही बोले किसी को बचाने आये थे यहां। 

उनकी बात सुनकर मुझे संदेह न रहा कि वे मेरे बारे में सब कुछ जानते हैं। क्योंकि नीलकंठ आने का मेरा असली उद्देश्य साधना करना नही था। यहां मै साधना की गहराइयों में उलझ गए अपने एक अध्यात्मिक साथी को बचाने आया था। अपनी साधना का निर्णय तो यहां पहुँचने के बाद लिया। 

अब आप कहेंगे कि ये सब आपने मेरी आँखे पढ़कर जान लिया। मैंने उनसे कम्प्लेन सी की। क्योंकि इस बीच मैंने अपनी आँखों के भाव रोक लिये थे। जिससे अब वे न तो मेरी आँखें पढ़ सकते थे और न ही दिमाग। साथ ही मैंने अपने आज्ञा चक्र और थर्ड आई को प्रोग्रम करके सूचनाओं के लिये प्रतिबंधित कर दिया। जिसके कारण वे उन्हें भी रीड नही कर सकते थे। रीड करने की कोशिश करते तो मेरे बारे में भ्रमित करने वाली जानकारी मिलती।

एक बार फिर उनका सम्मोहनकारी ठहाका गूंज गया। बोले नही अब तो तुम मुझे अपनी आँखे पढ़ने ही नही दे रहे हो। चलो कुछ और बात करते हैं।

मै समझ गया वे मेरे बारे में सब कुछ कैसे जानते हैं इस रहस्य को खोलना नही चाहते। 

संतों से जिद नही की जाती। इसलिये मैंने अपनी जिज्ञासा वहीं छोड़ दी।

हम बातें करने लगे। 

उनके कहने पर मैने उन्हें शिव सहस्त्र नाम सुनाया। जिसे सुनकर वे बहुत संतुष्ट नजर आये।

कुछ देर चुप रहने के बाद विचारमग्न होकर बुदबुदाये ‘ शिव सहस्त्र नाम! इतनी प्रभावशाली विद्या उपलब्ध होने के बावजूद लोग इतने दुःख भोग रहे हैं!’

मै चुप रहा।

वे कहते गए आज का इन्शान अपने भीतर के शिव को भूला जा रहा है। अपनी शक्तियों को भूला जा रहा है। इसी कारण दुःख हटाये नही हटते।

इसका हल बताइये। मैंने उनसे पूछा। 

उन्होंने कहा लोग तो तुम्हारी बात मानते हैं। उनको उनकी खुद की पूजा करना सिखाओ। इससे उनकी शक्तियां जागेंगी। भीतर शिव जाग उठेंगे। फिर न बचेंगे दुःख।

खुद की पूजा करके अपनी शक्तिओं को जगाने में देर लगेगी। जबकि परेशान व्यक्ति इंतजार नही कर पाता। मैंने बताया कई बार तो लोग प्रारब्ध तोड़कर समाधान पाने का अपना टाइम टेबल तक बनाना चाहते हैं। ऐसे में एक समस्या हटाओ तो पीछे से उससे बड़ी समस्या आ खड़ी होती है। कई बार तो मृत्यु तक का खतरा नजर आता है। फिर भी हालातों में उलझा व्यक्ति सामने दिख रही समस्या को ही हटाने के लिये उतावला होता रहता है। ऐसे में क्या किया जाये। मैंने पूछा था। दिख रही समस्या को हटा दिया जाये या उसकी आड़ में छिपी मृत्यु सी भयानकता पर ध्यान केंद्रित रखा जाये। 

जो समाधान पाने के लिये अपना टाइम टेबल बनाना चाहते हैं। उन्हें उनके हालात पर छोड़ दिया जाना चाहिये। संत ने कठोर मशविरा दिया। बोले ये प्रकृति द्वारा सजा पा रहे लोग हैं। अपने कृत्यों की कुछ तो सजा उन्हें मिलनी ही चाहिये। यही न्यायसंगत होगा। 

कैसे छोड़ दिया जाये! मैंने बताया लोग मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, पूजाघरों में फरयाद करते हैं। मनौतियां मानते हैं। पूजा पाठ अनुष्ठान करते हैं। तीर्थों में जाते हैं। जब कहीं से भी राहत नही मिलती। तब ही हमारे जैसे लोगों के पास आते हैं। सभी जानते हैं कि उपचारक भगवान नही होता। फिर भी वे यही सोचकर आते हैं कि जो भगवान् ने नही सुनी। उसका हल इनके पास मिलेगा। दूसरे शब्दों में उस समय वे हमें ऊपर वाले से ज्यादा महत्व दे रहे होते हैं। उनसे ज्यादा भरोसा करके आते हैं। तो उन्हें तड़पते हुए कैसे छोड़ दिया जाये।

मेरी बात सुनकर वे सोच में पड़ गए। कुछ देर चुप रहे। फिर बोले तो उनके प्रारब्ध को उपचारित करो। साथ ही उन्हें खुद की पूजा करने का तरीका सिखाओ। लोगों को स्व अर्चन में संलग्न करो। ताकि भविष्य में उन्हें दुःख लेकर भटकना न पड़े। 

स्व अर्चन की सुनिश्चित और प्रभावी राह बताइये। मैंने पूछा।

जो आपको पता है वो राह सुनिश्चित भी है और प्रभावी थी। उन्होंने कहा।

प्रारब्ध उपचारित करने का कोई सरल और प्रभावी तरीका बताइये। मैंने पूछा।

ये तो आपके शिव गुरु ही बताएँगे। उसके लिये आप को केदार घाटी में जाना होगा। इतना कहकर वे उठ गए। बोले अभी तो अँधेरा होने वाला है। अपनी कुटिया में वापस जाओ। फिर एक ठहाका लगाया और उधर की तरफ चल पड़े, जिधर मुझे जाने से रोका था। 

मैंने पूछा उधर कहाँ चल दिये आप? 

जवाब में उन्होंने आख़िरी ठहाका लगाया। और हँसते हुए ही पहाड़ चढ़ने लगे। जाते जाते बोले हम फिर मिलेंगे। मुझे वे रहस्यमयी संत लगे। आखिर तक अपनी पहचान सामने नही आने दी।

मै वापस लौट पड़ा।

अब मुझे केदारघाटी जाना था।

क्रमशः …।

… अब मै शिवप्रिया। 

आपके लिये गुरु जी द्वारा बताया आगे का वृतांत जल्दी ही लिखुंगी।

तब तक की राम राम।

शिव गुरु जी को प्रणाम।

गुरु जी को प्रणाम।

7 responses

  1. anubhev kise sant ka,,,,,,,jaisa aapka vichar h,peramatama vesa hi dekhata h,,,,,,,,

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  2. मैं जिना चाहता हूं ये परेशानिया जिने नही देती.मैं अपने घर की खुशियां पाना चाहता हूं जो कहीं खुशियांखो गया है.

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  3. अद्भुत …. राम राम … जय गुरु देव !

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  4. भरतभाई मणीशंकर राज्यगुरु | Reply

    पू़़ गुरुजीके साथ आप हमे भी हिमालयकी यात्रा करा रही हो । आपका धन्यवाद । पू़़ गुरुजीको प़णाम ।

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  5. Bahut Sundar

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  6. pratiksha parmar | Reply

    Bahot dhanyavad

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  7. Bin mangey moti miley Bahut bahut dhaneywad

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